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Shalinee Pankaj

Drama

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Shalinee Pankaj

Drama

जीवन की साँझ

जीवन की साँझ

10 mins
252

चाँद सी महबूबा हो मेरी....हाँ तुम बिलकुल वैसी हो जैसा मैंने सोचा था....रेडियो में शुक्ला जी का मनपसंद गाना बज रहा था।तभी शुक्ला जी मेरे नजदीक आकर इस गाने को गुनगुना लगते है,मैं उनसे कहती हूँ अब तो आप रिटायर हो गए हो इस बुढ़ापे में इतना रोमांस भला अच्छा लगता है क्या?तो उनका वही पुराना डायलॉग सुगंधा हम दोनों का प्यार हमारे दिल में है,और प्रेम कभी बूढ़ा नही होता और फिर शुक्ला जी और मैं एक दूसरे को देखकर आँखों ही आँखों में मुस्कुरा पड़ते है।

बैंगलोर में ही तो हम लोग रहते है जहाँ हमारा बंगला है जहाँ शान्तनु का बचपन और उसकी इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी हुई है।हमने शान्तनु को बहू त अच्छे संस्कार दिए है जो हर एक माता पिता देने का प्रयास करते है।शान्तनु भी हमे उतना ही प्यार और आदर देता है।बहू त ही होनहार है शान्तनु इण्टरमीडिएट से कालेज तक हर परिक्षा में मेरिट में आया है।आज शान्तनु न्यूयार्क में मल्टीनेशनल कम्पनी में इंजीनियर है।शान्तनु ने शादी भी हमारी पसंद की इंजीनियर लड़की से की है।

शान्तनु तो विदेश में नोकरी करना ही नही चाहता था परन्तु शुक्लाजी ने बेहतर भविष्य के लिए बेटा और बहू को न्यूयार्क जाने को मना ही लिया।

आज भी इन पाँच वर्षो में कोई संडे नही होता जब शान्तनु और अर्पणा का फोन ना आता हो। और एक बात तो बताना भूल ही गयी हर दीपावली में शान्तनु और अर्पणा महीनें भर के लिए आते है! बहू त खुशियाँ भरे दिन होते है वो शान्तनु तो जैसे बच्चा ही बन जाता है।

मम्मी मेरे सर पे मालिश कर दो मम्मी, मेरे लिए डोसा बनाओ . बिलकुल बच्चे की तरह रहता है।अर्पणा भी इन दिनों को जीवांत करने में कोई कसर नही छोड़ती है।मेरी छोटी सी छोटी आवश्यक्ताओ का ध्यान रखती है।उसके पापा तो उसका नाम लेते नही थकते।सच में, मैं कितनी

भाग्यवान हूँ जो इतना अच्छा बेटा-बहू पाई ये सोच गर्व से फुले नहीं समाती थी।अपर्णा तो आते ही रसोई सम्हाल लेती थी।तरह-तरह के पकवान बनाती पर इस बीच हमारे बुजुर्गियत का ध्यान रखते हुए ऐसा खाना कम कैलोरी का बनाती की जिससे हमें कोई नुकसान न हो।

हेल्थ का बहू त ध्यान रखती।मैं कभी फीकी चाय नहीं पीती थी ,पर उसने शुगर की वजह से फीका पीने की आदत डाल दी कि अब हम दोनों ही फीकी चाय पीने लगे।वैसे भी रिश्तों में इतना मिठास घुला हो तो चाय फीकी भी चल जाती है।

शान्तनु के लिए शुक्लाजी तो आदर्श है।उनकी हर एक बात उसके लिए मानो पत्थर की लकीर होती है।

बहू भी बहू त समझदार है शान्तनु और अर्पणा के बीच बहू त प्यार है और बहू को भी अपने घर में अच्छे संस्कार मिले है। यूँ ही एक महीना दीपावली का बीत जाता है और पता ही नही चलता है।

एयरपोर्ट पर मैं कभी छोड़ने नही जाती पर घर से बाहर निकलते समय मेरी शान्तनु और अर्पणा की आँखे नम हो जाया करती है,और अर्पणा भी हमेशा कहती है मम्मी पापा आप भी न्यूयार्क में क्यों नही रहते हमारे साथ।

यूँ ही पाँच वर्ष बीत गए मैं अब 65 की और शुक्ला जी 70 के हो गए है।और थोड़ा-थोड़ा बुढ़ापे के लक्षण आने लगे है मुझे डायबिटीज और इनको आर्थराइटिस है पर अब भी हम सब बहू त खुश है।

