निशान्त मिश्र

Children Classics Inspirational


4.0  

निशान्त मिश्र

Children Classics Inspirational


इंजन की कहानी (The Tubewell)

इंजन की कहानी (The Tubewell)

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यूँ तो इंजन का सही उच्चारण इंजिन (engine) है, और यह शब्द मैकेनिकल है। मैकेनिकल इंजीनियरिंग में इंजन की परिभाषा एक सधी हुई भाषा में दी जाती है, यह मैंने पढ़ा है। इंजन की क्षमता (capacity) पर बहुत कुछ लिखा – पढ़ा गया है। तरह – तरह के इंजनों को विभिन्न श्रेणियों के अंतर्गत रखा गया है। यहाँ पर मैं “इंजिन” कि बात न करके “इंजन” की बात करूँगा, जिसकी क्षमता का आंकलन किसी भी प्रकार के गणितीय सूत्र द्वारा करना मुश्किल है, क्योंकि यह भौतिक (physical) नहीं है, बल्कि मानसिक है, आत्मिक है। इसके लिए आई. क्यू की नहीं, ई. क्यू. की बात करनी पड़ेगी।


“इंजन”, का अर्थ गाँव में ट्यूबवेल से है। वस्तुतः “इंजन”, ट्यूबवेल से कहीं अधिक सरल और ग्राह्य है तथा सामान्य बातचीत में सुगमता से प्रयोग किया जा सकता है। इसके लिए अभियांत्रिकी अथवा श्वानभाषा (अंग्रेजी) के मूलभूत ज्ञान कि आवश्यकता कतई नहीं है, तभी तो इ, ई, च, छ, ज, और त, थ, द, ध, न नहीं जानने वाले भी इंजन को जानते - समझते हैं।


यूँ तो सिचाई के लिए ही मुख्यतः इंजन का इस्तेमाल होता है, लेकिन इसके अतिरिक्त इंजन कैसे रोजमर्रा के जीवन का अभिन्न अंग बन सकता है, यह मैंने अपने घर (गाँव) में देखा। प्रायः इंजन, इंजन – घर में ही होता देखा गया है। गाँव भर में किसी का भी इंजन घर की परिधि में न होकर खेतों में बने इंजन – घर में होता, किंतु अपवाद स्वरुप हमारे घर में ही इंजन को स्थापित किया गया था। आज भी वह उसी स्थान पर है, जहाँ पर उस समय था (यहाँ आज का आशय आज के दस वर्ष पूर्व से है)। वैसे हमारे दो खेत घर से ही सटे हुए थे। हालाँकि बाकी खेत वहां से दूर थे, तो उनकी सिंचाई हेतु मेड़ें और नालियाँ बनी हुई थीं।


इंजन के लिए मेरे जीवन का अभिन्न अंग बन जाना स्वाभाविक था; इंजन किसी भी कार्य हेतु चलाया जाता, मेरी उपस्थिति वहां पर ठीक उसी प्रकार से होती जिस प्रकार बर्फ की फेरी वाले के आने पर अन्य बच्चों की गलियारे में। इंजन के चालू होने कि प्रक्रिया बड़े ही ध्यान से देखी जाती और पानी के निकलने की प्रतीक्षा बड़े ही धैर्य से की जाती। जैसे - जैसे फुक-फुक की ध्वनि पहले से तेज होती जाती, मन में जलतरंग बजने की शुरुआत होने लगती। सबसे पहले बहुत ही पतली धर निकलती जिसे देखकर मोती धार की कल्पना में मन प्रसन्नता से हिलोरें मारने लगता।


मोती धार के निकलते ही यह निश्चित हो जाता कि प्रतीक्षा कि घड़ियाँ अब ख़त्म हो गयी हैं और टंकी में कूदने का मुहूर्त निकल आया है। इस पर भी बड़े धैर्य का परिचय देते हुए मैं पानी के गंतव्य को देखते हुए उसके पीछे जाता और प्रतीक्षा करता कि जब अन्य भ्रातागण भी सामूहिक रूप से टंकी से लोहा लेने आ पहुँचेंगे तो मैं भी उनके साथ उस आनंद-सरिता में गोते लगा सकूंगा।


