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Dr Padmavathi Pandyaram

Abstract

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Dr Padmavathi Pandyaram

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जाको राखें साइँया

जाको राखें साइँया

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वर्ष 2004 दिसम्बर का महीना 26 तारीख .. अविस्मरणीय ! कुछ तारीखें मन पटल पर ऐसे अंकित हो जाती है जिन्हें स्मृति कोश से मिटा पाना असंभव सा लगता है। और जब ऐसा प्रकरण जिस ने पूरी दुनिया में ही कहर ढा दिया हो ,पूरी मानव जाति को ही आतंकित कर दिया हो ....तो उस दुर्घटना की स्मृति भले ही व्यक्तिगत स्तर पर हमें उतना विचलित न करें.. पर मानवीय संवेदनाओं के चलते हम थोड़ा बहुत दुखी अवश्य हो जाते है। लेकिन सच मानिए .... अगर ऐसी ही किसी घटना की आँच हमतक भी पहुँच जाए... और हम अप्रत्याशित ढ़ंग से उससे बाल-बाल बच निकलें तो...तो फिर उसकी छाप मिटाए नहीं मिटती। इसे फिर चाहे ‘डर’कहें या ‘अज्ञात’ के प्रति कृतज्ञता भाव …… कुछ भी हो .. वह भुलाया नहीं जा सकता। हाँ ... ऐसे दुखांत समय के साथ धूमिल अवश्य हो जाते है लेकिन अवसर मिलते ही मन के  पतले कोनों से छितर कर बाहर निकल आते है .....डरा भी जाते है और..... घाव ताजा भी कर जाते है।

 क्रिसमस की छुट्टियाँ , घर मेहमानों से भरा हुआ था। दीदी का परिवार कलकत्ता से पहली बार हमारे पास चेन्नई आया हुआ था। तब हमें भी यहाँ बसे कुछ ही वर्ष हुए थे। हम भी इस नगर , यहाँ की संस्कृति ,परम्परा, बोली,  रीति-रिवाज, खाना पीना ,रहन सहन इत्यादि बातों को धीरे धीरे जान रहे थे ....समझ रहे थे ...और अपने को उस हिसाब से ढाल रहे थे। 

 ‘ चेन्नई’ ... बंगाल की खाडी के तट पर बसा हुआ दक्षिण भारत का मुख्य व्यावसायिक केंद्र। तमिलनाडु की राजधानी। ऐतिहासिक विरासत और संस्कृति का समागम ही नहीं बल्कि भक्ति और कला का भी संगम क्षेत्र है। प्राचीन संरचनाओं और वास्तुकला से निर्मित भव्य मंदिरों व धरोहर स्थलों का नगर। अतीत के काल खण्ड में निर्मित अद्वितीयमनमोहक कलाकृतियाँ। हर मंदिर शताब्दियों पूर्व तत्कालीन राजसी वैभव को दर्शाता हुआ। अध्यात्म का गढ़। चाहे वह फिर कापालीश्वर मंदिर हो या पार्थ सारथी मंदिर। हर मंदिर अपने आप में दिव्य... अद्भुत...दैदीप्यमान। पारम्परिक द्रविड़ शिल्प कला का उत्कृष्ट उदाहरण।

  हर दिन हम किसी न किसी स्थल और मंदिर का दर्शन करते हुए आनंदित हो रहे थे। उन्हें पूरा शहर घुमा कर दिखा रहे थे। 

  लेकिन केवल मंदिरों का दर्शन बच्चों को कैसे खुश कर सकता था। वैसेयहाँ समुद्री तट का आकर्षण भी कम नहीं है। मेरीना सागर तट और बीसेंट नगर दोनों ही बेहद खूबसूरत तट है यहाँ के। मेरीना में भीड -भाड कुछ अधिक होती है लेकिन बीसेंट नगर तब शांत हुआ करता था। जी भर के अथाह सागर की लहरों में खेलने की उत्तम पसंद। तो फिर क्या... हर शाम हमारी लहरों पर ही बीत रही थी। दिन ढलते ही आ जाते थे ... सागर में बच्चे और बड़े ..सब खूब खेलते ... फिर फ्रूट शॉप पर डेरा जम जाता ...‘जग्गर्नॉट केरामल शेक’ और बॉम्बे फ्रेंकी का आनंद लिया जाता ... और ...आनंदा भवन रेस्तरां में विशुद्ध दक्षिण भारतीय इडली दोसा का स्वादिष्ट रात्रि भोज। वाह! मौजां ही मौजां। और यह हमारा नियत कार्यक्रम बन चुका था।वैसे यहाँ बिहारी भैया के गोलगप्पों का ठेला भी हमने ढूँढ़ निकाला था। हम उनसे खूब बतियाते और जी भर के पानी-पूरी(यहाँ गोलगप्पों को यही कहा जाता है ) भी खाते। 

