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AMIT SAGAR

Tragedy


4.7  

AMIT SAGAR

Tragedy


ईमान का ईनाम

ईमान का ईनाम

11 mins 244 11 mins 244

विक्टर नाम का लड़का जो कि श्वेता नाम की लड़की से बेइन्तेहाँ मोहब्बत करता है। दोनो का धर्म अलग है, पर इतिहास गवाह है कि मोहब्बत कभी भी धर्म और जाति देखकर नहीं होती। विक्टर और श्वेता ने अभी अभी अट्ठारवे साल में कदम रखा है। विक्टर के पिता एक फर्म में काम करते हैं, जिनका व्यवहार सामान्य आदमियों सा है। वहीँ श्वेता के पिता की खुद की  दुकान है जिनका व्यवहार थोड़ा सक्त है। घर तो दोनो का आमने - सामने हैं पर धर्म की वजह से दिलो की  दुरियाँ हद से ज्यादा है, वो बात और है कि वो दूरीयाँ चेहरे पर देखने को नहीं मिलती हैं। विक्टर और श्वेता ने हर वो वादे किये जो प्यार मे कियें जाते हैं, हर वो कस्मे खाईँ जो मौहब्बत करने के बाद लोग खाते हैं। पर दोनों बेचारे इस बात से अन्जान थे कि उनका प्यार सुबाह को खिलने वाले फूल की तरह हैं, जो शाम तक या तो जाति बन्धनरुपी सूरज की परिवाररूपी किरणों के कारण मुरझाने वाला है या फिर वो फूल टूटकर किसी अन्जान हाथो में जाने वाला है। पर उससे पहले हर प्रेमी प्रेमिका अपने प्यार को शादी के आखिरी मुकाम तक ले जाने की हर कोशिश करते हैं। विक्टर और श्वेता ने भी ऐंसे ही अपने माता पिता को मनाने की कोशिश की पर दोनो नाकाम ‌रहे । अन्त में उनके पास एक ही रास्ता बचा घर से कहीं दूर जाकर मन्दिर में  शादी करने का , पर कम उम्र होने के कारण उनका ताल मेल ठीक ना बैठ पाया।  

श्वेता विक्टर को दिये वक्त के अनुसार बस मे बैठ गयी थी, पर विक्टर के घर वालो को भनक लगने के कारण, विक्टर घर से बाहर ही नहीं निकल पाया। सुबाह होते ही श्वेता के घर वालो को जब पता चला कि वो घर में नहीं  है, तो सभी लोग विक्टर के घर लाठी डन्डे लेकर दौड़ पड़े। खूब हाय हंगामे हुएे,  जुँबा से गालियोँ की गोलियाँ चल रहीं थीं, एक दुसरे को आरोपी और नीचा दिखा‌ने की मुसलाधार बारिस हो रही थी, पर इस बीच किसी ने भी उस मासूम बच्ची के बारे में नहीं सोचा कि वो बेचारी कहाँ है, और किस हाल में है।  

श्वेता बस में विक्टर के भरोसे बैठ तो गयी थी, पर उसके पास फोन नहीं था, उसके पास पैसे भी बहुत कम थे , उसको यह भी नहीं पता था कि जहाँ उसको जाना है वहाँ का किराया कितना है, उसके पास अगर कुछ था तो वो था एक पता जहाँ उसे पहुँचना था।  श्वेता उन प्यार भरी खुशियों की चाह में अपना घर छोड़ चुकि थी जो विक्टर की नादानी के कारण अब छिनती नजर आ रहीं थी। पर श्वेता इस बात से अभी अन्जान थी, उसे तो अभी तक यही पता था कि विक्टर उसका वहाँ इन्तेजार कर रहा होगा जहाँ वो जा रही है।  

