Harish Sharma

Drama Fantasy Inspirational


1.0  

Harish Sharma

Drama Fantasy Inspirational


एक रात

एक रात

10 mins 940 10 mins 940

मैं उसके इरादों को भाँप सा गया।

ये भी हो सकता था कि मैं गलत होता, आदमी इतना गिर कैसे सकता है।

सोचते सोचते पता ही न चला कि कब आँख लग गयी। गहराती रात में जो सन्नाटा होता है उसमे कई आवाजें आपसे बहस करती, रुठती मनाती कब सपनों की खिड़की से कैसे दृश्य लेकर सामने आ जाय, यह कहना मुश्किल होता है।

शायद सपने में आप बिलकुल असहाय हो जाते हैं। यूनिवर्सिटी में पढ़ते हुए ऐसा सुना था कि यह आदमी की सोच और समझ नए आकार लेती है। उसमे नई आशाएँ पैदा करती है, एक सुनहरे भविष्य की स्वप्निल आशा और सुरक्षित जीवन की उम्मीद। कुछ ऐसी ही उम्मीदों के साथ पढ़ते-लिखते, खाते-पीते, सीखते-समझते नए और पुराने मित्र शत्रु मिलते गए, बिछुड़ते गए, बदलते गए।

इन्हीं में से एक मित्र वो था जो आज तक दिमाग में कौंधता है। शायद इतने बरसों पहले घटी उस रात ने मुझे कई बार जगाया है। उस रात में कही बातें मुझे अपने सोये हुए बच्चों को देखकर याद आती है। मैं न चाहते हुए भी डर जाता हूँ ये सोचकर कि आदमी के इरादों को सूंघ लेना भी उसे जान लेने जैसा होता है।

'यार कोर्स तो पूरा हो गया, एक दो महीने में डिग्री भी मिल ही जायेगी, पर .....।"

हँसते और चुटकले सुनाते हुए वो तीन पेग पी चुका था। न जाने ये चिंता बीच में कहाँ से आ गयी। होस्टल का लास्ट डे था। बिछुड़ने के इस पल को उत्सव में बदलने के लिए हम तीन थे। वो मैं और एक अंग्रेजी अद्धा। कमरे की दीवार पर चिपका हिटलर का पोस्टर बिना मुस्कुराये हम दोनों को घूर रहा था। मैंने उसे कभी उतरा नहीं क्योंकि ये मेरे इस दोस्त का दिया गया एक सप्रेम उपहार था।

खैर मैंने इस आनंदमयी माहौल को इस तरह की बातों में जाया न करने की हर कोशिश को नकारते हुए कहा," अरे यार, तुम ये बताओ कि भाभी से शादी का इरादा कब है। पिछले तीन साल से तुम लोगों की लव स्टोरी तो परवान चढ़ेगी ही। सब दोस्त दुबारा इकट्ठे होंगे उस दिन। मैं तो भाई पूरा प्रोग्राम अभी से सोच के बैठा हूँ।"

"भाभी को घर ले जाने के लिए एक शानदार नौकरी मिल जाये। सब प्रोग्राम पूरे होंगे यार पर ये साले जो अपने से पहले डिग्री ले लेकर बैठे हैं, सब अभी सड़क पर ही बेरोजगार की तख्ती लटकाये घूम रहे हैं पर मैं तेरी भाभी को खोना नहीं चाहता, नौकरी वौकरी तो मुझे उससे करवानी नहीं है, मैंने साफ़ कह दिया है उसे।"

"कर भी ले तो बुरा क्या है,दोनों ऐश करोगे।"

"तू जानता है, मम्मी-पापा दोनों नौकरी में थे, पैसे टके की कभी कोई कमी नहीं रही। हम दो भाई बहन बचपन से होस्टल में पढ़े।

मम्मी पापा के पास टाइम नही था हमारे लिए। हाँ छुट्टियों में कभी कभार आते या नौकर के हाथ खाने पीने का सामान भिजवा देते। हम बड़े होते गए और यह सिलसिला बना रहा।

पूरा बचपन और आधी जवानी होस्टल में निकल गयी। अब भी अगर घर न जाऊँ तो कोई ज्यादा फर्क उन्हें पड़ने वाला नहीं।

