जिंदगी हर कदम एक नई जंग है ...!
जिंदगी हर कदम एक नई जंग है ...!
भोर का समय था और हर सुबह की तरह आज भी वृन्दावन में रमण कर रही पावन यमुना के पुलिन पर भक्तो का तांता लगा हुआ था। एक नाविक नाव से पावन यमुना में विचरण करते हुए ये भजन गुनगुना रहा था।
थाम उंगरिया… जोन डगरिया..!
थाम उंगरिया… जोन डगरिया, ले चालो मोहि जानो
तुम्हरें चरण में, तुम्हरी शरण में,
तुम्हरे चरण में, तुम्हरी शरण में, हरि मेरो ठौर ठिकानो,
हरि तुम ही आंधे की लकुटिया…
हरि तुम ही आंधे की लकुटिया..
तुम ही हिय के बैना…
हरि मैं नैन हीन तुम नैना…
हरी मैं नैन हीन तुम नैना..!
वृन्दावन (मथुरा) के कालिंदी पुलिंन पर अवस्थित आध्यात्मिक योग केंद्र के गोल प्रांगण के चारो ओर स्थिर चौबीस कमरो में से कमरा नंबर सात में आज भी सूरज की लालिमा के साथ उस नाविक के स्वरों ने दस्तक दी और एक सोलह वर्षीय लड़की मुक्ति उस कक्ष के झरोखे पर आ गयी। आज उसकी पहली सुबह ऐसी थीं जिसने उसके चेहरे पर सुकून भरी मुस्कुराहट ला दी। कुछ कुछ लालिमा के साथ सुनहरी रंगत लिए लम्बे बालो से घिरा मुक्ति का चेहरा लम्बाई युक्त था। उसका माथा सामान्य से अधिक चौड़ा था जो उसके भाग्यवान होने की तरफ संकेत कर रहा था तो वहीं उसकी आँखे बड़ी और घनी पलको से घिरी थीं। उसके होंठ पतले थे और हल्की पतली नाक पर काला तिल था। कुछ कुछ प्राकृतिक गुलाबी पन लिए मुक्ति के अधर कमल की अधखिली कली जैसे सुंदर थे। मुक्ति की गर्दन लम्बी थी और कुल मिला कर वह सामान्य लम्बाई लिए एक शानदार व्यक्तित्व की लड़की थी।
मुक्ति वृन्दावन के इस आध्यात्मिक योग केंद्र में पिछले कुछ सालो में कभी कभी आ जाती थी।और कई कई देर तक वह उस प्रांगण में अवस्थित कुंज बिहारी की छवि निरखती रहती। हालांकि वह वृन्दावन की ही वासी थी लेकिन अपने ही विचारों की दुनिया से थोड़ा त्रस्त थी। एक अजीब ख्याल उसे बैचेन किये रहता था। उसे ऐसा लगता था जैसे इस संसार के किसी कौने में कोइ तो है जिसे उसका इंतजार है। उसका जन्म अपने किसी अधूरे लक्ष्य को पूर्ण करने के लिए हुआ है। लेकिन वह लक्ष्य क्या है इसके बारे में उसे कोइ खबर नहीं है। वह नहीं जानती वह यहाँ क्यूँ है…? लेकिन वह बेवजह नहीं है। और इस विचार में वह कभी कभी इतना डूब जाती थी कि अपने ही घरवालों को पहचानने से इंकार करते हुए किसी अनजानी, अनदेखी जगह पर जाने की जिद करने लगती।
मुक्ति से जुडा ऐसा ही एक दृश्य करीब चार साल पहले इस योग केंद्र के एक अनुभवी आचार्य श्री ने सूर्योदय के समय प्रातः कालीन संध्या करते हुए यमुना पुलिन पर देखा।
"नहीं, नहीं, कोइ तो है… मुझे जाना है वहां..?" ये आवाज कानो में पड़ते ही उन्होंने देखा बारह साल की मुक्ति कालिंदी घाट पर बैठी हुई तेज आवाज में कुछ कह रही थी। उसके साथ ही एक लड़की और एक लेडी और थी जो उसे मजबूती से थामे हुए यमुना जल में गोते लगवा रहीं थीं। संत स्वभाव से ही करुणावान होता है आचार्य श्री एक जीव को इस तरह सांसारिक ताप से तपते देख उनके पास गए और उन्होंने मुक्ति की माँ से उसके ऐसा अजीब व्यवहार करने का कारण पूछा , "क्या परेशानी है इसे",
