एक सपना जो पूरा हो गया
एक सपना जो पूरा हो गया
बात कक्षा तीसरी की है अर्थात मैं महज आठ बरस का था।
मुझे अपने स्कूल की ओर से नाटिका ‘‘राजा भोज, माघ और बुढ़िया’’ में भाग लेना था। पहले इसका कुछ अभ्यास हुआ,और चयन होने के दिन मैं समय पर नहीं पहुंच सका तो मुझे इसमें भाग लेने का अवसर नहीं मिला, इसमें मेरे सहपाठी को यह अवसर मिला और यह नाटक लोकप्रिय हो गया।
दर्शक दीर्घा का हिस्सा बना मैंने यह नाटक देखा तो मेरे मन में राजा भोज के प्रति और जानने की इच्छा हुई।इसी बीच मुझे सिंहासन बत्तीसी पढ़ने को मिल गई। अब राजा भोज मेरे लिए आदर्श बन चुके थे कि किस तरह बत्तीस पुतलियों के द्वारा विेक्रमादित्य के सिंहासन पर बैठने नहीं दिया गया।
तब उन्होंने वह सिंहासन जंगल में उसी जगह पर जमीन में गाड़ने का आदेश दे दिया। मेरे सहपाठी इतने सालों में यह घटना शायद भूल गये होंगे और इस आयोजन को दर्शक भी लेकिन मैं हमेशा इस दिशा में कार्य करते रहा कि राजा भोज के व्यक्तित्व के अनुरूप उनकी छवि को प्रस्तुत करूं। मुझे जब भी अवसर मिला उनके व्यक्ति पर साहित्य को एकत्र करके उसे पुस्तकाकार करके प्रस्तुत किया। यह भी संयोग है कि 2012 में राजा भोज के राज्यरोहण के 1000 बरस पर मेरी लघु पुस्तिका लोक कथानायक राजा भोज किताब प्रकाशित हुई।आज भी राजा भोज का व्यक्तित्व मेरे लिए आदर्श है। प्रतिवर्ष हम वसंत पंचमी को उनका यह साहित्य लोगों को उपलब्घ कराते हैं ताकि उनकी बहुआयामी प्रतिभा से लोग प्रेरणा ले सके।
