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Sunil Joshi

Inspirational


4  

Sunil Joshi

Inspirational


ईर्ष्या

ईर्ष्या

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आशीष और सुशील दोनों ही इंजीनियरिंग के तीसरे वर्ष के एक ही कक्षा के छात्र थे। दोनों दोस्‍त तो नहीं लेकिन एक ही कक्षा में होने से बस जान पहचान थी।

आशीष एक अच्‍छा डांसर भी था और पिछले दो वर्षों से केवल अपने कॉलेज की प्रतियोगिता में ही नहीं बल्कि अंतमहाविद्यालय प्रतियोगिता में वो ही प्रथम आ रहा था और इस वर्ष भी आशीष पूरी तैयारी कर रहा था। यूँ तो सुशील ने इस प्रतियोगिता में कभी भाग नहीं लिया लेकिन उसके दोस्‍त जानते थे कि वो भी एक अच्‍छा डांसर है और आशीष को कोई हरा सकता है तो केवल सुशील ही हरा सकता है। इस वर्ष न जाने क्‍यों‍ सुशील के दोस्‍त उसके पीछे ही पड़ गए और आखिरकार उसको भी प्रतियोगिता में अपना नाम देना पड़ा।

जब ये बात आशीष को उसके दोस्‍तों से पता लगा तो उसने मजाक में उड़ा दिया कि अरे वो तो किसी से बात करने में भी झेंपता है और स्‍टेज पर जाकर खड़ा होना ही बड़ी बात है , और वो डांस करेगा। ''

उसके दोस्‍तों ने उसे समझाया कि ठीक है वो कभी स्‍टेज पे नहीं गया लेकिन सुना है डांस अच्‍छा करता है।लेकिन आशीष अपने घमंडी आवाज में कहता'' अब किसी को मेरे सामने अपनी इज्‍जत उतरवानी हो तो मैं क्‍या कर सकता हूँ।''

इधर सुशील को लग रहा था कि उसके दोस्‍तों के कहने से नाम तो दे दिया है लेकिन कभी स्‍टेज पर तो गया नहीं, न जाने क्‍या होगा ? उसने जब अपने दोस्‍तों से ये बात कही तो वो कहने लगे'' अरे यार कॉन्‍फीडेंस रख, सब बढि़या होगा। '' कोई कहता'' यार फिकर नोट करने का, ज्‍यादा से ज्‍यादा क्‍या होगा फर्स्‍ट नहीं आएगा लेकिन तेरा स्‍टेज फीयर तो निकलेगा।''

इन्‍हीं सब असमंजस और जैसी तैसी तैयारी के बीच वो दिन भी आ गया जब कॉलेज की डांस प्रतियोगिता थी। कई प्रतिभागी थे, लेकिन सबको यही था कि इस बार भी जीतेगा तो आशीष ही। आशीष को खुद को तो भरोसा था ही। लेकिन इस बार सुशील की एंट्री नई थी। जो उसे जानते थे वे सब आश्‍चर्यचकित थे कि सुशील जो कि बहुत ही संकोची लड़का है, उसने इस प्रतियोगिता कैसे भाग ले लिया। लेकिन उससे जो भी मिला उसने उसका हौंसला ही बढ़ाया। आशीष ने भी आगे बढ़कर सुशील से हाथ मिलाया औरर अहंकार के भाव से उसे '' ऑल द बेस्‍ट '' कहा। सुशील ने भी उसे शुभकामनाएं दी।

प्रतियोगिता शुरू हो चुकी थी। सभी प्रतियोगी अपना उत्‍तम से उत्‍तम प्रदर्शन करने का प्रयास कर रहे थे।