हाँ, पैसे जब चाहूँ, मंगवा सकता हूँ। शायद उन्हें ऐसा सम्बन्ध ही अच्छा लगता है। अब तो फोन पर बात करना भी एक फॉर्मेलिटी सी लगती हैं।" वो भावुक हो गया था या उसका कोई रोष सामने प्रकट हो रहा था शायद मैं भी पीते समय इसका सही अंदाजा नहीं लगा पा रहा था।

फिर भी नशे का सरूर इतना हावी नहीं था कि मैं उसकी कही बातों को समझ न सकूँ।

"तुम्हें पता है अब एक दो साल में दोनों रिटायर हो जायेंगे, इस दौरान अगर मैं इस बेरोजगारी के दौर में नौकरी पा जाऊँ तो कम से कम अपनी पत्नी और बच्चों के साथ मम्मी-पापा जैसी जिंदगी तो नहीं दुहराऊँगा। मुझे घर में रहने की बड़ी देर से प्रतीक्षा है। मैं घर के मायने अपने भीतर समाना चाहता हूँ।"

वो शायद नशे में भावुक ही हो रहा था। घर के बारे में सोचते हुए वो टेबल पर ऊँगली से गोल गोल रोटी जैसा चक्कर बनाने लगा।

मैं और पीने के मूड में नहीं था पर उसने अपना गिलास फिर भर लिया।

सुना था कि आदमी नशे में अपनी सारी गाँठों से मुक्त हो जाता है। मेरे मित्र के अंदर भी पुरानी गाँठे थी जिन्हें शायद वो किसी गंभीर बीमारी बनने से पहले ही अंदर से निकाल देना चाहते थे।

मोबाइल की घंटी बजी तो उसने स्क्रीन को कुछ देर ताका और फिर कॉल पिक कर ली।

'हाँ हाँ....ठीक है....जी पापा... अच्छा ....कल दो बजे तक लौटूँगा... जी हाँ शर्मा अंकल से ले लूँगा ... ठीक है... ओ के।"

"और घर जा रहे हो क्या कल ?" मैंने उसकी बातों से अंदाजा लगाया।

"हाँ जाना ही पड़ेगा, साली पढ़ाई जो खत्म हो गयी है। पापा कह रहे हैं बेटा हम कल दोपहर किसी पार्टी में जा रहे है, देर शाम तक लौटेंगे, पड़ोसी से चाबी ले लेना।.....मैं लगभग डेढ़ महीने बाद घर लौट रहा हूँ। घर पहुँचूँगा तो मेरे इंतजार में घर का पालतू कुत्ता और घर के बाहर पड़ा ताला होगा। तुम्हें पता है कि यहाँ मेरे कमरे की चाबी मैं घर से आकर तुमसे लेता हूँ और कल घर की चाबी पड़ोसी से लूँगा। ...यार मुझे कई बार लगता है कि मैं किराये के मकानों में भटक रहा हूँ और मेरा पक्का ठिकाना अभी तक कोई बन ही नहीं सका, रिश्ते भी बस ऐसे ही हैं जैसे किसी शरणार्थी कैंप में रहने वालो के सेना के साथ होते हैं।"

"यार ऐसा नहीं सोचते, अंकल आंटी को कहीं जरुरी जाना होगा वरना ......।"

उसने मुझे बात पूरी नहीं होने दी।

"जब से मैंने होश संभाला है, सारी दुनिया उनके लिए जरूरी बनी रही, बस मैं ही फालतू रहा। क्या वाकई माँ बाप ऐसे होते हैं, किसी किताब में तो आज तक ऐसा नहीं पढ़ा देखा।"

मैं क्या कहता, वो काफी पी चूका था और भावुक था उसकी आँखों में पानी था।

उसने कई बार सर झुककर आँखें पोछी। फिर कुछ देर मौन हो गया।

"अच्छा हाँ, तूने नौकरी के बारे में क्या सोचा और घर कब जा रहा हैं।"

"हाँ मुझे कल यहाँ कुछ लाइब्रेरी की किताबें लौटानी हैं फिर जाऊँगा। मेरे गाँव के नजदीक एक इनश्योरेन्स कंपनी का दफ्तर है वही मार्केटिंग मैनेजर की जॉब की इंटरव्यू पर जाना है, देखते हैं फिर...।"

"यार ये अपना क्लासमेट था न महेश, बड़ा लकी निकला, बैंक की सरकारी नौकरी मिल गयी उसे। पहले चांस में ही पी ओ का पेपर क्लीयर कर गया।"

