STORYMIRROR

Anand Mishra

Action

5  

Anand Mishra

Action

चलायमान नगर

चलायमान नगर

3 mins
0

वर्ष 2325

दो सौ वर्षों के जलवायु परिवर्तन, समुद्री जलस्तर वृद्धि और संसाधन-संघर्षों के बाद पृथ्वी का भूगोल पूरी तरह बदल चुका था।

स्थायी नगर अब सुरक्षित नहीं रहे।

कहीं रेगिस्तान बढ़ चुके थे।

कहीं समुद्र ने महाद्वीप निगल लिए थे।

कहीं भूकम्प हर कुछ महीनों में धरती का नक्शा बदल देते थे।

मानवता ने एक नया समाधान खोजा।

चलायमान नगर।

विशाल स्वचालित शहर।

हजारों पहियों पर चलते हुए।

अपनी ऊर्जा स्वयं उत्पन्न करते हुए।

जहाँ संसाधन मिलते, वहाँ कुछ सप्ताह रुकते।

फिर आगे बढ़ जाते।

भारत का सबसे बड़ा चलायमान नगर था—

आर्यावर्त।

उसमें पचास लाख लोग रहते थे।

विद्यालय।

अस्पताल।

विश्वविद्यालय।

कारखाने।

उद्यान।

सब कुछ उसके भीतर था।

उस नगर का मुख्य नगर-नियोजक था—

ईशान मेहता।

वह मशीनों का विशेषज्ञ था।

लेकिन उससे अधिक वह समाज का विद्यार्थी था।

एक दिन आर्यावर्त के कृत्रिम बुद्धिमत्ता केंद्र ने चेतावनी दी।

"पाँच सौ किलोमीटर आगे एक छोटा चलायमान नगर है।"

उसका नाम था—

नवजीवन।

उसमें केवल पंद्रह हज़ार लोग रहते थे।

परिषद की बैठक हुई।

कुछ सदस्यों ने कहा—

"हमारे पास ऊर्जा कम है।"

"यदि हम नवजीवन को अपने साथ मिला लें..."

"...तो उसके सभी संसाधन हमारे हो जाएँगे।"

एक वरिष्ठ सदस्य ने कहा—

"छोटे नगरों का बड़े नगरों में विलय ही मानवता का भविष्य है।"

ईशान ने विरोध किया।

"विलय और निगल जाना अलग बातें हैं।"

लेकिन परिषद ने मतदान कर दिया।

आर्यावर्त नवजीवन की ओर बढ़ने लगा।

दो दिन बाद दोनों नगर आमने-सामने थे।

नवजीवन के महापौर—

आर्या सेन

आर्यावर्त पहुँचीं।

उन्होंने कहा—

"यदि हमें सहायता चाहिए होती..."

"...तो हम स्वयं माँग लेते।"

"हम अपना नगर नहीं खोना चाहते।"

परिषद ने उनकी बात अस्वीकार कर दी।

उसी रात ईशान ने पुराने अभिलेख देखे।

उन्हें एक भूला हुआ दस्तावेज़ मिला।

उसमें मानव सभ्यता के पुनर्निर्माण का मूल सिद्धांत लिखा था—

"कोई भी नगर दूसरे नगर के अस्तित्व को समाप्त करके जीवित नहीं रहेगा।"

समय के साथ यह सिद्धांत भुला दिया गया था।

ईशान ने दोनों नगरों की ऊर्जा प्रणाली का अध्ययन किया।

उन्हें एक अद्भुत तथ्य मिला।

आर्यावर्त सौर ऊर्जा में अत्यंत उन्नत था।

नवजीवन के पास भू-तापीय ऊर्जा का उत्कृष्ट तंत्र था।

यदि दोनों अपनी तकनीक साझा करें...

तो दोनों अनिश्चितकाल तक जीवित रह सकते थे।

अगली परिषद में ईशान ने प्रस्ताव रखा।

"नगरों का भविष्य प्रतियोगिता नहीं..."

"...परस्पर सहयोग है।"

कुछ लोगों ने इसे आदर्शवाद कहा।

तभी अचानक विशाल धूल-आँधी उठी।

तीसरा चलायमान नगर दिखाई दिया।

उसका नाम था—

वज्र।

वज्र वर्षों से छोटे नगरों को बलपूर्वक अपने में मिलाता आया था।

अब उसका लक्ष्य आर्यावर्त था।

पहली बार आर्यावर्त और नवजीवन साथ खड़े हुए।

उन्होंने युद्ध नहीं किया।

उन्होंने अपने ऊर्जा तंत्र जोड़ दिए।

दोनों नगरों ने मिलकर ऐसी सुरक्षा ढाल बनाई जिसे वज्र भेद नहीं सका।

कुछ दिनों बाद वज्र की ऊर्जा समाप्त हो गई।

उसके नागरिकों को भी आर्यावर्त और नवजीवन ने शरण दी।

लेकिन एक शर्त पर।

"तुम्हारा नगर समाप्त नहीं होगा।"

"तुम्हारी पहचान भी नहीं।"

"हम मिलकर एक संघ बनाएँगे..."

"...साम्राज्य नहीं।"

धीरे-धीरे पृथ्वी पर अनेक चलायमान नगर इस संघ में शामिल होने लगे।

संसाधन साझा हुए।

ज्ञान साझा हुआ।

ऊर्जा साझा हुई।

और पहली बार...

कोई नगर किसी दूसरे नगर से भयभीत नहीं था।

ईशान के जीवन के अंतिम दिन उनसे पूछा गया—

"मानव सभ्यता की सबसे बड़ी खोज क्या थी?"

उन्होंने उत्तर दिया—

"चलते हुए नगर नहीं।"

"चलते हुए भी साथ रहना सीख लेना।"

वर्षों बाद विश्व चलायमान नगर विश्वविद्यालय के प्रवेश द्वार पर एक शिलालेख लगाया गया।

उस पर लिखा था—

"सभ्यता की ऊँचाई उसके भवनों से नहीं मापी जाती।
 वह इस बात से मापी जाती है कि शक्तिशाली, कमज़ोर को स्थान देता है या निगल जाता है।"

और उसके नीचे—

"भविष्य उन नगरों का नहीं होगा जो सबसे बड़े हैं।
 भविष्य उनका होगा जो सबसे अधिक सहयोग करना जानते हैं।"



Rate this content
Log in

Similar hindi story from Action