हालांकि आशीष निश्चित था कि इस वर्ष भी वो ही जीतेगा लेकिन फिर भी दिल के किसी कोने में उसे यदि कोई थोडा बहुत डर था तो वो था सुशील से। वो सुशील का डांस देखने के लिए उत्‍सुक था। और तभी स्‍टेज पर सुशील का नाम पुकारा गया तो उसके दोस्‍तों ने पूरा ऑडिटोरियम अपने सर उठा लिया। सुशील जो अब तक थोडा भयभीत था, अपने दोस्‍तों का शोर सुनकर उसे थोड़ा हौंसला मिला और वो अपने पूरे आत्‍मविश्‍वास के साथ स्टेज पर पहुँच गया और एक बार उसने जब डांस शुरू किया तो फिर तो उसे होश ही नहीं रहा कि वो स्‍टेज पर इतनी भीड़ के सामने हैं या अकेले में, वो तो बस तल्‍लीन होकर नाचता रहा और उसके पैर तभी थमे जब उसके गाने का संगीत रिकॉर्ड बजना बंद हुआ। पूरा ऑडिटोरियम तालियों की गड़गडा़हट से गूंज उठा। सभी लोग उसका डांस देखकर स्‍तब्‍ध रह गए और कहने लगे ये अब तक कहां छुपा हुआ था। और उधर सुशील का डांस देखकर आशीष का आत्‍मविश्‍वास भी डगमगा गया, लेकिन जैसे तैसे उसने अपने आपको संभाला और पास में रखी पानी की बोतल से दो घूँट पानी पीया। एक दो प्रतिभागी के बाद आशीष का नाम पुकारा गया तो एक बार फिर पूरा ऑडिटोरियम ''आशीष -आशीष'' के नाम से गुंजायमान हो गया। उसके दोस्‍तों ने जोर-2 से ''चैंम्पियन-चैंम्पियन'' चिल्‍लाते हुए पूरे ऑडिटोरियम को अपने सर पर उठा लिया। आशीष ने भी अपने आपको संभाला और स्‍टेज पर पहुँच गया। अशीष ने अपना डांस शुरू किया लेकिन आज वो अपनी एकाग्रता बरकरार नहीं रख पा रहा था। उसे बार-बार सुशील का चेहरा दिखाई दे रहा था और इसी वजह से आज उसके कदम संगीत की ताल के साथ वो तालमेल नहीं बिठा पा रहे थे जिसके लिए वो जाना जाता था। जैसे तैसे गाना खत्‍म हुआ तो ऑडिटोरियम तालियों से गूंज उठा लेकिन आशीष जानता था कि आज उसका प्रदर्शन उस स्‍तर का नहीं था इसीलिए वो थोड़ा निराश था।

सभी प्रतिभागियों के प्रदर्शन के बाद अब बारी थी निर्णायक मंडल के फैसले की। निर्णायक मंडल को प्रथम तीन प्रतिभागियों के नाम बताने थे। सबसे पहले उन्‍होंने तीसरे स्‍थान पर रहे प्रतिभाग का नाम लिया जो कि द्वितीय वर्ष का छात्र था। अब बारी थी दूसरे स्‍थान पर रहने वाले प्रतिभागी के नाम की घोषणा करने की, तो निर्णायक मंडल में से एक व्‍यक्ति ने कहा'' प्रथम व द्वितीय स्‍थान के लिए कड़ा मुकाबला था और दोनेां प्रतिभागी में केवल एक नंबर का ही अंतर रहा'' ये कहते हुए उसने द्वितीय स्‍थान पर रहे प्रतिभागी की घोषणा की।'' तृतीय वर्ष के छात्र आशीष'' ये सुनते ही पूरे ऑडिटोरियम में सन्‍नाटा छा गया। और सभी लोग प्रथम स्‍थान पाने वाले प्रतिभागी का नाम सुनने के लिए उत्‍सुक हो गए। इधर आशीष एकदम निराश हो चुका था और उसे डर था कि यदि सुशील प्रथम रहा तो उसकी बेईज्‍जती हो जाएगी।'' और तभी उसके कानों में स्‍टेज से आती आवाज सुनाई दी '' और आज के हमारे विजेता हैं तृतीय वर्ष के छात्र सुशील'' और ये सुनते ही आशीष को यूं लगा जैसे धरती वहीं फट जाएं और वो उसमें समा जाएं। इधर सुशील के दोस्‍त जोर जोर से चिल्‍ला रहे थे। '' हमारा विजेता -सुशील''। आशीष हताश हो चुका था और बुझे मन से वो होस्‍टल की तरफ चल दिया।

