एकाकी
एकाकी
वो छोटी दीवाली की रात थी। सोसाइटी के कम्पाउंड में चहल- पहल खत्म हो गयी थी । बच्चे पटाके छुड़ाने के बाद अपने – अपने घर जा चुके थे। एक -एक कर के घरों के अंदर की बत्तियाँ बंद हो चुकी थीं। बाहर लटकी झालरें एकाएक अकेली हो गयीं थीं। किसी झालर के बल्ब जल बुझ रहे थे, किसी के एकटक देखे जा रहे थे, कोई झालर लगातार लपलपा रही थी। गरज यह कि जिसे जो काम सौंपा गया था वह उसे किये चला जा रहा था, बिना रुके। कभी दूर छोड़े गये पटाखे की धड़ाम सुनाई दे जाती थी और सन्नाटा थरथरा के फिर ठहर जाता था, बल्कि उस आवाज़ के बाद और गहरा जाता था। यूं तो चहल- पहल और उत्सवी माहौल के इन दिनों तो मन उमगा उमगा होना चाहिये था या फिर रात के इस पहर दिन भर के कार्यक्रमों के बाद संतुष्टि और अलस भाव से भरा पर हम पर यह सन्नाटा, यह अकेलापन क्यों हावी हो रहा था।
सच तो यह है कि एक दिन पहले पार्क के किनारे अकेले बैठे अंकल और हवा में कुछ देर को उठे, रुके उनके हाथ हमसे भुलाये नहीं भूल रहे थे। अंकल से हमारा कोई व्यक्तिगत संबंध नहीं था, लेकिन हम उन्हें तकरीबन दो साल से जानते थे। उन दिनों हम जिस घर में रहते थे, उसके पीछे एक मंदिर था, काफी पुराना मंदिर और मंदिर से लगा हुआ पार्क था, जहां हमारा अक्सर जाना होता था। ऐसा कई बार होता था कि हम और अंकल एक ही समय में पार्क पहुंचते थे। अंकल तो शायद ही हमें पहचानते थे, हमें क्या, हमें लगता है कि पार्क और मंदिर में नियम से उसी समय रोज़ मौजूद रहने वालों में से शायद ही किसी को वे पहचानते होंगे। वे पार्क आते थे कुछ देर लोगों के बीच रहने की अपनी जरूरत पूरी करने। फिर वे लोग कोई भी हों उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता था। लेकिन अंकल को एक बार पार्क में देख लेने के बाद उन्हें भुलाना मुश्किल था।
84 या 85 वर्ष के रहे होंगे अंकल उस समय। उनके समूचे व्यक्तित्व पर आभिजात्य की छाप थी। कपड़े लत्ते बेहद सलीके और सुरुचि पूर्ण ढंग से पहनते थे। नहीं सायास नहीं, बस पूरी जिंदगी वैसे ही रहते रहते जैसे कुछ बातें आपका हिस्सा बन जाती हैं उस तरह से। वे अपनी गाड़ी में ड्राइवर के साथ आते थे। हाथ में छड़ी रहती थी पर ड्राइवर एकदम सट कर उनके साथ चलता था और इसकी जरूरत भी थी। पार्क की उबड़ – खाबड़ जमीन पर वे कभी भी लड़खड़ा सकते थे। एक एक कदम जमा कर बेहद आहिस्ता आहिस्ता चलते थे। उन दो वर्षों में ही कितना परिवर्तन आ गया था उनमें। शायद उम्र का यह पड़ाव होता ही ऐसा है कि सब कुछ जैसे ढलान से फिसलता चला जाता है। पहले वे सीढ़ियां उतर कर नीचे मंदिर तक आ जाया करते थे पर बाद में वे ऊपर से ही हाथ जोड़ कर पार्क की ओर मुड़ जाते थे। कभी भी परिवार का कोई सदस्य या कोई मित्र, परिचित उनके साथ नहीं दिखा। बस वे और उनका ड्राइवर ।