25 दिसम्बर.... क्रिसमस ...की शाम भी हम बीसेंट नगर सागर तट गए और पानी से खूब खिलवाड़ किया। खाया-पिया... खूब मस्ती की। 

  लेकिन बच्चों का मन अब भी नहीं भर रहा था। तब अचानक तय हुआ कि 26 की सुबह लंबी ड्राइव पर चलेंगे। योजना कुछ इस प्रकार बनी कि पहले मामलापुरम की ओर चलेंगे जिसे महाबलिपुरम भी कहा जाता है।  वह मद्रास से लगभग 45 कि.मी की दूरी पर है और सड़क होगी ....  ई .सी .आर. यानि (ईस्ट कोस्ट रोड ); ‘पूर्वी तटीय मार्ग’ । यह बंगाल की खाड़ी के समानांतर बनाई गई सड़क है जो 100 कि.मी तक सीधा पांडिचेरी तक जाती है जिसका अब सौंदर्यीकरण कर उसे राजमार्ग बना दिया गया है लेकिन वो तब उस समय में एकल सड़क थी। समुद्र के किनारे-किनारे सड़क पर फिसलती गाडी से आप बिना किसी अवरोध के नीले अथाह समुद्र को क्षितिज से मिलते देख सकते हैं और वो भी पूरे सफर आद्यांत।

 ई .सी आर मार्ग ( ईस्ट कोस्ट रोड़)  मामलापुरम के प्रस्तर र 

ऐतिहासिक धरोहर स्थल महाबलिपुरम अपने प्रस्तर चट्टानों पर बने रथों,मंदिरों ,गुफाओं और संग्रहालयों के लिए भी विख्यात है। वहाँ का सागर तट बहुत ही शांत और मनोरम होता है। शोर-गुल से पलायन की उत्तम जगह। तो तय हुआ कि कुछ समय वहाँ बिताने के बाद पॉंन्डिचेरी की ओर गमन किया जाएगा जो वहाँ से लगभग 100 कि. मी की दूरी पर है और समुद्र के समानांतर की सड़क से ही होगा सफर ....। पांडिचेरी में श्री अरविंद आश्रम और सागर तट का खूबसूरत मिलन। घूम फिर कर  फिर वहाँ से मध्याह्न भोजन के पश्चात संध्या को ‘ तिरुवन्नामलई मंदिर’ की ओर प्रस्थान किया जाएगा जो वहाँ से फिर लगभग 100कि.मी की दूरी पर स्थित है। मंदिर का दर्शन कर रात का भोजन बाहर .....फिर वापस राजमार्ग से चेन्नई वापस आ जाएंगे। .....अर्थात पूर्व से आरंभ कर पश्चिम में अंत.... यानि परिक्रमा पूर्ण। हमारी यह योजना सभी की सर्वसम्मति से पारित हो गई। समय सारणी भी तैयार की गई। सभी सदस्यों कोविशेषकर बच्चों को समय की पाबंदी पर निर्देश भी दिए गए। सब ने हामी भरी। सभी रोमांचित थे। फिर क्या था.... तैयारी शुरु हो गई। यात्रा की उत्तेजना ने रात को ठीक से सोने भी नहीं दिया।  


 सुबह सब जल्दी उठ गए। यात्रा का रोमांच ही कुछ ऐसा था। छुट्टियों में जो प्राणी दस बजे तक सूरज की रोशनी नहीं देखते थे , आज चार बजे ब्रह्ममुहुर्त में उठकर बैठ गए थे। अचानक घर के पुरुषों और बच्चों में कुछ खुसर-पुसर आरंभ हुई और सबने मिलकर एक स्वर में विस्फोटक घोषणा की कि आज सफर का भोजन वे बनाएंगे। शायद जल्दी उठने का दुष्प्रभाव ही था। दरअसल हमारी इस यात्रा के सहभागी थे... चार वयस्क, दो शरारती बच्चे जिनकी उम्र दस के नीचे थी और दोचपल बुजुर्ग जिनकी आयु साठ के ऊपर थी। इसीलिए पहले ही निर्णय कर लिया गया था कि एक समय का खाना हम घर से ही लेकर जाएंगे। वैसे तमिलनाडु में आपको राजमार्ग में कदम कदम पर शाकाहारी भोजनालय मिल ही जाएंगे। शायद मेरे ख्याल से यह ही एक ऐसा राज्य है जहाँ शुद्ध शाकाहारी भोजनालय सबसे अधिक सफल व्यापारिक उद्यमहै। हर रेस्तरां की अनगिनत शाखाएं , अनगिनत श्रृंखलाएं, अनगिनत शहरों में और विदेशों में भी मिल जाएंगी। 