हम पति-पत्नी बैंगलोर के अपने बंगले में खुश है।रेडियो पर उनका वही पुराना "चाँद सी महबूबा हो मेरी ..... गीत बज रहा है।शाम के 7 बजे मैं रसोई में और रसोई की खिड़की में पूर्णिमा की चाँद की रजत किरणे बंगले में लगे हुए पेड़ो को चीरते हुए आ रही है।

मैं शुक्ला जी के लिए काफी लेकर आती हूँ वो आराम कुर्सी में झूलते हुए गाना गुनगुना रहे है।तभी मेरे मोबाइल पर न्यूयार्क से अर्पणा का फोन आता है और मुझे प्रणाम कहते हुए बताती है की शान्तनु को मल्टीनेशनल कम्पनी द्वारा बेहतर कार्य के उपहार स्वरूप निजी फ़्लैट मिला है उसके गृहप्रवेश में हमे आशीर्वाद देने आना ही है बहू की बहू त जिद और उधर से बीच बीच में शान्तनु की फोन लेकर हम दोनों को बुलाने की जिद करने लगते है हम दोनों वंहा जाने को सहमति दे देते है।पासपोर्ट और वीजा का काम तो शान्तनु ने पहले ही करा लिया था।

हम दोनों न्यूयार्क पहुँच जाते है

                               शान्तनु हमे एयरपोर्ट पर ही मिल जाता है टेक्सी से हम सब उनके घर पहुँच जाते है न्यूयार्क बहू तो बड़ा शहर है।शुक्ला जी के चेहरे पर थोड़ी घबराहट है इस अजनबी शहर को लेकर जहाँ की भाषा,खानपान सब कुछ अलग है।शान्तनु तो अपने कम्पनी के कार्य से USA में बहू त शहरों में घूमता रहता है,पर बहू की जॉब न्यूयार्क में ही है अतः घर की देखभाल वो कर ही लेती है। शान्तनु ने गृहप्रवेश में अच्छी पार्टी दी सब से मिलवाया अच्छा खाना-पीना रखा था।हमारे लिए सारे चेहरे अजनबी थे। 15 दिन का वीजा था पर शान्तनु को हमको घुमाने फिराने के लिए 5दिन की ही छुट्टी मुश्किल से मिल पाई थी।इन 5दिनों में शान्तनु और अर्पणा ने हमे तो ऐसा लगता है जन्नत की ही सैर करा दी।शान्तनु की छुट्टी खत्म हो गयी पर हमारी वापसी में अभी 10 दिन बचे हुए थे।शान्तनु अपने काम में चला गया पर बहू को 10दिन की छुट्टी लेकर हमारे पास रहने को कह गया।

              अर्पणा को घर का काम करने की आदत थोड़ी कम हो गयी थी इसलिए वो लंच डिनर बाहर से ये सोचकर मंगा लिया करती थी की मम्मी को काम ना करना पड़े पर डायबिटीज होने के कारण मेरा शुगर BP दोनों धीरे धीरे बढ़ने लगा। जिसे मैं सफर और घूमने फिरने की थकान समझने लगी।शुक्ला जी कहते रहे डॉक्टर को दिखा लेते है,पर मैं नए शहर में उन्हें परेशान नही करना चाहती थी।फिर एकदिन अचानक मैं बेहोश हो गयी।मेरे हाथ पाँव सुन्न हो गए।तुरन्त मुझे ICU ले जाया गया।शान्तनु भी हॉस्पिटल पहुँच गया।डॉक्टरो ने 2 दिन ICU में रखने के बाद मुझे पैरालिसिस बताया।शान्तनु ने परिस्थिति देखकर हमारा वीजा बढ़वा दिया।जब मुझे होश आया तो मानो पहाड़ ही टूट गया मुझ पर,मैं सिर्फ सुन और देख सकती थी बाकी हिलना, डुलना ,बोलना सब कुछ बंद हो गया था।

मेरी तकलीफ से ज्यादा तो मुझे शुक्ला जी के लगातार बहते हुए आँसु से हो रहा था।जो हमेशा गुनगुनाया करते थे उनकी आँखों में आँसू का हर एक बूँद जो मेरी हथेली पर गिर रहा था मानो मुझे ऐसा लग रहा था की मुझ पर तेज़ाब की बुँदे गिर रही थी

शुक्ला जी की बढ़ी हुई दाढ़ी वही 5 दिन से पहने हुए क़पड़े बहते हुए उनके आँसु मुझे बहूत तकलीफ पँहुचा रहे थे।आज मुझे हॉस्पिटल से डिसचार्ज कर दिया गया और कम से कम एक माह आराम करने को कहा गया। शान्तनु भी बहूत बैचेन था।पर अर्पणा को मैंने झुंझलाते हुए देखा जब शान्तनु ने उसे छुट्टी लेने को कहा। खैर हम सब घर आ गए न्यूयार्क के छोटे से फ़्लैट में।शुक्ला जी की आँखों में मैंने अपने एक-एक तकलीफ को महसूस किया वाकई में उम्र के इस पड़ाव में ऐसे लगता है जैसे हम दोनों की साँसे और दिल साथ ही धड़कता है।