इंजन का पानी बड़ी टंकी से होते हुए छोटी टंकी में गिरता, फिर एक छोटी नाली से होते हुए बाहर की बड़ी नाली से गुजरते हुए, खेतों में ले जाया जाता। जिस भी खेत की सिंचाई की आवश्यकता होती, वहां की मेड़ तोड़कर फलाँ खेत की ओर मोड़ दी जाती तथा आगे की मेड़ को ब्लॉक (बंद) कर दिया जाता।


छोटी नाली के निर्गम स्थल पर दीवार से सटा हुए कनेर का पौधा और उसके बगल में सफेदा का पेड़ था। कनेर के पौधे में खिले असंख्य फूलों को गिनने का काम बड़ा ही दुष्कर जान पड़ता क्योंकि इतनी अधिक संख्या प्रायः किसी भी प्रकार के पौधे में मैंने पहले कभी नहीं देखी थी। इसका सबसे बड़ा कारण कनेर के पौधे का ठीक नाली के किनारे उगे होना तथा स्वच्छंद स्थान पर स्थित होना था। जो भी हो, पीले फूलों की उस वाटिका से वहाँ एक दैवीय उपस्थिति का अनुभव सहज ही होने लगता। पूजा हेतु कभी भी फूल चुनने पड़ते हों, ऐसा मैंने कभी देखा ही नहीं। स्वतः ही बहुत से फूल डाली छूने भर से हाथों में आ जाते। इंजन के समीप होने से उस कनेर को कितना आनंद मिलता रहा रहा होगा, यह उसके फूलों की संख्या को देखकर सहज ही समझा जा सकता है। उस पतली सी नाली में किसिम किसिम के कंकडों, पत्थरों की उपस्थिति उसे एक छोटी सी नदी का रूप दे देते। सूक्ष्म जीवों के लिए तो यह बात सर्वदा सत्य होती। नाली के पानी की स्वच्छता उसकी निरंतरता का प्रतीक होती। बहुत प्रकार के कीड़े-मकोड़े भी नाली की सरहद में दिखाई पड़ते, विशेषतः तब जबकि इंजन चलता।


यहाँ तक कि छोटे-छोटे केकड़ेनुमा जीव भी नाली में तैरते देखे जाते। मेढकों की संख्या तो अनगिनत होती। नाली में बहते हुए कनेर के पीले फूल और सफेदा की चमकीली पत्तियां ऐसा आभास देते जैसे माँ अन्नपूर्णा की स्तुति हेतु कनेर और सफेदा इंजन चलने की प्रतीक्षा नित दिन कर रहे हों। इंजन के जल में पुष्पों, पत्तियों को ‘वे’ खेतों को अर्पण किया करते और जीवों की निःस्वार्थ सेवा हेतु परमपद का पात्र होने की अनुशंसा किया करते। प्रकृति के विभिन्न तत्वों के आपसी संबंधों में स्तरीय भावों का मूल्यांकन करना सहज तो नहीं है, परन्तु उनके मध्य रहकर, उनसे जुड़ कर, इसे समझा जा सकता है; ऐसा अनुभव मेरा रहा है।


एक दूसरे के प्रति सम्मान का भाव रखते हुए, दूर रहकर भी प्रेम के पुष्पों को अर्पित करते हुए, संबंधों की गरिमा को बनाए रखते हुए, कभी न टूटने वाले बंधन कैसे बनाए जा सकते हैं, ये सीखने के लिए हमें किसी उच्च कोटि के प्रबंधन संसथान में जाने की आवश्यकता महसूस हो तो हमें समझ लेना चाहिए कि हमारे भीतर का प्रकृति तत्व या तो समाप्त हो गया है, या हमें मिला ही नहीं! आज विभिन्न प्रबंधन संस्थान पचास-पचास हज़ार लेकर मानवीय संबंधों को स्थापित करने, सामाजिक मूल्यों को समझने और स्वयं-विकास कैसे करें जैसे मूलभूत तत्वों को दो-तीन दिन में समझाने का दावा करते हैं। इसका साफ़ मतलब है कि आज के मनुष्य को यह मूलभूत तत्व विरासत में नहीं मिल रहे हैं, और वह इनकी खोज में भटक रहा है, क्योंकि भौतिकता से ग्रसित होने पर मानसिक सुख आत्मिक सुख नहीं बन पाता और अन्दर ही अन्दर कचोटता रहता है।