इस घटना के बाद आशीष हमेशा सुशील से दूर रहने लगा और उसकी कोशिश रहने लगी कि वो और उसके दोस्‍त मिलकर उसका मजाक उडाएं और उसे नीचा दिखाएं। लेकिन सुशील के मन में ऐसा कुछ नहीं था, वेा उनकी हरकतों को नज़रअंदाज कर देता। यूँ लगने लगा था जैसे आशीष को सुशील से ईर्ष्‍या हो गई है।

कुछ ही दिनों में अंर्तमहाविद्यालय डांस प्रतियोगिता होने वाली थी जिसमें सभी महाविद्यालय के प्रथम तीन स्‍थान पर रहे प्रतियोगियों का नाम जाना था। सुशील की उसमें भाग लेने की इच्‍छा नहीं थी। लेकिन उसके दोस्‍त उसे बार-2 भाग लेने के लिए प्रेरित कर रहे थे। लेकिन वो कहता '' यार तुम लोगों के कहने से मैंने अपने कॉलेज की प्रतियोगिता में भाग लिया था न, अब मुझे माफ करो।

देखो बिना बात ही आशीष और उसके दोस्‍त मुझसे खफा हो गए। मैंने आशीष को समझाया भी था कि मेरी जीत केवल एक तुक्‍का थी, डांस वो ही अच्‍छा करता है लेकिन............... , और फिर वहॉं तो न जाने कितने कॉलेज के विद्यार्थी आएंगें, उनके सामने मैं कहॉं टिकूंगा?''

तो उसके दोस्‍त कहते'' चाहे जो भी आए लेकिन पिछले दो साल से तो आशीष वो प्रतियोगिता जीत रहा है और तुमने उसको हरा दिया, इसलिए चिंता मत करो उसमें भी तुम ही विजेता रहोगें।'' सुशील ने बहुत समझाया कि वो जीत केवल एक तुक्‍का थी लेकिन उसके दोस्‍त नहीं माने और आखिरकार उसे राजी कर ही लिया।

आशीष ने भी अपनी तैयारी शुरू कर दी थी, उसके दोस्‍त भी उसे हौंसला दिला रहे थे लेकिन बहुत चाहकर भी ना जाने क्‍यों आशीष अपना खोया हुआ आत्‍मविश्‍वास प्राप्‍त नहीं कर पा रहा था। रह रहकर सुशील से मिली हार उसे निराशा के अंधे कॅुंए में धकेल देती। इन्‍हीं सबके बीच वो अपनी तैयारी तो कम और इस पर ज्‍यादा सोचने लगा कि वो जीते या ना जीते लेकिन ये प्रतियोगिता सुशील भी नहीं जीत पाए।

ये बात उसने अपने दोस्‍तों से भी साझा करी कि ''यार चाहे कुछ भी हो जाए, मैं जीतूँ या ना जीतूं लेकिन सुशील नहीं जीतना चाहिए।''

तो उसके एक दोस्‍त ने समझाया'' देख यार तू अपनी प्रेक्टिस पर ध्‍यान दे, उस दिन सुशील तुक्‍के से जीत गया लेकिन इतनी बड़ी प्रतियोगिता वो नहीं जीत पाएगा। और तू तो पिछले दो साल का चैम्पियन है, और मुझे विश्‍वास है कि इस बार भी तुम ही जीतोगे।'' लेकिन आशीष को अंदर ही अंदर कोई डर खाए जा रहा था। और इसी डर की वज़ह से एक दिन उसने अपने खास दोस्‍त साहिल को अपने कमरे में बुलाया और उसे कुछ समझाया। साहिल ने उसे आश्‍वासन दिया कि वो चिंता न करे, जैसा उसने कहा है वैसा ही होगा, वो तो बस अपनी प्रेक्टिस पर ध्‍यान दे।