           शान्तनु अपने काम में चला गया इन दिनों अर्पणा का व्यवहार मैंने रूखा होते हुए देखा। शान्तनु

को लगता था की अर्पणा मम्मी का ख्याल रखती होगी

पर वो तो हमेशा अपने कमरे में बंद रहती थी।डॉक्टरों ने मुझे बाहर का खाना मना किया हुआ था पर अर्पणा तो रेस्टोरेण्ट से ही खाना मनाने लगी।शुक्ला जी के रोकने पर बहू उनको झिड़क दी।शान्तनु जिसने अपने पापा से नजर मिला के बात तक न की थी।आज उन्हें बहू भी डांट पड़ी। ये देखकर सहसा मेरे आँखों से आँसु ढल गए उनसे नजर ना मिले इससे पहले मैंने आँखे बंद कर ली जिससे उन्हें शर्मिंदा ना होना पड़े।

          शुक्ला जी जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी चाय की एक प्याली तक ना बनाई थी, वो इंटरनेट से देख -देखकर मेरे लिए बाजार से खुद सामान लेकर मेरे लिए खाना बनाने लगे।शुक्ला जी की ये हालत देखकर मैं बुरी तरह घुटने लगी।मन करने लगा की भगवान् मुझे बिदा कर दे पर इनको मैं इस दुनियां में अकेले छोड़ना नही चाहती थी।न जाने मेरे बाद इनका क्या होगा।वैसे भी कभी ऐसा अवसर नही आता था कि हमे अलग रहना पड़े।मैं तो शुक्ला जी की परछाई की तरह थी।

ईधर शुक्ला जी सचमुच बहूत बदल गए थे।जो बहूत ही टिपटॉप में रहते थे। आज बहू त अस्त-व्यस्त से हो गए है।वो रोज भगवान की पूजा करते,मेरे लिए पानी गरम करते,रसोई बनाते यहाँ तक की मेरे कपड़े भी धोने लग गए।पर जब कभी शान्तनु का फ़ोन आता

कहते! " बहू हमारा बहूत ख्याल रखती है।तुम अपना काम देखो।यँहा की बिल्कुल चिंता न करो।"इनका बड़प्पन देख मेरी आँखें नम हो जाती पर बहू थी कि उस पर तो किसी चीज का असर ही नही होता था।काश! की मेरा स्वास्थय न बिगड़ता काश!! की हम समय रहते यहाँ से चले जाते।जन्नत सा सुख था हमारे आशियाने में।हम दोनों या यूं कहूँ की किसी दुख की परछाई तक शुक्ला जी ने कभी मुझपर पड़ने नही दी।कैसे वक्त बीतता गया पता ही नही चला।काश!!....काश की हम यहाँ नही आते।

    एक दिन शुक्ला जी मेरे लिए दवा लेने मार्केट गए हुए थे।आने में देर हुई रात का कुछ खाना बचा हुआ था अर्पणा ने मुझे खिला दिया।शुक्ला जी किचन में गए तो उन्होंने अर्पणा से पूछा तो अर्पणा का जवाब सुनकर मैं सन्न रह गयी की "पापा खाना फेंकने से अच्छा तो ये है की मम्मी ने खा लिया।" शुक्ला जी को इतनी ऊँची आवाज में जवाब देते हुए सुन मेरा स्वास्थ्य थोड़ा और बिगड़ गया।शुक्ला जी ने तुरन्त डॉक्टर को फ़ोन किया।अर्पणा फिर से अपने कमरे में बंद ही गई।

         डॉक्टर के आने पर डोर बेल बजी जिसकी आवाज सुनकर ये सरपट दरवाजे की तरफ बढ़े और

हड़बड़ाहट में दरवाजा का हेंडल से थोड़ी आवाज हुई

तो अर्पणा ने अंदर से ही आवाज लगाई "पापा दरवाजा तोड़ ही दोगे क्या??और अर्पणा धीरे-धीरे बुदबुदाई की इनमे तो बुढ़ापे में जवानी छाई है,बुढ़ापे का प्यार"।ये सब सुनकर मेरा तो कलेजा तार तार हो गया।

  जिस बेटे के जीवन तराशने के लिए इन्होंने अपनी सुख सुविधा की बलि चढ़ा दी उन्हें ये सब सुनना पढ़ रहा है।