बस मुरादाबाद से दिल्ली के लियें रवाना हो चुकी थी, पर कुछ ही दैर में अपने‌ परिवार वालो को याद कर श्वेता सुबकने लगी, वो तो शुक्र है विक्टर के प्यार के विस्वास का जिसने श्वेता के आशुँओ पर पेहरा लगा रखा था वरना यह अश्क तो पलको से पल पल छलकना चाह रहे थे। कहते हैं ईन्सानियत की कोई उम्र नहीं होती ईन्सानियत का कोई धर्म नही होता, पर हर धर्म में ईन्सानियत का जज्बा रखने वाले लोग कहीं ना कहीं मिल ही जाते हैं। श्वेता के पास भी एक ऐंसा ही इन्सान बैठा था जो कि सभी धर्मो में एकसमान आस्था रखता था, नाम था अजीम सैफी और उम्र थी लगभग बाईस वर्ष।

श्वेता को यूँ सुबकता देख अजीम ने उसे दिलासा देना चाहा और पूँछा - क्या आप किसी वजह से परेशान हो, क्या कोई विशेष चिन्ता आपको यूँ सुबकने पर मजबूर कर रही हैं ? 

श्वेता कभी घर से बाहर नहीं निकली थी, उसे नहीं पता था कि सामाजिक व्यवहार क्या होता है, उसकी नजरो मे तो हर अन्जान इन्सान एक बहशी शैतान था, उसे लगता था कोई भी ईन्सान उससे केवल इसलिये ही बात करेगा क्योकि वो अकेली लड़की है, और वक्त-ए-हालात देखते हुए उसका सोचना सायद गलत भी ना था। इसलियें उसने अजीम की किसी भी बात का जवाब नहीं दिया। अजीम समझ गया था कि लड़की किसी बात को लेकर डरी हुई है वो उसे परेशान नहीं करना चाहता था , इसलियें उसने चुप रहना ही बेहतर समझा।  

तभी कन्डेक्टर ने टिकट काटनी शुरु कर दी, जो कि एक सरदार जी थे। सरदार जी एक तरफ से टिकट काटते हुए अन्तः श्वेता के पास भी टिकट लेने के लियें आ पहुँचे, श्वेता के पास जितने भी पैसे थे वो उसने सरदार जी को दे दिये। सरदार जी ने पूँछा बेटी कहाँ जाना है ? 

श्वेता ने कहा मुझे दिल्ली जाना है।  

सरदार जी ने कहा - बेटी यह तो बहुत कम पैसे हैं।  

श्वेता रोती हुई आवाज में बोली बाकी पैसे मैं दिल्ली जाकर दे दुंगी।  

सरदार जी बोले- बेटी रो मत मुझे सच बताओ बात क्या है ? 

तब श्वेता ने अपनी पूरी कहानी सारदार जी को बाताई, जिसे अजीम सहित बस में बैठे बाकी लोगो ने भी सुना। कुछ दैर पहले तक सभी लोग सामान्य रूप से बस में बैठे थे पर जैसे ही श्वेता की घर से फरार होने वाली बात सुनी तो अजीम और सरदार जी को छोड़कर बाकी सभी लोग श्वेता को ऐंसे देख रहे थे जैंसे रामगढ़ के कुत्ते बसन्ती को नाचते हुए देखते थे। सरदार जी सुलझे हुए इन्सान थे, वो श्वेता को अकेला नहीं छोड़ना चाहते थे, और साथ ही श्वेता के चक्कर में ना तो खुद फँसना चाहते थे , और ना ही किसी को फँसने देना चाहते थे, इसलियें उन्होने बस मे बैठे सभी लोगो के मोबाइल न. और पते एक कागज पर लिखे, और दिल्ली आते ही उस कागज और लड़की को रॉड वेज पुलिस के हवाले कर दिया।  