तो तय हुआ था कि हम एक समय का खाना घर से ही लेकर जाएंगे और रात को थके हारे बाहर भोजन कर लिया जाएगा। 

  तो अब खाना बनाने की जिम्मेदारी  महिलाओं के हाथ से निकल कर पुरुषों और बच्चों के हाथ में चली गई थी। उन्होंने रसोई का अधिक्रमण किया और अंदर घुस कर सब दरवाजे बंद कर लिए। अंदर महाभोग की तैयारी जोर-शोर से होने लगी – टमाटर चावल’। लेकिन कुछ ही क्षणों में दरवाजे खुल गए और बाहर आकर हमसे लहसुन माँगा गया क्योंकि वह एक ‘अत्यावश्यक और अनिवार्य सामग्री’ था जिसके बिना भोग बनाना संभव नहीं था। दुर्भाग्य! घर में नहीं था। वैसे तो हमारे घर में लहसुननिषिद्ध तो नहीं लेकिन  हाँ, नियमित उपयोग में भी नहीं लाया जाता है। इस लिए कम ही मंगाया जाता है। तो अब ... रसोइयों की टोली बाहर निकली और हम पर बरस पडी ... हमें हमारी रसोई की अव्यवस्था का दिग्दर्शन कराया गया ,लहसुन के गुणों और उपयोगिता पर लंबा चौडा भाषण भी झाडा गया और लहसुन के प्रति हमारी कुत्सित संकीर्ण सोच का शुद्धीकरण किया गया.... लेकिन हाय ! अब क्या हो सकता था ... केवल प्रतीक्षा ही की जा सकती थी ... सुबह होने की ... दुकान खुलने की .... लहसुन खरीदने की। तब तक खाना बनाने का कार्यक्रम स्थगित कर दिया गया था। 

आखिर छः बज ही गए ... नुक्कड की दुकान खुली और लहसुन खरीद कर लाया गया फिर खाना बनाने की प्रक्रिया आरंभ की गई। तब तक सात बज चुके थे। हमारी योजना के अनुसार हमें अब तक गाडी में होना चाहिए था लेकिन प्रथम चरण में ही हमारी योजना हिलडुल गई। 

खैर ... खाना बंधा ... तैयारी पूर्ण हुई। साढे़ सात बज गए। 

अब अचानक झटका लगा। लगा जैसे सब कुछ हिला। कुछ कंपन महसूस हुआ। सब लोग थोड़े घबराए लेकिन फिर कुछ ही क्षणों में सब सामान्य हो गया था और हम सफर की उत्सुकता में सारा सामान गाडी में रखने लगे। बात आई-गई हो गई। किसी ने भी ध्यान नहीं दिया। 

 

हमारी गाडी चल पडी। हम उत्तरी मद्रास में रहते थे। पहले गाडी में पेट्रोल भराना था। तब तक आठ बज चुके थे। धूप चढ आई थी। सूरज सर पर आ धमके थे। वैसे भी सूर्य देव यहाँ कुछ ज्यादा ही मेहरबान और उदारमना होकर अपना ताप दक्षिणवासियों पर लुटाते है। अचानक सोचा इस गर्मी में सागर तट पर जाना बुद्धिमानी नहीं होगी इसीलिए दिशा परिवर्तन कर पहले हम पश्चिम की ओर चलेंगे। तब पहले तिरुवन्नामलईमंदिर आएगा , वहाँ से पांडिचेरी , फिर वहाँ से महाबलिपुरम पहुँचते शाम हो जाएगी तो शाम को पूनम की चाँदनी में लहरों का संगम ....26 दिसम्बर ...पूर्णमासी का चाँद.. ....अद्भुत आनंद रहेगा। और वहाँ से ई.सी.आर से वापस चेन्नई। वैसे ई.सी.आर से यात्रा अपने आप में एक बहुत ही सुखद अनुभूति से कम नहीं है। सबसे विचार किया गया और यह योजना सबको समुचित भी लगी। हमारी पूर्व निर्धारित सभी योजनाएं टूट रही थी। हर क्षण बदलाव। तो फिर एक और तबदीली हुई। अब की बार पेट्रोल पंप पर। अब पूर्व की ओर नहीं , विपरीत दिशा में पश्चिम की ओर प्रस्थान हुआ। 