गाड़ी से उतरते ही वे मंदिर के बाहर पेड़ो के चबूतरों पर बैठे गाँव के बुजुर्गों को हाथ जोड़ कर नमस्कार करते थे। नमस्कार करते समय उनके चेहरे पर मुस्कान ज़रूर होती थी पर उस मुस्कान में एक बेचारगी का भाव होता था, जैसे कह रही हो कि हमें पता है मेरे आने न आने से आप लोगों को शायद ही कोई फर्क पड़े पर आपके यहां न होने से मुझे बहुत फर्क पड़ेगा। छोटी छोटी कोठरियों में पूरे परिवार के साथ रहते गाँव के उन बुजुर्गों के सामने जैसे वे अकिंचन हो उठते थे। पार्क, मंदिर में मिलने वाले हर छोटे – बड़े से वे हाथ जोड़ कर नमस्कार करते थे। हाँ, पास के गाँव के बच्चों को देखते ही उनके चेहरे पर एक अलग ही तरह की खुशी छा जाती थी। हमें लगता था बड़ों के सामने वे अंदर ही अंदर कहीं संकुचित हो उठते थे। शायद उन्हे लगता होगा कि लोग सोचते होगें कि वे अपनी इस अवस्था में उनसे हाथ जोड़ कर नमस्कार कर रहे हैं पर जब वे इतने बूढ़े और अकेले नहीं थे तब कहां कोशिश की थी इस तबके के लोगों से जुड़ने की। बच्चों के सामने यह संकोच बिला जाता होगा, तभी खुशी इतनी सच्ची लगती थी। अक्सर उनकी जेबें बच्चों के लिये टॉफी, चॉकलेट से भरी रहतीं थीं। कभी कभार अपनी गाड़ी में बिठा बच्चों को एक आध चक्कर भी लगवा देते थे। पर अपना अकेलापन भरने की हर कोशिश में अंकल पता नहीं क्यों कुछ और अधिक अकेले से लगते थे।
उस छोटी दीवाली से पहले वाली शाम अंकल के साथ पार्क में उनका ड्राइवर नहीं आया था। शायद उसका परिवार वहां नहीं रहता होगा और वह भी और बहुत से लोगों की तरह अपने परिवार के साथ दीवाली मनाने गया होगा। उस दिन उनके साथ कोई महिला थी। उनके परिवार या मित्र परिवार जैसी नहीं वरन् सहायिका जैसी। वह उन्हें पार्क में ज्यादा दूर नहीं ले जा पायीं थीं। अंकल को भी उनके साथ चलने में ज्यादा विश्वास नहीं हो पा रहा था। उसने अंकल को गेट के पास की ही एक बेंच पर बैठा दिया और पार्क में बच्चों को ले कर आयी अन्य सहायकियों के पास चली गयी। ड्राइवर हमेशा अंकल के साथ बेंच पर ही बैठता था। उस दिन पार्क के एक सिरे पर लम्बी सी बेंच पर बैठे अंकल कुछ और ज्यादा अकेले लग रहे थे।
हम जहां बैठे थे वहां से अंकल का साइड प्रोफाइल दिख रहा था। ऊँचे ऊँचे खूब छतनार इमली के पेड़ों से धीरे- धीरे उतरता अंधेरा अंकल के चारों ओर अपने पैर जमा रहा था। उस सूने से आलोक से घिरे, इक चुप में लिपटे बैठे अंकल। कैसी तो उदासी तारी हो रही थी मन में।
तभी अंकल के पास से एक नवयुवक गुजरा। अंकल ने हाथ जोड़ कर नमस्कार किया, उसने भी उत्तर दिया। अंकल ने हाथ आगे बढ़ाया, उसने भी हाथ आगे किया। अंकल ने अपनी दोनों हथेलियों के बीच उसका हाथ थाम हैंडशेक किया। हाथ कुछ देर ऊपर नीचे होते रहे। कुछ पल ज्यादा ही। फिर शायद उस नवयुवक ने धीमे से अपना हाथ खींच लिया। क्षणांश को अंकल के दोनों हाथ हवा में यूं ही ठिठके रहे, दोनों हथेलियाँ एक दूसरे थोड़े फासले पर। फिर उन्होंने धीमे से अपने हाथ नीचे कर लिये। लेकिन उस चुटकी भर समय का वह फ्रेम मेरी आँखों में, मेरे मन में जड़ा रह गया, हमेशा के लिये।
बोलने, बतियाने के लिये ही नहीं स्पर्शों के संवादों के लिये भी कितना तरस रहे थे अंकल। साथ छोड़ गयी पत्नी, विदेश जा बसे बच्चे, बिछड़े मित्र – पता नहीं कौन कौन याद आ रहा होगा उन्हें। एक अजीब सा दर्द पसरता चला गया भीतर।
उसी समय वो महिला अंकल को लेने आ गयीं। हम उन्हें अंधेरे में धीमे धीमे समाते, दूर जाते देख रहे थे। पता नहीं क्यों उस शहर से चले आने तक वे हमें फिर कभी पार्क में नहीं दिखे। पर आज भी हर दीवाली वे हमें ज़रूर याद आ जाते हैं।