लेकिन हमारे अजीम मियाँ को समाज की परिस्थितियों की कुछ ज्यादा ही परख थी, इसलिये वो श्वेता को किसी के भी भरोसे नहीं छोड़ना चाहते थे, वैसे तो श्वेता के लियें वो अन्जान थे, पर साथ ही वो एक ईन्सान थे। वो सामाज के आइनेें में हैवानियत का नंगा रुप आये दिन देखते रहते थे, अन्जान होकर भी उन्हे श्वेता के लियें एक अजीब सा डर अन्दर ही अन्दर सता रहा थे। वो नहीं चाहते थे कि, किसी गलत जगह पहुँचकर उस अवला को आवरू से हाथ धोना पड़े। इसलियें वो श्वेता के ना चाहते हुए भी निरन्तर उसका साया बने हुए थे।  

उधर पुलिस वालो ने श्वेता से कुछ सवाल जवाब किये, और श्वेता को समझाने की कौशिस की, कि हम तुम्हे तुम्हारे घर छोड़ देते हैं, पर श्वेता ने तो मानो एक रट लगा रखी थी, कि मैं एक बालिग़ लड़की हूँ और मुझे अपनी मर्जी से शादी के कर‌ने का पूरा हक़ है। रॉडवेज पुलिस वाले भी ज्यादा पचड़े में नहीं पड़ना चाहते थे , इसलियें उन्होने भी बिना कुछ सोचे समझे श्वेता को वहाँ से जाने दिया।  

अब श्वेता दिल्ली की खुली सड़को पर अकेली थी जिसको विक्टर का इन्तेजार था। पर विक्टर तो बैचारा परिवार वालो के हत्थे लग चुका था, जिससे श्वेता अभी तक अन्जान थी, वो तो समझ रही थी कि कुछ ही दैर में विक्टर यहाँ आ जायेगा और फिर हमारी जिन्दगी का सपना पूरा हो जायेगा।  

शाम के चार बज चुके थे , और अजीम को किसी बहुत ही जरुरी काम से मिलने के लियें सात बजे किसी के पास जाना था , जिसके ना होने पर धन की हानि तो होती ही साथ साथ पिता की मार भी खा‌नी पड़ सकती थी। पर इन सबसे जरुरी उस लड़की को अपनी मन्जिल तक पहुँचाना था, जो ईज्जत की टौकरी सिर पर लिये दिल्ली जैंसे शहर में अकेली भटक रही थी। ज्यो ज्यो समय बीत रहा था श्वेता के साथ साथ अजीम को अब अपने काम की भी चिन्ता बढ़ती दिखाई दे रही थी। अजीम के पास दो रास्ते थे , और वो असमंजस था कि जो काम अब्बा ने दिया है वो पूरा करने के लियें पहले वाले रास्ते पर जाऊँ, या फिर जो रास्ता मुझे अल्लाह दिखा रहा है उसके लियें अब्बा के काम को भूल जाउँ। फिर सोचा कि वैसे तो यह दोनो काम एक साथ भी हो सकते हैं अगर यह लड़की मेरा कहा मानकर अपने घर चली जाए, लेकि‌न इससे मैं कहूँ कैंसे, एक बार तो इसने मुझे इग्नौर कर ही दिया है, अगर दुबारा भी कर दिया तो मेरे अत्मसम्मान को ठैस पहुँचेगी लेकिन वो ठैस उस दुत्कार से तो फिर भी बेहतर ही होगी जो मेरा जमीर इस लड़की की मदद ना करने पर मुझे देगा।  

