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Anand Mishra

Action

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Anand Mishra

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वनरक्षिका

वनरक्षिका

3 mins
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गढ़वाल हिमालय
वर्ष 1898

हिमालय की तलहटी में एक गाँव था—

देववन।

गाँव के चारों ओर घना जंगल था।

पीढ़ियों से एक नियम चला आ रहा था—

"अमावस्या की रात काली पहाड़ी पर मत जाना।"

गाँव वाले कहते थे कि वहाँ डायनें रहती हैं।

हर वर्ष दो-तीन लोग लापता हो जाते।

कुछ पशु भी नहीं लौटते।

धीरे-धीरे पूरे क्षेत्र में भय फैल गया।

राज्य प्रशासन ने दो विशेष अन्वेषकों को भेजा।

आदित्य सेन।

पूर्व सैनिक।

तीक्ष्ण निशानेबाज़।

और—

वैदेही।

वनस्पति-विज्ञान, आयुर्वेद और लोकपरंपराओं की विदुषी।

दोनों भाई-बहन थे।

बचपन में उनके माता-पिता भी इसी जंगल में लापता हुए थे।

गाँव पहुँचते ही लोगों ने कहा—

"सावधान रहना।"

"वहाँ रहने वाली सभी स्त्रियाँ मायाजाल रचती हैं।"

आदित्य ने हथियारों की जाँच शुरू की।

लेकिन वैदेही ने सबसे पहले गाँव की वृद्ध महिलाओं से बात की।

उन्हें एक विचित्र बात पता चली।

गाँव की दाइयाँ और औषधि बनाने वाली स्त्रियाँ भी वर्षों से "डायन" कहलाकर अपमानित होती रही थीं।

जब भी कोई बीमारी समझ में नहीं आती—

दोष उन्हीं पर डाल दिया जाता।

उस रात दोनों काली पहाड़ी पर पहुँचे।

उन्हें दूर एक झोपड़ी दिखाई दी।

वहाँ एक वृद्धा घायल हिरण का उपचार कर रही थी।

उसके आसपास दुर्लभ औषधीय पौधे उग रहे थे।

आदित्य ने धीरे से कहा—

"क्या यही वह डायन है?"

वृद्धा मुस्कुराई।

"यदि जंगल की भाषा समझना डायन होना है..."

"...तो शायद हूँ।"

उसका नाम था—

मातंगी।

वह दशकों से वनौषधियों की संरक्षक थी।

आसपास के आदिवासी समुदाय उसे सम्मान से वनरक्षिका कहते थे।

मातंगी ने एक गंभीर बात बताई।

"जिसे तुम लोग डायनों का काम समझते हो..."

"...वह हमारा नहीं है।"

उसने दोनों को जंगल के भीतर एक गुफा दिखाई।

वहाँ कुछ लोग दुर्लभ औषधीय पौधों और विषैले खनिजों की अवैध तस्करी कर रहे थे।

जो ग्रामीण उस क्षेत्र तक पहुँच जाते—

उन्हें या तो डरा दिया जाता या गायब कर दिया जाता।

डायनों की कहानी उन्हीं तस्करों ने फैलाई थी।

ताकि कोई जंगल के भीतर आने का साहस न करे।

लेकिन रहस्य यहीं समाप्त नहीं हुआ।

मातंगी बोली—

"फिर भी सावधान रहो।"

"जंगल में सब हमारे जैसे नहीं हैं।"

अगली रात गुफा के भीतर उन्हें एक और समूह मिला।

वे प्राचीन अनुष्ठानों के नाम पर विषैले पौधों का उपयोग कर लोगों को अपने नियंत्रण में रखते थे।

वे स्वयं को भी "वन की साधिकाएँ" कहते थे।

लेकिन उनका उद्देश्य भय फैलाकर शक्ति प्राप्त करना था।

अब आदित्य समझ गया।

समस्या "जादू" नहीं थी।

समस्या थी—

ज्ञान का उपयोग किस उद्देश्य से किया जा रहा था।

अंतिम संघर्ष गुफा में हुआ।

मातंगी ने औषधियों से विष का प्रभाव समाप्त किया।

वैदेही ने तस्करों के प्रमाण जुटाए।

आदित्य ने गिरोह को गिरफ्तार कराया।

गाँव लौटने पर लोगों ने पूछा—

"तो क्या सचमुच डायनें थीं?"

वैदेही ने उत्तर दिया—

"नहीं।"

"सच यह है कि हमने तीन अलग-अलग लोगों को एक ही नाम दे दिया था।"

"पहली—जो जंगल और जीवन की रक्षा करती थीं।"

"दूसरी—जो ज्ञान का दुरुपयोग करती थीं।"

"तीसरी—जो भय फैलाकर अपना अपराध छिपाती थीं।"

"हमने बिना समझे तीनों को एक ही श्रेणी में रख दिया।"

कुछ वर्षों बाद देववन के पास एक वन-औषधि विद्यालय स्थापित हुआ।

उसकी प्रथम आचार्या बनीं—

मातंगी।

गाँव की वही स्त्रियाँ, जिन्हें कभी "डायन" कहा जाता था, अब औषधि, प्रसूति-विद्या और वन संरक्षण की शिक्षिका बन गईं।

विद्यालय के प्रवेश द्वार पर एक शिलालेख लगाया गया।

उस पर लिखा था—

"ज्ञान अपने आप में न शुभ होता है, न अशुभ।"

"उसका चरित्र उसके उपयोग से बनता है।"

और उसके नीचे—

"भय अक्सर पूरे समुदाय को दोषी बना देता है।
 न्याय पहले सत्य खोजता है, फिर निर्णय देता है।"



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