प्रतियोगिता के एक दिन पहले प्रिंसीपल साहब ने तीनों प्रतिभागियों को अपने कक्ष में बुलाया और उनकी हौंसला अफजाई की। उन्‍होंने समझाया कि '' देखिए आप तीनों ही अच्‍छे डांसर हैं और मुझे उम्‍मीद है कि आप तीनों ने अपनी अच्‍छी प्रेक्टिस करी होगी। आप लोग अपना आत्‍मविश्‍वास बनाए रखना और इस बात का ख्‍याल रहें कि पिछले दो साल से जो कप आशीष ने हमारे लिए जीता है वो तीसरे वर्ष भी हमारे पास ही यानि हमारे महाविद्यालय में ही आना चाहिए। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप तीनों में से कौन प्रथम रहता है, अब ये तुम्‍हारे व्‍यक्तिगत से ज्‍यादा हमारे कॉलेज की प्रतिष्‍ठा का प्रशन है। तीनों ने प्रिंसीपल साहब की हॉं में हॉं मिलाई और अभिवादन कर कक्ष से बाहर आ गए।

बाहर आकर सुशील ने आशीष से कहा'' यार हम सबको तो तुम पर ही भरोसा है, इस वर्ष भी तुम ही अपनी कॉलेज का नाम रोशन करोगे। ''

ये सुनकर आशीष ने व्‍यंग्‍यात्‍मक लहजे में कहा'' अरे भई अब ये जिम्‍मेवारी तुम्‍हारी है, हम तो हारे हुए हैं।'' ये कहते हुए वो तेज कदमों से वहॉं से चल दिया और सुशील मुस्‍कुराते हुए उसे दखेता रहा।

आखिरकार प्रतियोगिता का दिन आ ही गया। सभी प्रतिभागी संबंधित प्रतियोगिता के इंचार्ज व्‍यक्ति को अपनी हाजरी दे चुके थे। आशीष थोड़ा बैचेनी से इधर-उधर टहल रहा था कि अचानक उसे साहिल की आवाज सुनाई दी '' आशीष'' और उसने पीछे मुड़कर देखता तब तक साहिल उसके पास पहुँच चुका था। आशीष ने बड़े अधीर होकर साहिल का हाथ पकड़ा और कहने लगा'' यार कहॉं रह गया था, मैंने कितनी बार तुझे फोन लगाया।'' साहिल ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा'' रिलेक्‍स यार, अपने दोस्‍त पर भरोसा रख, मैंने सारा इंतजाम कर दिया है।'' ये सुनकर आशीष को थोड़ा संतोष हुआ और उसने उसे धन्‍यवाद दिया।