यही बात सोचता हुआ अजीम श्वेता के पास गया और इससे पहले कि वो कुछ बोलता श्वेता ने ही उससे पूँछ लिया क्या आप बात करने के लिये मुझे मोबाइल दे सकते है। अजीम ने बिना सोचे समझे ही श्वेता को मोबाइल दे दिया।  श्वेता ने विक्टर से बात की तो पता चला कि वो तो घर से निकल ही नहीं पाया। अभी तक तो विक्टर के आने की उम्मीद श्वेता के साथ  थी, पर अब श्वेता खुद को अकेला महसूस करने लगी और उसके अश्क बह निकले। सामने ही एक ट्राफिक पुलिस वाला श्वेता को यूँ रोता हुआ देख रहा था, उसने सोचा सायद अजीम‌ उसे परेशान कर रहा है। वो पुलिसा वाला अपनी हिरोगर्दी दिखाता हुआ श्वेता के पास आया और अजीम को कसकर एक तमाचा जड़ दिया, लड़की को परेशान करता है, इससे पहले कि वो पुलिस वाला अजीम को कुछ और भला बूरा कहता श्वेता ने कहा - अरे आप इनको क्यो मार रहे हो यह तो मेरे साथ हैं। यह सुनकर पुलिसावाला अपने रस्ते चल दिया, इधर अजीम को थप्पड़ के रूप में अपने ईमान का पहला ईनाम मिल चुका था। पर वो थप्पड़ अजीम की दयालुता के हौंसलो को तनिक भी ना हिला सका । उसने श्वेता से कहा - अगर तुम चाहो तो मैं तुम्हे, तुम्हारे घर छोड़ देता हूँ।  

श्वेता ने कहा - नहीं मेरे मम्मी पापा बहुत मारेंगे।  

तब अजीम ने कहा - अगर मैं बिना गलती के  तुम्हारे लियें उस पुलिस वाले का थप्पड़ खा सकता हूँ, तुमने तो फिर भी गलती की है, तो क्या तुम अपने माँ बाप से दो थप्पड़ नहीं खा सकतीं। यहाँ अकेली तुम किसके भरोसे रहोगी, यहाँ रात में इन्सान के लिवास में घूमने वाली हवस की चमगादड़ तुम्हारे जिस्म से ईज्जत का सारा खून पी लेंगी, और सुबाह को जब तुम्हे हौश आयेगा तो तुम अपने आप को ऐंसे दलदल में पाओगी जहाँ हर जानवर सिर्फ तुम्हारे त‌न का भूखा होगा। और फिर तुम  इन्सान नहीं सिर्फ एक चीज बनकर रह जाओगी जिसको हर रोज एक नये जानवर के सामने परोसा जायेगा।  

इतना सुनकर श्वेता की रूह काँप उठी , और अब वो खामौश थी। श्वेता के बिना कुछ कहे ही अजीम समझ चुका था कि वो अब घर जाने के लियें तैयार है।  

अजीम ने कहा - मुझे पहले किसी जरूरी काम से किसी दुसरी जगह जाना है।  

श्वेता ने कहा - पर मैं तुम पर कैंसे भरोसा कर लूँ।  

अजीम ‌ने कहा - कोई बात नहीं यह लो किराये के पैसे तुम चाहो तो अकेली भी घर जा सकती हो।  

श्वेता अजीम को सायद अब जान चुकी थी, सो उसने अजीम के साथ जाना ही बेहतर समझा।  

सात बज चुके थे, जहाँ अजीम को जाना था वहाँ वो अभी तक नहीं पहुँच पाया था, तो उन्होने अजीम के पिता को सिकायत भरे लिहाज से फोन किया, और कहा हम ने इतना बड़ा कारोबार हर किसी का इन्तेजार करने के लियें नहीं खोला है। अजीम के पिता को यह बात बुरी लगी, पर कारोबार में बात के बतंगड नहीं बनाये जाते, इसलिये वो अपमान का घूँट पीकर रह गये। उन्होने कहा आप थोड़ी दैर और रूक जाइए मैं अभी अपने बेटे को फोन करता हूँ, उन्होमे अजीम को फोन लगाया तो अजीम का फोन बन्द हो चुका था, अब अजीम के पिता का गुस्सा सातवे आसमान पर था, कि आखिर यह है कहाँ।  

जैंसे ही अजीम के पिता की बात खत्म हुई थी अजीम वहाँ पहुँच चुका था जहाँ उसे जाना था। अजीम ने दस मिनट में अपने पिता के काम को अन्जाम दिया, औेर फिर मुरादाबाद के लियें रवाना हो गया। अजीम के मन मे खुशी की एक अजब ही लहर दौड़ रही थी, और वो खुशी थी एक मासुम लड़की को उसकी सही मन्जिल तक पहुँचाने की ।  