शायद ईश्वर को यही मंजूर था। 

अब गाडी रिंग रोड से होती हुई तिरुचिरापल्ली राजमार्ग पर लगभग सौ कि.मी की दूरी तय करती हुई ‘तिंडीवानम’ शहर पहुँची जो राजमार्ग पर पड़ता है फिर वहाँ से गाँव की कच्ची सड़क पर तिरसठ कि.मी की दूरी पार करते ही तिरुवन्नामलई शहर आ जाता है। यहाँ से गाँव का खूबसूरत नजारा शुरु हो जाता है। सड़क के दोनों ओर घने विशाल छायादार वृक्ष , चारों ओर दूर-दूर तक फैले गन्ने के खेत,जहाँ तक दृष्टि जाए हरियाली ही हरियाली ,लहलहाती फसलें, आकाश का प्रतिबिम्ब दर्शाते हुए स्वच्छ पानी के तालाब , सड़क पर अब-तब घंटियाँ बजाती हुई गन्नों के बोझ से लदी मद्धम-मद्धम चलती हुई बैल-गाड़ियाँ , बड़ा ही मनभावन दृश्य होता है। 

अरुणाचल पर्वत के निकट बसा तीर्थ क्षेत्र ‘तिरुवन्नामलई। हमारा पहला पड़ाव ! आइए जब बात मंदिर की निकली है तो कुछ दूर और चले। कुछ विस्तार से जाने।

अरुणाचल पहाड़ी की तलहटी पर द्रविड़ स्थापत्य शैली पर बना हुआ एक भव्य मंदिर है ‘अरुणाचलेश्वर मंदिर’। यहाँ भगवान अग्नि लिंग का स्वरूप माने जाते है। जिस प्रकार उत्तर में पंच केदार और पंच बद्री पाए जाए है उसी प्रकार दक्षिण में पंच भूतों पर निर्मित शिवलिंगोंमें- पृथ्वी लिंग एकाम्बरेश्वर -कांची पुरम में, जल लिंग जम्बूकेश्वर- तिरुचिरापल्ली में , वायु लिंग- श्री काल हस्ती... आंध्र में , आकाश लिंग.. चिदम्बरम तमिलनाडु में और अग्नि लिंग यहाँ तिरुवन्नामलई में प्रतिष्ठित माना जाता है। मंदिर का परिसर तेईस एकड़ क्षेत्रफल में फैला हुआ है जहाँ चार दिशाओं में चार मुख्य द्वार हैं। चारों द्वारों पर ऊँचे गगन भेदी गोपुर (शिखर) बने हुए है जिनमें पूर्वी दिशा का गोपुर सबसे ऊँचा है। इसमें ग्यारह तल है और इसकी ऊँचाई 217 फीट है। चारों दिशाओं में स्वच्छ पानी की जलहरियाँ मिलती है। मंदिर के अंदर स्थापित पुरालेखोंमें इसके नवीं शताब्दी में चोला राजाओं के द्वारा निर्मित होने के प्रमाण सूत्र प्राप्त होते है। विशाल विस्तृत भू-भाग पर प्रतिष्ठित उत्कृष्ट संरचनात्मक वास्तु कला का उदाहरण यह अनूठा मंदिर प्राचीन संस्कृति की अनमोल धरोहर माना जाता है जिसकी शोभा वर्णित नहीं की जा सकती केवल इसे देख कर ही अनुभूत किया जा सकता है। यहाँ देवी पार्वती उन्नामलईअम्मन के नाम से पूजी जाती है। मंदिर के अंदर असंख्य अनुशांगिक देवालय भी बने हुए है जिनमें देवी का मंदिर प्रधान आकर्षण का केंद्र है। इसके अतिरिक्त वृहदाकार सहस्र स्तंभों वाला विशाल सभा मंडप भी विशेष दर्शनीय है। अंदर प्रवेश करते ही एकशिला खण्ड पर बनी नंदी की विराट प्रस्तर मूर्ति मन मोह लेती है। अंदर दाहिनी ओर पाताल लिंग स्थापित है जिसका मार्ग नीचे सीढीयाँ से होकर निकलता है। कहा जाता है कि श्री रमण महर्षि की तपस्या इसी स्थल पर फलीभूत हुई थी और यहीं उन्हें आत्म ज्ञान की प्राप्ति भी हुई थी।

अध्यात्म और दिव्यता का उत्तम सामंजस्य .....अरुणाचलेश्वर मंदिर ! 

