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Anita Sharma

Drama Romance Classics

4  

Anita Sharma

Drama Romance Classics

होली के रंग पिया के संग

होली के रंग पिया के संग

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रागिनी ने आज खुद को रंगों से बचाने के लिये कमरे में बंद कर रखा था। बस थोड़ी देर के लिये निकली थी जब उसकी सासो माँ ने ये बताया था कि "रसोई में किसी को भी रंग लेकर जाने की इजाजत नहीं है"।

इसीलिये रागिनी सुबह जल्दी ही अपने देवर,और ननद के होली खेलना शुरू करने से पहले ही सारा खाना बनाकर वापिस अपने कमरे में आ गई थी। तब से अब तक देवर, ननद जाने कितनी बार दरवाजा खटका चुके है। पर रागिनी ने जैसे कसम खा रखी थी बाहर न निकलने की।

रागिनी को कभी भी होली पसन्द नहीं रही। बचपन में भी जब उसके पापा उस के लिये पिचकारी, रंग और गुलाल ला कर देते थे तब भी वो उन्हे छूती तक नहीं थी। उसकी साथ की सहेलियाँ होली पर खूब हुड़दंग मचाती। पर वो तब भी अपने आपको कमरे में बंद कर लेती।

अपनी इकलौती बेटी की यूँ रंगो से दूरी माँ भी नहीं समझ पाती वो उसे हमेशा रंगो और त्योहारों की एहमियत बताकर समझाती। तो हरबार उसका यही जबाव होता कि....

"मुझे त्योहारों के पकवान बनाने परम्पराएँ निभाने में कोई परेशानी नहीं है। परेशानी तो ये है कि पहले रंग लगाओ और लगवाओं फिर रगड़ -रगड़ कर खुद को और पूरे घर को साफ करो। जब साफ करना ही है तो गंदा क्यों करू? "

माँ, पापा समझा - समझा कर थक गये पर रागिनी को नहीं समझना था और उसने नहीं समझा। शादी के बाद ये उसकी ससुराल में पहली होली है। ससुराल भी कोई ऐसा वैसा नहीं है, देवर, ननद सास, ससुर भरा-पूरा परिवार है। अगर इनसब से वो बच भी गई तो वो अपने पति कुनाल को खुद को रंग लगाने से कैसे रोक पायेगी। इसी उलझन में बैठी रागिनी का ध्यान एक बार फिरसे दरवाजे पर गया।

दरवाजे के बाहर से सासो माँ आवाज लगा रहीं थी.... " रागिनी बेटा बाहर आओ!! कबतक अंदर रहोगी ? सभी लोग होली मिलने आयेगें और तुम्हारे बारे में पूँछेगें तो मैं क्या कहूंगी? "

तभी रागिनी के देवर और ननद की आवाज आई......."भाभी आ जाइये हम वादा करते है कि न खुद आपको रंग लगायेगें न किसी को लगाने देगें घर भी हम साफ कर लेगें पर आप बाहर आ जाओ।"

आखिर पतिदेव से भी रंग न लगाने का पक्का वादा लेकर रागिनी ने दरवाजा खोल दिया। और सभी के साथ घर के बाहर गार्डन में आ गई। गार्डन में होली मिलने वालों का तांता लगा था। बच्चे एक दूसरे के ऊपर गुब्बारे फोड़ रहे थे । तो कोई लंगूर बनकर घूम रहा था।

रागिनी की सास ने उसे सभी से बचाते हुये एक कोने में बिठा दिया और खुद जाकर सभी को अबीर गुलाल लगाकर खुशियाँ बाँटने लगीं। चारों तरफ रंगे पुते खुशियाँ बांटते लोगों के बीच चुपचाप साफ सुथरी रागिनी, उसके ऊपर तो रंग का एक छींटा भी नहीं पड़ा था। यहाँ तक की उसकी सास ने कुनाल के लाख कहने पर भी उन्हे उसके माथे पर अबीर का एक टीका भी नहीं लगाने दिया था।

वहाँ सभी होली के रंग में मस्त होकर "रंग बरसे भीगे चुनर वाली" गाने पर जम कर नाच रहे थे। यहाँ कोने में खड़ी रागिनी से मिलने के लिये जैसे हि कोई आगे बढ़ता तो उसके देवर या ननद बीच में आकर एक दूसरे का परिचय करवाते हुये बोल देते.....