जब भी शान्तनु आता अपर्णा का व्यवहार बदल जाता था।वो ऐसे ध्यान रखने लगती जैसे शुरू के दिनों में रखती थी।एक ही इंसान के दो चेहरे भी हो सकते है,जो पति की अनुपस्थिति में अलग व पति के सामने अलग।पूरी जिंदगी बीता दी हमने पर ये छल,कपट का अनुभव आज बहू से हो रहा था।अपनो के साथ ही इतना दुर्व्यवहार उफ्फ्फ!!आँखे भीग जाती।शान्तनु वही देखता जो उसे दिखाया जाता था।

कभी-कभी मन बहूत उदास हो जाता कि अच्छा-खासा तो रह रहे थे बैंगलोर में,जरूरत क्या थी ,यहाँ आने की।सब बातों पर पर्दा तो था।एक तसल्ली तो थी।न चाहकर भी कभी-कभी शुक्ला जी के प्रति किये दुर्व्यवहार से मन क्रोध से भर जाता था।कभी-कभी पुराने दिन याद आते थे।जब बच्चे बैंगलोर आते थे।मैं तो एक बेटी की हसरतें पूरी कर लेती थी अपर्णा को देख।कभी-कभी तो उसके बालो में तेल लगाती तो कभी उसके साथ खूब बतियाती थी।जैसे पीहर से आई अपनी बेटी के साथ माँ घण्टो बाते करती है।

जो बहू घण्टो अपने घर वालो से बात करती थी,उसे कभी मेरा हाल-चाल पूछने का भी वक्त नही रहता।एक शुक्ला जी थे जो हर वक्त मेरा ख्याल रखते थे।कभी -कभी तो घण्टो मेरे सिरहाने माथे पर मेरे अपना हाथ रखे! जाप करते रहते,वो चाहते कि जल्द से जल्द मैं ठीक हो जाऊँ और हम यहाँ से चले जाएं।भागदौड़ से कभी-कभी वो इतना थक जाते की मेरे पास ही कुर्सी पर बैठते उन्हें नींद की झपकी आ जाती थी।यही वो वक्त रहता था जब उन्हें उठाकर बहू कुछ घरेलू कार्य से बाहर भेज देती जबकी इतनी सुविधा थी उसके पास की मचिस की तीली के लिए भी बाहर जाना न पड़े फिर भी।जाने किस बात का हमे सजा देते रहती थी।

आजकल अब शान्तनु आता तो वो भी कमरे में बंद हो जाता।उसका भी व्यवहार रूखा होने लगा।मैं कभी-कभी डर जाती कहीं एकलौता बेटा भी दूर न हो जाये।एक स्वार्थ तो उससे था कि हमारे चिता को अग्नि तो उसे ही देना था।अगर विदेश में बसे बच्चों की तरह ....है ईश्वर इसलिए हमने बहू के रूप में अपने बीच की लड़की लाई की ये दिन तो देखना न पड़े।

शुक्ला जी भी भीतर ही भीतर सूखते जा रहे थे।प्रेम के बोल ही काफी होता है,इंसान तो भूख भी भूल जाता है।पर बहू के द्वारा लगभग प्रतिदिन ससुर का अपमान,और उनका मौन देख मन काँप जाता था,किसी अनिष्ट के भय से।

पता नही अर्पणा ने शान्तनु को क्या बताया कि शान्तनु जो हमारा वीजा 1माह का बढ़वाया था। उसने हमारे लिए एयरएम्बुलेंस की व्यवस्था कर बैंगलोर भेजने को तैयार हो गया।

हालांकि इस व्यवस्था के लिए

शान्तनु की मैं हमेशा उपकार मानूंगी क्योकि मैं अपने सामने इन्हें इस तरह जलील होते देखना नही चाहती थी।

इन्होंने भी शान्तनु से कोई शिकायत नही की और कहा "बेटा तुमने और बहू ने हमारा बहूत ख्याल रखा ईश्वर तुम्हे सदैव सुखी रखे|"

        हम अपने उसी आशियाने में फिर से लौट आये जहाँ हम प्यार से रहते थे । काफी कुछ चढ़ाव -उतार का जीवन में अनुभव हुआ,पर सुकून था कि हम दोनों अपने आशियाने में लौट आये।शुक्ला जी का प्रेम और मेरा ध्यान रखना की ,धीरे धीरे मैं थोड़ा ठीक होने लग गयी। रेडियो में शुक्ला जी फिर से अपना मनपसंद गीत सुनते है।जीवन की ये साँझ अब इसी आशियाने में साथ गुजार रहे है ईश्वर से यही प्रार्थना है कि जीवन के इस अंतिम पढ़ाव में जो भी अकेला रह जाए उसके जीवन में कोई दुःख तकलीफ ना आये।



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