चूंकि भगवान यहाँ अग्नि रूप में स्थित है इसीलिए ऐसा माना जाता है कि पूर्णमासी की तिथि को गिरि वलय’ अर्थात अरुणाचल गिरि की परिक्रमा करने से विशेष पुण्य फल प्राप्त होता है। 

इस मंदिर को ‘मणि पूरक स्थल ‘ के नाम से भी जाना जाता है। तंत्रसाधना के अनुसार मानव की शारीरिक संरचना में निहित षट्चक्रों में तृतीय चक्र को मणि पूरक चक्र कहते है जो ‘अग्नि’ का द्योतक माना गयाहै। इसीलिए अग्नि लिंग संभूत इस क्षेत्र को ‘ मणिपूरक स्थल’ भी कहा जाता है। यह क्षेत्र ‘संकल्प सिद्धि’ की साधना के लिए जीवंत स्थल है।

26 दिसम्बर पूर्णिमा थी। मंदिर भक्तों और श्रद्धालुओं से भरा हुआ था। अंदर सर्पिल कतारों में लोग खचाखच भरे हुए थे। भीड़ को देखकर हम घबरा गए। समय एक बज चुका था। भूख सता रही थी जो हमारी भक्ति की परीक्षा भी ले रही थी। वैसे तो हम कई बार इस महिमांवित मंदिर के दर्शन कर चुके थे , गिरि परिक्रमा भी की थी , लेकिन आज हम दर्शन नहीं कर पाए। हम सब उदास हो गए। सुबह से हमारा एक भी संकल्प सिद्ध नहीं हो रहा था। पता नहीं क्यों ? लेकिन क्या करते। भीड़ को देखकर दर्शन करने की अभिलाषा पर पानी फिर गया। हारकर मंदिर के अंदर ‘ध्वज स्तम्भ’ के निकट ही पूर्वाभिमुख होकर साष्टांग प्रणाम अर्पित कर हम बाहर निकल आए। अरुणाचल पहाडी की परिक्रमा हमने गाडी से ही की और भगवान का मानसिक दर्शन कर पुनः दर्शन प्राप्ति की प्रार्थना और क्षमा याचना दोनों गाडी में ही कर लीं। .  

हाँ ! बच्चों के मुरझाए हुए चेहरे  अब चमक उठे थे क्योंकि खाने की दरी बिछ चुकी थी। घनी छाँव में बैठ कर पहले पेट पूजा की गई। बड़े मनोयोग से बनाया हुआ भोजन चाव से मजे ले लेकर खाया सबने। और फिर कुछ देर सुस्ताने के बाद ..चल पडे अगले पडाव की ओर ....पांडिचेरी ....।  

पांडिचेरी  

तिरुवन्नामलई से सौ कि. मी की दूरी पर स्थित है महर्षि अरबिंदो की विश्राम-स्थली पांडिचेरी ...केंद्र शासित प्रदेश।

  फ्रांसीसी उपनिवेश का मुख्य प्रदेश जिसकी झलक आज भी फ्रेंचकालोनी में देखने को मिल जाती है। समुद्र तट पर बसा हुआ सुंदर शहर। देश- विदेश से सैलानी यहाँ आते है। नवागंतुकों के लिए दृश्य पर्व ! अथाह सागर का फैला हुआ कटाव। शांत... शुभ्र। शायद यही कारण रहा होगा जो महर्षि अरबिंद ने अपनी तपस्या के लिए इस स्थल को चुना था। 

सड़क के एक ओर कई अतिथि निवासबने हुए है जिनमें से अधिकतर आश्रम के ही अतिथि गृह है जो पूर्व सूचना देने पर बहुत कम दर पर उपलब्ध हो जाते है। मुख्य आकर्षण यहाँ ‘अरबिंद आश्रम’ है। घने वृक्षों से आच्छादित स्थल , जहाँ अंदर प्रवेश करते ही विभिन्न रंग -बिरंगेफूलो से सुसज्जित प्रकोष्ठ में महर्षि अरबिंद और उनकी शिष्या की संगमरमर से बनी समाधियाँ है। असीम शांति और निःशब्द वातावरण। आँखें मूँदे ध्यान मग्न साधक और आश्रमवासी। बड़ी ही रमणीय मनभावन जगह है। 

श्री अरविंद आश्रम समाधि

पांडिचेरी पहुँचते साढे पाँच बज गए थे। आज आश्रम जल्दी बंद हो गया था। सो वहाँ भी निराशा ही हाथ लगी। अंदर न जा पाए। शीत ऋतु .....दिन जल्दी ढलता है। सूर्य का तेज मद्धिम हो चला था। वैसे तो पांडिहमारा नियमित विहार स्थल बन चुका था यानि कई बार आ चुके थे लेकिन आज कुछ अलग ही दृश्य दृष्टिगोचर हो रहा था।  

