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Kiran Bala

Tragedy

4.8  

Kiran Bala

Tragedy

एक सवाल

एक सवाल

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आज ज्योति नहीं रही ! व्हाट्सप पर यह संदेश पढ़ते ही वक्त मानो ठहर-सा गया। पूरा शरीर कँपकपाने -सा

लगा,अभी परसों ही तो मिलकर आई थी उससे , शरीर पूरा पीला पड़ा हुआ था किसी बेजान मूरत सी लग रही थी। उसे टाइफाईड हुआ था। पंद्रह दिनों से विद्यालय नहीं आई तो सोचा क्यों न जाकर मिल लिया जाए ?

ज्योति हमारे विद्यालय में हिन्दी की शिक्षिका थी, हिन्दी में पी एच डी की हुई थी। किसी से ज्यादा बात नहीं करती थी किंतु सभी के प्रति स्नेह और आदर का भाव रखती थी। हमेशा उसके साथ किसी न किसी लेखक की पुस्तक होती थी। उसका अकेले में बैठ किताबों में खो जाना इस बात को दर्शाता था कि साहित्य के प्रति उसका कितना लगाव था।

ज्योति तीनों बहनों में मंझली थी। बड़ी बहन की उम्र चालीस के पार जा चुकी थी, पर अभी तक किसी का विवाह नहीं हुआ था। उसके घर का माहौल ही कुछ ऐसा था कि घर पहुँचने के बाद उसकी विधवा माँ उन्हें घर से बाहर कहीं नहीं जाने देती थी। घर भी ऐसा कि मानो कोई बंद डिब्बा हो। ऐसी घुटन भरी जिंदगी में कोई बीमार न पड़े तो क्या हो ?

नीरू जो उसके बेहद करीब थी,उसने कितनी बार उसकी माँ को समझाया कि इन्हें बाहर ले जाया करो किंतु वो यह कहकर टाल देती कि जमाना खराब है,डर लगता है।

उस दिन भी जब हम उसका पता करने गए थे तो ज्योति के पीले पड़ते हुए शरीर को देखकर नीरू से रहा नहीं गया। आप इसे धूप में क्यों नहीं ले जातीं ? गली के सामने जो पार्क है,कम से कम वहीं ले जाओ, (नीरू ने थोड़ा गुस्से में कहा) माँ को शायद नीरू की बात अच्छी नहीं लगी।

आपसे अगर इसे सँभाला नहीं जाता तो मेरे साथ मेरे घर भेज दो, मैं रख लूंगी अपने साथ। बच्चियों के लिए जेल कर रखी है एकदम। अगर तीनों बहनें मिलकर कहीं घूम आएं या फिर फिल्म ही देख आएं तो उसमे हर्ज ही क्या है? (नीरू बस बोलती ही जा रही थी) मैं ज्योति की माँ की तरफ देख रही थी, उनकी आँखों से स्पष्ट झलक रहा था कि जैसे कह रही हों, आ गई मेरी बेटी को बिगाड़ने।

जब से पैदा हुई है बस बीमार ही रहती है, अपनी किस्मत में मनहूसियत लिखवा कर लाई है (माँ ने बड़बड़ाते हुए कहा )।

अच्छा ज्योति हम चलते हैं, यह कहकर हम जाने लगे तो उसने नीरू का हाथ पकड़ लिया मानो आग्रह कर रही हो कि अभी मत जाओ। वहाँ से आने के बाद मैंने कई बार उसके पास फोने किया किंतु उसने कोई जवाब नहीं

दिया। विद्यालय से और भी कुछ लोग उसका पता करने गए पर किसी ने दरवाजा नहीं खोला। शायद किसी से उसे मिलने ही नहीं देना चाहते थे।

अब सवाल यह उठता है कि क्या ज्योति बीमारी के कारण मरी ? या फिर उसकी घुटन भरी जिंदगी ने उसे मारा, क्या वो खुद को मनहूस समझने लगी थी ? या फिर कहीं उसके मन में जीने की इच्छा ही समाप्त हो चली थी? आज फिर एक रूढ़िवादी परम्परा की बलिवेदी एक लड़की चढ़ गई थी ! ये कैसा समाज है ! जहाँ आज भी ज्योति जैसी न जाने कितनी ही युवतियाँ जीने की आकांक्षा त्याग देती हैं।

आखिर कौन है ज्योति का हत्यारा ? क्या कोई बता सकता है उसकी मौत की वजह ?


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