प्रतियोगिता शुरू हो चुकी थी। एक-एक करके प्रतिभागी स्‍टेज पर आ रहे थे और अपना हुनर दिखा रहे थे। पूरा ऑडिटोरियम खचाखच भरा हुआ था और हर प्रस्‍तुति पर जोरदार तालीयां बज रही थी। अगला नाम जब सुशील का पुकारा गया तो एक बार फिर ऑडिटोरियम ता‍लीयों से गूंज उठा। सुशील ने स्‍टेज पर आकर अपना डांस शुरू किया लेकिन कुछ ही क्षण बाद अचानक संगीत बंद हो गया और संगीत बद होते ही सुशील के थिरकते हुए कदम भी रूक गए। और अभी कोई कुछ समझने की कोशिश करता उसके पहले ही संगीत फिर से शुरू हो गया। निर्णायक मंडल ने सुशील को अपना डांस जारी रखने को कहा। सुशील ने उनके ईशारे पर वापस डांस तो शुरू कर दिया लेकिन संगीत के कुछ पलों के लिए बंद होने से जो उसकी लय टूटी तो वो उसे पकड़ नहीं पाया। जैसे-तैसे उसने अपना डांस शुरू किया और उधर आशीष व साहिल ने चुपके से एक दूसरे का अंगूठा दिखाकर अपनी योजना के सफल होने पर अपनी खुशी जाहिर की। जैसे ही सुशील का डांस खत्‍म हुआ तो उसके दोस्‍तों ने निर्णायक मंडल से प्रार्थना करी कि सुशील की प्रस्‍तुति दुबारा कराई जाए लेकिन निर्णायक मंडल ने कहा कि बहुत कम समय के लिए संगीत बंद हुआ था और हम उसको नंबर देते समय इसका लाभ जरूर देंगें लेकिन समयाभाव के कारण दुबारा प्रस्‍तुति कराना संभव नहीं है।

और प्रतियोगिता जारी रही। अगली बारी आशीष की थी। हालांकि आशीष अपनी योजना में सफल होकर सुशील की प्रस्‍तुति को तो बिगाड़ चुका था लेकिन फिर भी न जाने क्‍यों उसमें वो पुराने वाले जोश नहीं था। उसने अपनी प्रस्‍तुति दी लेकिन उसमें वो बात नहीं थी जो होनी चाहिए। प्रतियोगिता समाप्‍त हो चुकी थी और सभी को निर्णय का इंतजार था। निर्णायक मंडल ने स्‍टेज कपर आकर अपना फैसला सुनाया तो ये जानकार सभी हैरान रह गए कि इस वर्ष का विजेा तो क्‍या आशीष और सुशील की कॉलेज का प्रथम तीन स्‍थान में कहीं नाम नाम नहीं था। आशीष और सुशील के दोस्‍त, सभी निराश थे।

अगले दिन जब वो प्रिंसीपल साहब से मिले तो प्रिंसीपल साहब बोले,'' कोई बात नहीं , लगता है इस बार आप लोगों की तैयारी में कहीं कुछ कमी रह गई लेकिन निराश होने की बात नहीं है, हम वो कप अगली बार फिर वापिस ले आएंगें।''

तीनों विद्यार्थी नीचे मुंह किए बैठे रहे और हॉं में सर हिलाते रहे। प्रिंसीपल साहब के कक्ष से बाहर आकर सुशील ने आशीष से बात करनी चाही लेकिन वो सुशील से नज़रें चुराकर जल्‍दी से वहां से चला गया।

शाम को जब साहिल, आशीष के कमरे में गया तो आशीष ने कहा'' यार साहिल सब गड़बड़ हो गईा''

साहिल-क्‍यों क्‍या हुआ तुम यही तो चाहते थे कि चाहे कुछ भी हो जाए सुशील नहीं जीतना चाहिए, तो हो तो गया। वो नहीं जीता।

आशीष ने बड़ी ग्‍लानी से कहा।'' मानता हूँ यार कि मैं- यही चाहता था लेकिन मुझे समझ नहीं आ रहा है कि मैं ऐसा क्‍यों चाहता था? उसे हराने के चक्‍कर में हमारी कॉलेज कप नहीं जीत पाई। न जाने क्‍यों, मुझे सुशील से ईर्ष्‍या हो गई थी और इसीलिए मेरा ध्‍यान मेरी प्रेक्टिस से हटकर इस पर लग गया कि सुशील नहीं जीतना चाहिए।''

