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ashok kumar bhatnagar

Tragedy Inspirational

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ashok kumar bhatnagar

Tragedy Inspirational

इस रिश्ते का नाम ? ( भाग दो )"

इस रिश्ते का नाम ? ( भाग दो )"

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सड़क के दूसरी ओर और मेरी खिड़की के सामने एक मकान था। इस मकान में एक बृद्ध पति-पत्नी रहते थे। पति एक वैद्य थे और वह चिकित्सा क्षेत्र में सेवा करते थे। उन्होंने एक आयुर्वेदिक अस्पताल चलाना शुरू किया था, जिसका नाम "परोपकारी औषधालय" था। उनकी दुकान मेरी खिड़की के सामने स्थित थी, और वहाँ पर होने वाली गतिविधियाँ मुझे साफ दिखाई देती थीं।

वह बृद्ध पति बहुत समझदार और दयालु व्यक्ति थे। उनका उद्देश्य सिर्फ लाभ कमाने से ज्यादा था, उनका उद्देश्य लोगों की मदद करना था। उनकी दुकान में रोजाना अनेक लोग आते थे, जिन्हें वह अपनी विशेषज्ञता से उपचार देते थे।

 मैं उन बृद्ध पति-पत्नी की संघर्ष, उनकी दया और समर्पण भरी सेवा को महसूस करती थी।  "परोपकारी औषधालय"  न केवल उपचार करता था, बल्कि उनकी मदद से लोगों में आत्म-विश्वास और आत्म-समर्पण की भावना भी जागृत हो रही थी।  हमें यह सिखाती  थी कि अगर हमारा हृदय सहायता और सेवा की ओर उत्सुक हो, तो हम किसी की भी मदद कर सकते हैं, चाहे हमारी सामग्री कितनी भी सीमित क्यों न हो।  सच्ची सेवा का मायना यह नहीं होता कि हमें किसी बड़ी जगह पर पहुंचना चाहिए, बल्कि यह उस व्यक्ति की मदद करना है जो हमारी सहायता की आवश्यकता है। 

उन  बृद्ध दंपती के दो बेटियां और एक बेटा था। उनकी बेटियों की शादी हो गई थी और उनका बेटा मुरादाबाद शहर के बाहर किसी कस्बे में इंटर कॉलेज में अध्यापक था। वह बहुत लम्बा था, सात फीट के आस-पास, और उसका रंग बिल्कुल गोरा था। उसका माथा चौड़ा था और सर पर काले, घने, घुंघराले बाल थे। बोह गबरू जवान था, जिसकी पर्सनैलिटी के कारण अनेक लड़कियाँ उस पर फ़िदा रहती थीं। जवानी, सुंदरता, इश्क़ और कामुकता ने उसे दिल फेंक बना दिया था।  

बगैर यह जाने की इन सबका नतीजा क्या होगा, वह उस दल-दल में अजीब सा  शकून  महसूस कर रहा था। वास्तविक सुख और शांति की प्राप्ति केवल बाहरी दुनिया में नहीं, बल्कि अपनी आत्मा की गहराईयों में जाकर होती है। इसलिए, हमें अपनी आत्मा की शांति की खोज में जाने का समय निकालना चाहिए, जिससे हम वास्तविक और संवेदनात्मक संपन्नता की प्राप्ति कर सकें।

जब आप कामुकता और रंगरेलिओ के गंदगी की दल-दल में फंस जाते हो और समय से निकल नहीं पाते, तो उसका नतीजा भयानक होता है। बैध जी जे बेटे के साथ भी ऐसा ही हुआ और एक दिन जहर खाने से उसकी मृत्यु हो गई।

जितने  मुंह   उतनी बाते ! कुछ कहते हैं कि हर लड़की उससे शादी का दबाव बना रही थी और उसने शादी एक से ही करनी थी। इसलिए उसने आत्महत्या कर ली। कुछ लोग कहते हैं कि उसी की किसी प्रेमिका ने उसे जहर दे दिया। 

बेटे की मौत के बाद, दोनों बृद्ध दंपति बुरी तरह से टूट गए थे। जिंदगी से निराश हो गए थे, उनके जवान बेटे की मौत ने उनकी आत्मा को भयंकर त्रासदी में डाल दिया था।वे हमेशा अपने जवान बेटे की ख्यालीपुलाव करते थे, उसकी मुस्कान, उसकी हर बात, सब कुछ उनके दिल में बसी रहती थी। उनकी मौत  ने  संघर्ष की भावना को भी नष्ट कर दिया था।

वे हर रोज़ अपनी किस्मत और भाग्य को कोसते थे, पूछते थे कि ऐसा क्यों हुआ। क्या  भगवान  नाराज़ थे? या फिर उनकी कोई गलतियाँ थीं?मेरी समझ में नहीं आता था कि एक इतनी बेहद प्यारी और समझदार आत्मा को ऐसा दर्द क्यों सहना पड़ रहा है।उनकी जिंदगी में वह खालीपन घूमता रहता था, जिसे कोई भर नहीं सकता था।  

उनके औषधालय में अब सन्नाटा छा गया था। वहाँ पर किसी भी मरीज़ का चेहरा नहीं देखने को मिलता था। 


उनके औषधालय में शांति की वातावरण सीमित हो गई थी। मरीज भी धीरे-धीरे कम हो गए थे, और उनकी खोई हुई मुस्कान भी कहीं खो गई थी। धीरे-धीरे उनकी दुकान में जिंदगी की गतिविधियाँ बंद हो गई थीं, जैसे कि उनकी आत्मा भी अपने पुत्र के साथ चली गई हो।


कभी-कभी वे दोनों अपने औषधालय में आकर चुपचाप बैठे रहते थे। उनकी आँखों में गहरी सोच बसी रहती थी, जैसे कि वह अपने बीते हुए समय की यादों में खोए हुए थे। अब उनकी बातें केवल स्मृतियों में ही बची थीं, जो उन्हें उस समय की याद दिलाती थी जब उनका औषधालय भरा हुआ था, और उनकी सेवा का संकल्प मजबूत था।


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