"आन्टी ये है मेरी भाभी, और भाभी ये आन्टी, हमारे परिवार से इनके बहुत अच्छे संबंध है।पर सॉरी आन्टी मेरी भाभी को होली नहीं पसन्द तो आप उन्हे आशीर्वाद दूर से ही दे दीजिये। "

मिलने वाले मेहमान मुस्करा कर आगे बढ़ जाते और सभी के साथ होली खेलने में मगन हो जाते। सभी को इतना खुश देखकर अब रागिनी का भी मन हो रहा था होली खेलने का, तो जैसे हि वो आगे बढ़ी तो सासो माँ ने पकड़ कर बिठाते हुये कहा....

" कहाँ जा रही हो बहू ? मैंने सभी को तुम्हें रंग लगाने से बहुत मुश्किल से रोक रखा है। "

और उसके पति और उसके दोस्तों ( जिसमें लड़कियाँ भी थी) की तरफ इशारा करते हुये बोली.... "वो देखो कुनाल के सभी दोस्त आ गये है। अब तुम बाहर निकलोगी तो उन्हे रोकना मुश्किल हो जायेगा। इसलिये तुम यहीं बैठकर ये गुझिया खाओ। "

और प्लेट पकड़ा कर वापिस चली गई।

इधर अब रागिनी का मन बिल्कुल भी नहीं लग रहा था। उसका पूरा ध्यान तो सिर्फ कुनाल पर था। वो कैसे अपनी लड़की दोस्तों के साथ मजे से डांस कर रहा था। आखिर उसका रंगो का डर एक पत्नी की ईर्श्या के आगे छोटा हो गया। उसने न आव देखा न ताव और वहीं रखी गुलाल से भरी थाली उठाकर पूरी -की पूरी कुनाल के ऊपर उड़ेल दी।

चारों तरफ उड़ते गुलाल की धुंध के बीच पूरा गार्डन तालियों की गूंज और हँसी की आवाज से गूंज उठा। इससे पहले की रागिनी कुछ समझ पाती उसके देवर और ननद ने कुनाल को गले लगाकर कहा....

"होली मुबारक हो भाई, आखिर भाभी ने आपको रंग लगा ही दिया। अब आप अपने किये वादे से मुकर मतजाना अब आपको हम जो मांगेंगे वही दिलाना पड़ेगा। "

तभी कुनाल ने रागिनी के गालों पर अपने हाथों से गुलाल लगाते हुये कहा.... "अपनी बीबी को रंग लगाने के बदले मैं तुम दोनों को कुछ भी देने के लिये तैयार हूँ। "

गोरे गालों पर हरा रंग लगाये खड़ी रागिनी अभी भी समझने की कोशिश कर रही थी। तभी उसकी सासो माँ ने प्यार से उसके सर पर हाथ रखते हुये कहा....

"बहू अभी ये जो मैं तुम्हे कुनाल और उसके दोस्तों को होली खेलते दिखाकर आई थी ये सब इन दोनों का प्लान था। ताकि तुम्हे जलन हो और तुम ऐसा कुछ करो और तुमने किया भी। देखो तुमने बिना साफ - सफाई के बारे में सोचे होली भी खेल ली और तुम्हे पता भी नहीं चला। "

अपनी सास , देवर और ननद की प्लानिग सुन और कुनाल की शरारती नजरें महसूस कर रागिनी के हरे गाल भी शर्म से गुलाबी हो गये।

आज उसे समझ आ गया था कि रंग लगाने और छुड़ाने के बीच में बहुत सारी खुशी और कभी न भुलाने वाली यादें होती है। इसलिये वो ढेर सारी प्यारी यादें बनाने के लिये अपने देवर, ननद और वहाँ आये सभी मेहमानों के संग होली खेलने लगी। और सभी के साथ "होली खेले रघुवीरा अवध में" पर खुद भी थिरकने लगी। और अपने पिया के संग पूरी तरह प्यार के रंगो में रंग गई।


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