श्वेता घर जाने से पहले एक बार अपने माता पिता को इक्तेला देना चाहती थी कि वो घर वापिस आ रही है, सो उसने अजीम से किसी का फोन लेकर अपने घर वालो को बताने के लियें कहा। अजीम ने श्वेता के पिता से बात की औेर कहा - अकंल मे आपकी बेटी को वापिस लेकर आ रहा हूँ प्लीज आप इनसे कुछ कह‌ा मत बेचारी डरी हुई है। श्वेता के पिता चुप थे, क्योकि उनके अन्दर क्रोध का ज्वालामुखी फट रहा था, और साथ ही अजीम भी यह समझ चुका था कि श्वेता को बहुत मार पड़ने वाली है पर वो मार उसकी इज्जत निलाम होने से सौ गुनाह बेहतर थी, सो उसने श्वेता को कु्छ नहीं बताया। ग्याराह बजे अजीम और श्वेता मुरादाबाद श्वेता के घर पहुँच गये जहाँ श्वेता के पिता हाथ में डन्डा लिये खड़े थे, डन्डा देख श्वेता सहम गयी । श्वेता को देखते ही वो उसकी और दौड़े पर उन्होने श्वेता को नहीं अजीम पर डन्डे बरसाने शुरू कर दिये, वो अजीम पर लगातार डन्डे बरसा रहे थे, और कहते जा रहे थे, बता क्यूँ लाया इस कलंकनी को वापिस यहाँ पर, इसे वहीँ कुत्तो से नुचने दिया होता, जिसने हमारी इज्जत को सरेआम निलाम कर दिया उसकी इज्जत भी ऐंसे ही निलाम होनी चाहिये थी, मगर तु इसे वापिस हमारे दरवाजे पर ही ले आया, अब भुगत इसकी सजा।  

खैर जैंसे तैंसे मौहल्ले बस्ती वालो ने अजीम को बचाया और वहाँ से उसे रवाना कर दिया। यह डन्डो की मार अजीम के ईमान का दुसरा ईनाम था। अजीम‌ ने सोचा था कि जब मे श्वेता को उसके घर  लेकर जाऊंगा तो उसकी माँ मुझे बेटे जैंसे प्यार देगी, मेरा झोली दुआओ औेर आशिर्वाद के खजाने से भर दी जायेगी। उसके पिता मुझे साबासी का सम्मान देंगे, पर यहाँ सबकुछ अजीम की सोच के विपरित हुआ। अजीम दर्द से कर्राह रहा था, पर यह दर्द लेकर वो अपने घर नहीं जाना चाहता था। उसने अपने दर्द पर काबू किया और घर का दरवाजा खटखटाया, जहाँ अजीम‌ के पिता शाम सात बजे से जले भुने बैठे थे, अजीम के घर में कदम रखते ही उन्होने कसकर अजीम के दो थप्पड़ रख दिये, और कहा अपने बाप को दुसरो से खरी खोटी सुनवाता है, बता दिल्ली जाने में इतनी दैर क्यो लगा दी। पिता के यह अपमान भरे थप्पड़ अजीम के ईमान का आज तीसरा ईनाम था।  अजीम खामौश रहा, क्योकि जिस मार का दर्द वो सह रह था, वो दर्द अपने पिता को महसूस नहीं कराना चाहता था। वो खाना खाकर चुपचाप अपने बिस्तर पर लेट गया, और अपने पर पड़ी तीनो बार की मार के बारे में सोचकर उसके आँशु निकल पड़े, वो खुद से दो शब्द कह गया - क्या कलयुग मे किसी की इज्जत बचाना इतना बड़ा पाप है। क्या यही मेरे ईमान का ईनाम है।   


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