"राधे राधे, आचार्य श्री", मुक्ति माँ ने उन्हें प्रणाम किया।, "मेरी बच्ची मुक्ति स्वयं को भूल कर किन्ही और ख्यालो में कभी कभी विचरने लगती है, हमारे गुरूजी से हमने इस बात का जिक्र किया तब उन्होंने ही हमें यह आदेश दिया है कि इसे प्रतिदिन सुबह यमुना जल में डुबकी लगवा कर दीपदान किया करें। यमुना जी कृपा करेंगी तो यह जल्दी सामान्य हो जायेगी।", सुनकर आचार्य श्री ने धीर गंभीर वाणी में कहा, "जिस उद्देश्य के लिए आपके गुरुदेव ने आज्ञा की वह पूर्ण हो गयी है। अब अगर आप ठीक समझें तो बच्ची को लेकर सुबह यमुना पुलिन पर अवस्थित राधा माधव आध्यात्मिक योग केंद्र पर आया करें, वृन्दावन बिहारिनी की चाह बढ़ी तो बच्ची अपने लक्ष्य को अवश्य प्राप्त करेगी।",
आचार्य श्री कृपा पात्र संत थे उनकी महिमा पूलीन पर रहने वाले ब्रजवासी जानते थे…चिंतातुर दिखती मुक्ति की दुबली पतली माँ ने इसे साक्षात् बिहारी जी की कृपा अनुभव की। उन्होंने हाथ जोड़ कर आचार्य श्री का आभार व्यक्त किया। आचार्य श्री ने दोनों कर कमल उठा कर आशीष दिया और इस तरह मुक्ति आध्यात्मिक केंद्र से जुड़ गयी। मुक्ति प्रातः काल ही कभी अपनी माँ के साथ तो कभी अपनी इकलौती नाटी और थोड़ी मोटी छोटी बहन के साथ आध्यात्मिक केंद्र आ जाती थी।जहाँ आचार्य श्री के नेतृत्व में उसे कमरा नंबर सात में समय व्यतीत करने के लिए कहा जाता था। सर्दी गर्मी बरसात कोइ भी ऋतु उसे कभी रोक नहीं पाई। किन्तु प्रत्येक दिन उसे सूर्योदय से पहले ही घर भेज दिया जाता था। किन्तु आज आचार्य श्री ने उसे कुछ समय और रूकने का आदेश दिया। जिसके प्रभाव से आज मुक्ति ने अपने जीवन में वह अद्वितीय दृश्य देखा। जिसे देख कर उसके विचलित और अशांत मन को मानो तृप्ति का एहसास हुआ हो।
इस योग केंद्र में आने के बाद मुक्ति के जीवन में एक ठहराव आया। अध्यात्म की यह विशेषता होती है वह विचलित, चंचल चित्त का उपचार करते हुए उसे पूर्णतः शांत कर गंभीरता प्रदान कर देता है। मुक्ति भी उस आध्यात्मिक, सकारात्मक दिव्यता से परिपूर्ण माहौल में रहकर गंभीरता को प्राप्त हो रही थी।
'राधा माधव आध्यात्मिक योग केंद्र' वृन्दावन का एक प्रसिद्ध आश्रम है जिसका मुख्य उद्देश्य जीव मात्र के कल्याण हेतु पूर्ण प्रयास करना है।
सूर्योदय होने के करीब दस मिनट बाद आश्रम के मन्दिर प्रांगण में अवस्थित नाद सूचक घंटे की सुमधुर आवाज पूरे प्रांगण में गूंजने लगी। मुक्ति के कानो तक भी ये आवाज पहुंची। उसने अपनी नजरें झरोखे से अलग हटाई और मुड़ते हुए दरवाज़े तक आ गयी। मुक्ति समझ गयीं कि आश्रम के नियमानुसार अब यह समय प्रांगण में उपस्थित होकर सभी आचार्य जनो, और ईश्वर से आशीर्वाद लेने का है। हालांकि वह कभी इस प्रक्रिया में सम्मिलित नहीं हुई किन्तु उसने वहां आने जाने वाले सदस्यो के मुख से ऐसा सुना था कि उनका आश्रम में सबसे प्रिय समय वह होता है ज़ब प्रातः आचार्य श्री के चरणों का प्रसाद मिलता है। और वह आज इस प्रक्रिया में सम्मिलित होने के लिए अति उत्साहित थी।
द्वार पर ही मुक्ति को एक बारह वर्ष का चपल साँवला सा लड़का दिखा जिसे आचार्य श्री ने आश्रम में एक तरह से सन्देश वाहक का कार्य दिया हुआ था। और अभी वह आपमें उसी कार्य के लिए जा रहा था। उसका नाम माधव था और वह आचार्य श्री का सर्व प्रिय था।
"अरे मुक्ति दीदी, राधे राधे! आज आप गयीं नहीं है अर्थात आचार्य श्री की आज्ञा होगी कि आपको यहाँ रूकना है अभी कुछ देर", माधव मुक्ति के सामने आकर रूक गया। उसने एक साथ कई सवाल कर डाले",,,
"जी ! आचार्य श्री की आज्ञा है ये, वैसे तुम यह जानते हो कि मै यहाँ के नियमों से वाकिफ नहीं हूं माधव।"
"हाँ, हाँ क्यूँ नहीं…!" माधव ने जवाब दिया, "आपको ज्यादा कुछ नहीं करना है बस आश्रम के भाव समुद्र में आपको अगर पार लगना है तो पहले डूबना पड़ेगा।",
जारी...!