 अब समुद्र-तट की ओर चले। वहाँ सड़क पर अफरा-तफरी मची हुईथी। पुलिस की गाडियों से निकलती कर्ण भेदी साइरनों की गूंजवातावरण को भयभीत बना रही थी। अचानक समुद्र की ओर दृष्टि गई तो देखते ही रह गए। अद्भुत नजारा था। लगभग आधा कि. मी परिधि तक का सागर रक्त रंजित वर्ण में रंगा हुआ था। गाढ़ा लाल रंग और उसके आगे नीला गहरा बादामी रंग का पानी। सागर के बीचों बीच ऊपर आसमान में डूबता हुआ सूर्य लाल रंग में चमक रहा था। लहरों पर उसकी किरणें चमकीली रोशनी के वलय बना रही थीं जिससे पानी इंद्रधनुषीनजर आ रहा था।। अभूतपूर्व दृश्य।

हम सब मंत्र मुग्ध होकर खड़े देख रहे थे कि अचानक तेज आवाजों से बुरी तरह चौंक गए। पुलिसवाले चिल्ला-चिल्लाकर हमें वहाँ से तत्क्षण निकल जाने का निर्देश दे रहे थे। या यूँ कहिए कि बलपूर्वक खदेड़ रहे थे। हम कुछ समझ न पाए क्योंकि हमें स्थानीय भाषा का तब उतना ज्ञान नहीं था। अजीब भगदड़ मची हुई थी। हम भी हड़बड़ी में सामने के रेस्तरां में घुस गए चाय के बहाने। वहाँ भी अजीब सा लगा। रेस्तराँ खाली था और कर्मचारियों के चेहरों का रंग उड़ा हुआ था।

निस्तेज चेहरों पर डर का आतंक। आँखों की पुतलियों पर भय की कालिमा ऐसे फैली हुई थी मानो अभी-अभी किसी भयानक दृश्य को पास से देखा हो। 

वे हमें भी ऐसे घूर रहे थे जैसे किसी हौवा को देख रहे हों। 

हम अचंभित। कुछ समझ न सके। पूछा..... 

‘क्या हुआ भाई? ये सब क्या हो रहा है? इतनी पुलिस ? और क्यों सबको भगाया जा रहा है? क्या माजरा है? आखिर हुआ क्या ?  

वे कुछ कह न पा रहे थे। अस्फुट शब्दों में उन्होंने हमें कुछ समझाने का प्रयास किया....

‘क्या आपको नहीं पता? आज सुबह अचानक धरती हिल गई ... भूकम्पआया ... और फिर समुद्र कुछ क्षणों के लिए पीछे हट गया .. सब चकित हो गए ...समुद्र के सब जीव जंतु सीप मोती सब सामने दिखाई देने लगे। फिर अचानक भारी भरकम आवाज से समुद्र में तेज उफान आया। समुद्र की एक भीमकाय लहर आसमान को छूती हुई उठी और भंयकर गर्जना करते हुए दौड़ती हुई आई ........ सीमा लाँघ कर सड़क पार कर यहाँ तक आ गई .. दीवारें फांद कर पानी अंदर घुस गया। सब अचानक हो गया। किसी को कुछ पता ही नहीं चला कि क्या हुआ……क्या हो रहा है ? सब आश्चर्यचकित ......कुछ क्षण बाद लहर पीछे बह गई लेकिन तब तक अपने साथ बहुत कुछ बहा ले गई। यहां समुद्र में मछुआरों को कई छोटी छोटी किश्तियाँ थी ,लेकिन पलक झपकते ही सब अदृश्य हो गईं। और तो और पास ही तीस कि. मी की दूरी पर का गाँव ‘कडलोर’ तो पूरी तरह से तबाह हो गया। सब कुछ समुद्र के गर्भ में समा गया। अब वहाँ कुछ नहीं है। सब कुछ निगल लिया। हजारों लोगों की जान चली गई। मामलापुरम और मेरीना तट पर सुबह टहलने वाले कई लोग लापता है .....लोग... मछुआरों की नावें...... सब अदृश्य। कुछ नहीं बचा। आशंका जताई जा रही है समुद्र फिर उफनेगा। आप जल्दी चले जाइए। ई सी आर से नहीं राजमार्ग से। जैसे आये ...वैसे। लंबा रास्ता होगा लेकिन इन हालातों में वही सुरक्षित रहेगा’। वे हमें चले जाने का बार- बार इशारा कर रहे थे। 