इंजन यूं ही बरसों बरस मेरे बचपन की याद बना रहा और अब मेरे ह्रदय से हते हुए इन पन्नों पर छपा जा रहा है। पहले तो मुझे इंजन के पानी में आह्लादित होने के लिए अन्य लोगों पर निर्भर रहना पड़ता क्योंकि मैं उसे चालू नहीं कर पाटा था, लेकिन धीरे-धीरे जब मैं इंजन चलने में अर्धनिपुण हो गया तो मैं जब तब इंजन चला देता और थोड़ी ही देर में पाताल गंगा का आशीर्वाद पा लेता। घर के विभिन्न कार्यों के लिए पानी की आवश्यकता होती तो मैं सहर्ष इंजन कि ओर लपक पड़ता। अथक प्रयत्नों के बाद भी यदि कभी मैं असफल हो जाता तो भी अनवरत प्रयास करता रहता। इससे एक बात तो निश्चित हो जाती है कि जिस कार्य में आनंद आता हो, उसी में सफलता निश्चित रहती है, क्योंकि भीतर का उत्साह असफलता के भाव को हावी नहीं होने देता, जोकि सफलता के लिए सर्वप्रथम शर्त है।


इंजन की एक और कहानी सुनाये बगैर इंजन कि गाथा अधूरी रह जाएगी। नाना जी का इंजन बहुत ही पुराने समय का था और उसके कलपुर्जे बड़े ही दुर्लभ तथा महंगे हो चले थे। फिर भी नाना जी के अथक प्रयासों के बलबूते ‘वो’ पानी खींच ही लाता। ऐसा नहीं था कि इंजन हमेशा से ऐसा ही रहा हो; बहुत पहले इंजन बड़ी सरलता से चालू जाता और बिना रूकावट घंटों चलता रहता। गाँव भर के बच्चे टंकी में कूद-कूद नहाते। टंकी छोटी थी, इसलिए दुबकी लगाने में थोड़ी परेशानी समझ आती। धीरे-धीरे इंजन ने टंकी का साथ छोड़ दिया; वो सूख गयी, फिर भी अपने स्थान पर जमी रही जब तक कि इंजन-घर जमा रहा। दोनों ही एक दुसरे को अतीत के गीत सुनाते हुए कब स्वयं अतीत बन गए, पता ही नहीं चला। बचपन के साथी से ऐसे बिछोह की आशा मुझे कभी न थी। बाल मन तो ये ही जानता था कि जो आज है, वो कल भी रहेगा, वैसा ही रहेगा!


एक इंजन नाना के गाँव में ऐसा था जिसकी टंकी बहुत ही ऊंची थी। उसमें गोते लगाना बहुत ही मनोरंजक था, किंतु अकेले नहाना बहुत ही भयग्रस्त कर देता। इसका कारण था कि उस टंकी में डूब जाने की एक-दो घटनाएँ मैंने सुनी थीं, और इसीलिए एक स्थायी भय टंकी के प्रति मन में बैठ गया था। फिर भी एक-दो बच्चों की संगति में मैं टंकी में खूब गोते लगता और इंजन के अविष्कारक को बुद्धि सुलभ धन्यवाद देता।


ये अनुभूतियाँ बहुत दुर्लभ नहीं हैं, परन्तु जब आज का बचपन देखता हूँ तो यही अनुभूतियाँ बहुत बड़ी उपलब्धि नज़र आती हैं। आज का बचपन उन अनुभूतियों को अतीत के पन्नों से भी मिटा कर आई है इस डर से कि कहीं धोखे से अतीत के वो पन्ने अगली पीढ़ी के हाथ न लग जाएँ। कुछ तो पिछड़ेपन की खोह समझकर इसमें घुसने से डरते हैं, और कुछ ये सोचकर कि कहीं उस अतीत का मर्मश्पर्शी प्रभाव अगली पीढ़ी को बेचैन न कर दे।


जो भी हो मैं उस सुनहरे अतीत को बार-बार याद करता रहूँगा, और अपनी अगली पीढ़ी क्या कई पीढ़ियों तक पहुंचाने की कामना करूँगा क्योंकि मेरा वर्तमान, मेरे अतीत से अलग करने की कला मुझे अभी सीखनी बाकी है।


निशान्त मिश्र



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