बड़े हताश मन से उसने आगे कहा'' यार मैं नहीं तो वो तो जीत ही जाता और कप हमारे कॉलेज के पास ही रहता। साहिल मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई। इसके लिए मैं अपने आपको कभी माफ नहीं कर पाउँगा।'' ये कहते हुए वो लगभग रोने लगा तो साहिल ने उसे अपने गले से लगा लिया और कहा '' यार, कोई नहीं गलती इंसानों से ही होती है, अब अपने आपको संभाल।'' लेकिन आशीष ने कहा'' नहीं यार, वैसे तो ये गलती माफी के काबिल नहीं है लेकिन फिर भी जब तक मैं सुशील से माफी नहीं मांग लेता तब तक मैं अपने आपसे नज़रें नहीं मिला पाउँगा।''

''मैं अभी जाकर उससे माफी मांगता हूँ।'' ये सुनकर साहिल बोला, चल यार मैं भी चलता हूँ , मैं भी उसका दोषी हूँ।'' और वो दोनो सुशील के कमरे की ओर चल दिए।

सुशील के कमरे पर पहुँचकर उन्‍होंने दस्‍तक दी तो सुशील ने दरवाजा खोला और उन दोनों को देखकर अंदर आने को कहा। आशीष का चेहरा देखकर सुशील बोला।'' यार इतने उदास क्‍यों लग रहे हो, हार जीत तो होती रहती है। इस बार नहीं तो अगली बार जीत जाओगे। जिंदगी में जिस तरह हम जीत स्‍वीकार करते हैं वैसे ही हार भी स्‍वीकार करनी चाहिए। लेकिन हॉं हार मानकर निराश नहीं होना चाहिए बल्कि और दोगुने जोश से तैयारी करनी चाहिए और जो कमी इस बार रही उसे दूर करने का प्रयास करना चाहिए।'' ये सब सुनकार आशीष ने सुशील के दोनों हाथ अपनेहाथों में लेकन कहने लगा'' दोस्‍त मुझे माफ कर दे यार, मैं तेरा दोषी हूँ।'' साथ में साहिल भी बोला,'' हॉं यार मुझे भी माफ कर दे।'' ये सब सुनकार सुशील को बड़ा आश्‍चर्य हुआ और उसने जि़ज्ञासापूर्वक पूछा, ''अच्‍छा बताओं तो किस बात के लिए माफ कर दूँ ?''

तब आशीष और साहिल ने उसे पूरी बात बताई किस तरह योजना बनाकर उन्‍होंने उसकी प्रस्‍तुति में विध्‍न डाला। फिर आशीष बोला, '' यार मुझे तुझसे जलन होने लगी थी, लेकिन मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था।'' सुशील ने दोनों को समझाया कि''यार देखो सबसे अच्‍छी बात तो ये है कि तुम दोनों को अपनी गलती का एहसास हो गया और उससे बड़ी बात कि तुम दोनों ने अपनी गलती स्‍वीकार करने का साहस दिखाया।'' थोडा़ रूककर वो फिर बोला'' देखो दोस्‍तों मुझे मेरे हारने का बिल्‍कुल गम नहीं है लेकिन इस बात का दुख जरूर है कि इस चक्‍कर में वो कप हमारी कॉलेज से चला गया। याद रखो जीवन में कोई भी हार आखरी नहीं होती है, हार-जीत तो हमारे जीवन का हिस्‍सा है। यदि आप किसी से हार जाते हो तो उससे ईर्ष्‍या मत करो बल्कि अपने अंदर प्रतिस्‍पर्धा की भावना पैदा करो। ईर्ष्‍या और जलन हमें आगे बढ़ने से रोकती हैं जबकि रचनात्‍मक प्रतिस्‍पर्धा हमें आगे बढ़ने का मौका देती है , आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है, एक सुअवसर प्रदान करती है।'' ये कहते हुए सुशील ने दोनों को अपनी बाहों में ले लिया और कहा'' आओ आज हम अपने आपसे वादा करते हैं कि वो कप जो हमने अपनी नादानी से खो दिया है वो अगले वर्ष हम वापिस जीतकर अपनी भूल को सुधारेगें।''


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