अब भयभीत होने की हमारी बारी थी। चाय गले में ही अटक गई। निगल भी न पा रहे थे। लेकिन उनकी बाते न जाने क्यों अविश्वसनीय  लग रही थी। यूं कहो तो हम रोमांचित अधिक हुए थे और भयभीत कम। सब छोड हम गाडी की ओर दौडे और फर्राटे से कार भगाई। साहसी निर्णय लिया और भय से साक्षात्कार करने के लिए ई सी आर रोड को ही चुना। हम घर जल्दी पहुँचना नहीं चाहते थे। और अब तो सब अपनी आँखों से देखकर अनुभूत करने की जिज्ञासा भी जग गई थी। सूरज डूब गया था। हल्का अंधेरा हो चला था।  

सौ कि. मी का रास्ता था ! हम बेखबर आगे बढ रहे थे। सड़क बिल्कुलखाली थी। रास्ते में कई गाँव पडते है और काफी हलचल भी रहती है।लेकिन आज पाया.....सुनसान मार्ग और हर मार्ग पर बत्तियाँ गुल। केवल गुप्प अंधेरा। पूर्णमासी का चाँद निकल आया था। आकाश साफ था तारों से लदा हुआ। चाँद की स्निग्ध रोशनी …….चाँद अपनी पूरी रवानी पर था। समुद्र भी अब अपने मचाए उपद्रव से थक कर शांत चुपचाप पडा था। किसी भी गाँव में रोशनी नजर नहीं आ रही थी। अधिकतर मछुआरों की ही बस्तियाँ थी जो शायद उजड़ चुकी थी। आज सब सुनसान ....शांत। हमारी अकेली गाडी सड़क पर भाग रही थी। दहशत का वातावरण हम अब कुछ कुछ अनुभूत कर रहे थे।   

रास्ते में मामलापुरम के पास एक रेस्तरां हुआ करता था ।छोटा सा हरा-भरा बगीचा बीच में बच्चों के झूले और कुछ चार -पाँच कुर्सियाँ । सफर में कुछ देर सुस्ताने का तात्कालिक पड़ाव। ज्यादा तो कुछ नहीं पर कॉफी,चाय नाश्ता मिल जाता था। हल्के भी हो जाते थे। तो आज भी वहाँ गाडी रोकी। सात बज चुके थे। यहाँ भी सब सुनसान। केवल समुद्र के थपेड़ों की आवाज.... निःशब्द वातावरण। 

वहाँ रेस्तराँ में एक दो काम करने वाले ही थे जो शटर बंद करने की जल्दी में थे। आज हमें कुछ न मिला। फिर भी हमने उन्हें रोक कर जानना चाहा कि सुबह क्या हुआ था? उन्होंने क्या देखा था?

उन्होंने डरते डरते बताया कि किस तरह सुबह कइयों को पलक झपकते ही अपनी आँखों के सामने अदृश्य होते हुए देखा था। वे सब भी आशंकित थे कि रात को समुद्र फिर उफनेगा और तबाही मचाएगा। इसीलिए वे सब बंद करके जा रहे थे। वे हमारे लिए भी चिंतित हुए और हमें जल्दी वहां से निकल जाने की हिदायत दी। 

हम वापस कार में आ गए। हममें उत्सुकता पल पल और भी बढ़ रही थी। 

दो घंटे का रास्ता एक घंटे में ही कट गया। आवागमन नहीं था और गति भी तेज थी। सांय-सांय करती सड़क। केवल हमारी गाडी ......और कोई नहीं। कभी कभार दूर से कहीं पुलिस सायरन की आवाज सुनाई दे जाती और फिर....लम्बी भयानक शांति। हम बडे चले जा रहे थे। हम सबकीधड़कने गाड़ी की गति की तरह तेज हो रही थीं। शायद किसी अप्रत्याशित संभावना से। कभी भी.... कुछ भी हो सकता था। सब तन कर बैठे हुए थे। एक दूसरे का हाथ पकडे हुए....मन ही मन अपने आप को तसल्ली देते हुए। सब साथ थे.....इसीलिए शायद डर नहीं लग रहा था। राह में कोई समस्या उत्पन्न नहीं हुई। हम ‘सकुशल’ चेन्नई पहुँच गए।

ई.सी.आर मार्ग मेरीना पर आकर ही खत्म हो जाता है। मेरीना सड़क से ही होकर जाना था। यहाँ तो और भी अनोखा दृश्य देखने को मिला। चेन्नई में समुद्र का सागर तट मुख्य सड़क से काफी दूरी पर स्थित है। लगभग सात सौ मीटर का अंतर हो सकता है जहाँ समुद्री रेत पसरी हुई है। फिर ढलान और उफनती बंगाल की खाडी। लेकिन आज वो देखा किसकी कभी कल्पना भी न की थी। मछुआरों की नावें आज सड़क की शोभा बढारही थी। सब नावें आज सड़क पर आ पहुँची थी।आश्चर्य ! हमें कुछ कुछसमझ आ रहा था। मन अब भी मान नहीं रहा था। पर जो देखा वह झुठलाया भी नहीं जा सकता था। लेकिन अब भी वह ‘ डर’न जागा था। 

