जिंदगी ताक-झाँक नहीं
जिंदगी ताक-झाँक नहीं
“अरे रुखैयार भैया ! बड़ी दिन के बाद इधर का रुख किए.? हमलोगों से कोई नाराजगी है क्या..?"
”नहीं भाई, ऐसी कोई बात नहीं। आजकल समय नहीं मिलता। अपने काम काज में ही इतना व्यस्त हो जाता हूँ कि कहीं बैठने की फुर्सत नहीं होती।"
“आपके मामा जी रहते हैं न हमारे चार मकान बाद, पहले तो आप उनके यहाँ बहुत आते थे। कल ही तो उनसे भेंट हुई थी। वो भी शिकायत कर रहे थे कि आजकल रुखिया नहीं आता।"
”मामा जी को और तो कोई काम है नहीं केवल लेखा जोखा लेते रहते हैं कौन आया और कौन नहीं।"
दोनों परिचितों के बातों का सिलसिला चल पड़ा। एक, हर बात में सामने वाले की इदिया-गुदिया जानना चाह रहा था और दूसरा इनसे बचने की पूरी कोशिश। बैटिंग बॉलिंग होती रही। अंततः रुखैयार की आवाज तिक्त हो गई, “मुझे ये नहीं समझ में आता कि आपलोगों को दूसरे के बारे में इतना क्यों जानना होता है ?"
पहले वाले ने मुस्कुरा कर कहा, “आपके मामाजी ही आपके बारे में और अन्य लोगों के बारे में बातें करते रहते हैं इस से मेरी भी आदत पर गई।”
"मामा जी की बात क्या कहूँ, वो जीवन को जितना आसान समझते हैं आजकल जीवन उतना सरल नहीं। रेखा दीदी का जीवन उनके कारण ही मझधार में है। बहू भी एक दिन उनके साथ रहना नहीं चाहती।"
"वे पुराने विचार धारा को छोड़ना नहीं चाहते और नए युग का सुविधाएँ चाहिए। बेटी को समझाया सास-ससुर को तुम्हारे काम का महत्व समझना चाहिए। यदि वो तुम्हारे काम को मान नहीं देते तो दामाद जी को समझाओ। बात उलझती गई और बेटी मायके का रुख की तब उनकी आँखें खुली। वो तो रेखा दीदी की सास सुलझी दिमाग की थी सो बात बिगड़ते बिगड़ते रह गई। फल हुआ रेखा दीदी अब मायका आना नहीं चाहती। अब वो सबसे कहते रहते हैं मेरी पढ़ी-लिखी बेटी को दाई बना कर रख लिया है। बहू की बारी आई तो नारी का प्रथम कर्तव्य घर गृहस्थी ही है। कहा, पैसा-पैसा हाय पैसा करने से कुछ नही होता। बहू जो करे गलत। हर दिन नई सीख, हार कर बहू बाहर रहना ही पसंद करने लगी। और लोगों की बात छोड़िए। खुद उनकी पत्नी उनके साथ रहना नहीं चाहती। आपने कभी उनकी पत्नी को देखा है कभी?”
“नहीं , मैं तो सोचता था वो विधुर है।”
"जी नहीं, उनकी पत्नी इसी शहर में यहाँ से 12 किलोमीटर दूर राजेन्द्र नगर में रहती हैं। वहाँ इनका अपना घर है। लालची तो इतने है कि अपने घर को किराया लगा कर पांच हजार कम किराया पर यहाँ रहने लगे। अब मकान मालिक पर केस कर दिए कि वे बहुत पुराने किरायेदार हैं और मकान मालिक को इस घर की जरूरत नहीं अतः ये घर वे इन्हें बेच दें। जबकि मकान मालिक उनके रिश्तेदार हैं और रिश्तेदार जोन के कारण ही ये मकान उन्हें किराए पर मिला था। पर अब उनको लालच जो गया। मकान मालिक पत्नी के मायके से सम्बंधित थे। वे बहुत समझाई पर नहीं माने। अंततः पत्नी छोड़ कर चली गई ये सोच कर की शायद अक्ल ठिकाने आएगी। पर इस उम्र में रासलीला का आनंद आ रहा है, पत्नी की क्या जरूरत।"
"अब एक ही काम बचा है सबके जीवन मे ताक-झांक कर अपना मनोरंजन करना और दूसरों को तबाह। हर माह कोर्ट का चक्कर लगाते हैं, मकान मालिक को तबाह करने के चक्कर में और खुद तबाह हो रहे हैं। इनकी नजर में दूसरे के काम का कोई महत्व नहीं। हमेशा कहेंगे अरे ऐसा क्या है दो दिन ऑफिस नहीं ही जाओगे तो क्या होगा। मेरा एक काम था जरा करवा देते। अब आप ही बताइए ऐसे आदमी के पास बैठने कौन आएगा। जब बच्चे और पत्नी ही अपने नहीं हैं तो हमलोगों को क्या पड़ी है।"
"भगिना के नाते नहीं मानवता के नाते जब कभी बीमार पड़ते हैं इलाज करवा देता हूँ। दूसरों के जीवन में दखल अंदाजी करने वाले व्यक्ति को इससे अधिक कुछ भी नहीं मिलना चाहिए। जो मिल रहा है वो ही ज्यादा है। शायद वो पत्नी और बच्चोँ के कारण मिल जाता है।"
वार्तालाप खत्म हुई, दोनों एक दूसरे को देख मुस्कुरा कर हाथ मिलाया और आगे बढ़ गए।
रुखैयार साहब से बात कर रमणजी को पता चल चुका था कि दूसरों के जीवन में ताक झाँक-करना सरल है पर जीवन इतना सरल नहीं कि ताक-झाँक कर बढ़ते रहें।