  घर पहुँचकर टी वी पर जो देखा वह अविश्वसनीय…..कल्पनातीत ....चौंका देने वाला था। आँखों देखा हाल ...भयानक .... डरावना... बीभत्स .....। उस दहशत का वैज्ञानिक ढ़ंग से विश्लेषण भी किया जा रहा था .... किस तरह समुद्र की सतह में कंपन हुआ, भूमि काँप उठी.... समुद्र की प्लेट किस तरह पीछे को झुक गई ....कुछ पलों के लिए पानी पीछे हट गया,…. फिर पानी ऊपर उठा.....बहुत ऊपर उठा .....और तेज आवाज से .... अपनी सीमा को तोड़ता हुआ आगे बड़ा.... समुद्र.. जमीन के एक बडे हिस्से को निगल गया...... उफ्फ ...कितना भयंकर रहा होगा वो दृश्य ....। 

तमिलनाडु में लगभग आठ हजार से भी अधिक जानें उन राक्षसी लहरों की बलि चढ़ गई थी। कई हजारों लापता हो गए थे। भयंकर तबाही मच गई थी। चारों ओर दहशत...... सब उलट -पलट हो गया था। पल में सब बदल गया था। समुद्र किनारे बसे मछुआरों के गाँव के गाँव अदृश्य हो गए थे। बस्तियों का नामों निशान भी मिट गया था।  उफनती लहरों की मचाई तबाही का सजीव चित्रीकरण टी वी पर देखकर दिल दहल गया। हाँ ! जो डर कल्पना पैदा न कर सकी ,वह डर जीवंत दृश्यों को देखकर दिलो दिमाग को झनझना गया।   

आखिर डर जाग ही गया ....लेकिन... वह डर जागा किससे ....? समुद्र की लहरों के उफान से या उन उफनती लहरों के बीच हमारी संभावित उपस्थिति से ? पता नहीं। लेकिन डर जाग ही गया। यह सोचकर तो रीड़ की हड्डी में ठंडी लहर दौड़ आती कि किस तरह मौत हमारे पीछे थी और हम उसको लाँघ कर चले जा रहे थे। आँख मिचौनी खेलते हुए हम ने उसे मात दे दी थी। हर मोड़ पर उसने चुनौती दी थी। हर मोड़ पर उसने पीछा किया था। और हम अज्ञात थे उसकी आहट से। हमने तो पूरी तैयारी कर ली थी उसके मुंह में जाने के लिए...........। 

वो कौन सी शक्ति थी जो हमें हर पल बचा रही थी ? हमारी योजनाओं को असफल कर रही थी ? +

अब हम डर गए। सचमुच बहुत डर गए। 

इतना डरे कि इतने वर्षों पश्चात आज भी कभी उस दिन का स्मरण आता है तो हमारे रोंगटे खड़े हो जाते है। 

हमारा डर तो और भी गहराने लगता है जब हम यह सोचते है कि ..... अगर उस दिन खाना हम बनाते... लहसुन के लिए समय बर्बाद न करते .... सब समय पर हो जाता.... हमारी नियत योजना असफल न होती .......दिन निकलने से पहले तैयार हो जाते.... सूरज सर पर न चढ़्ता..... पेट्रोल पंप पर दिशा न बदलते..... पश्चिम की जगह पूर्व की ओर ही निकलते........ तो.......  निर्णीत यात्रा के अनुसार हम ठीक साढ़े सात बजे मामलापुरम पहुँच जाते क्योंकि सुबह यातायात कम ही होता है ....और मामलापुरम में ‘सुनामी’ ने ( जो नाम उसे बाद में मिला था ), ठीक सात बजकर चालीस मिनट पर ही दस्तक दी थी ...............।  

उसके बाद तो हमारी कई कई रातों की नींद उचट गई। कल्पना में बिम्ब उतरते रहते कि हम सब समुद्र में खेल रहे है और अचानक उफनती लहरों का बवण्डर .... उफ्फ ! कितना भयंकर दृश्य रहा होगा वह......... 

26 दिसम्बर 2004 -सुनामी 

लेकिन ईश्वर को तो कुछ और ही मंजूर था ! 


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