"हाँ भाई, ट्राय तो हमने भी किया था पर साला जनरल कैटागरी की मेरिट बड़ी ऊँची गयी।"

"ये साला सिस्टम ही ऐसा है।"

वो उठ कर खड़ा हो गया। नशे का सुरूर उसकी आँखों में तैर रहा था।

"अरे यार जा रहे हो क्या, यही सो जाओ।"

"जाना तो है ही, मुझे सुबह उठकर थोडा सामान समेटना है इसलिए अपने रूम में ही सोऊँगा।"

वो कुछ कदम चला, फिर वापस आकर मेरे सामने बैठ गया।

"अच्छा यार, ये जिनके माँ बाप सरकारी नौकरी में होते हैं और रिटायर होने से पहले जिनकी मौत हो जाती है फिर......।"

"फिर क्या ?"

"नहीं, मतलब उनके बच्चों को उनकी जगह ...।"

"हाँ, हाँ, ऐसा सिस्टम है कि उनकी जगह उनकी औलाद को नौकरी दे दी जाती है, दया के आधार पर।"

"उसी पद पर नियुक्ति होती होगी जिस पद पर आदमी नौकरी करते हुए मरा हो।"

"अब यार इसके बारे में मुझे ज्यादा पता नहीं है, हाँ पर नौकरी जरूर मिल जाती है।"

"चलो इस बेकारी के दौर में सरकार इतनी तो दया कर ही लेती है।"

"क्यों, कोई घटना घटी है क्या किसी के साथ।"

"कब क्या हो जाये किसको पता है ? मैं तो बस जानकारी के लिए पूछ रहा था.....अच्छा चलता हूँ, फोन करता रहूँगा। मुझे कल सुबह ही निकलना है।"

कह कर वो मेरे गले मिला और चला गया।

मैं भी सोने के मूड में था। रात के साढ़े बारह बज रहे थे। अपने दोस्त की बातों के बारे में सोचते सोचते सो गया।

अजीब सा सपना था, जैसे मेरा कोई अपना मुझे सोते समय गला दबाकर मारने की कोशिश कर रहा हो। मैं हड़बड़ाकर उठ बैठा। सिरहाने रखा पानी पिया। मोबाइल की स्क्रीन पर चेक किया तो साढ़े चार बज रहे थे।

"मुझे ऐसा सपना क्यों आया...क्या कोई फिल्म, घटना या कोई किस्सा मैंने पढ़ा था जो मेरे अवचेतन में कही रह गया और उसी के कारण यह सपना आया......पर जहाँ तक मुझे याद पड़ता है ऐसी कोई भी बात मुझसे सम्बंधित नहीं थी। मेरा किसी के साथ कोई झगड़ा भी नहीं हुआ...रात भी वो और मैं खा पीकर सोये हैं तब भी कोई ऐसी बात.....यहाँ तक कि मुगल इतिहास पढ़कर भी मैं सोया नहीं था।

अचानक मेरा माथा ठनका, मैं जो सोच रहा था मुझे वो मन का ही वहम लगा। भावुकता अच्छी भी है और खतरनाक भी।

मुझे अपनी इस सोच पर शायद थोड़ी हँसी भी आई। मैंने सब बातें सोचना छोड़ दोबारा सोने की कोशिश की। इधर उधर करवटें बदलते हुए मुझे लगा कि मैं अपनी नींद पूरी कर चूका हूँ। अचानक साढ़े पाँच बजे वाली ट्रेन की सीटी कुछ दूरी पर गुजरती रेल पटरी पर सुनी। होस्टल से कुछ ही दूरी पर ये रेल पटरी गुजरती थी। मुझे याद आया कि आज तो वो घर लौट रहा है। सुबह आठ बजे तक चला ही जायेगा। सोचते हुए मैंने कपड़े पहने और उसके कमरे की तरफ तेज चाल से बढ़ गया।

"क्यों भाई, मेरे जाने की चिंता में नींद नहीं आई। चलो नीचे मेस में चलकर चाय पीते हैं।" वो मुझे देखकर खुश हुआ।

"हाँ हाँ चाय तो पी लेंगे, दो मिनट बातें करले पहले। अगर जल्दी न हो तुम्हें।"

"जल्दी तो है, जाने से पहले तेरी भाभी को उसके हॉस्टल के बाहर मिलकर जाना है पर तो भी तो मेरा यार है...आ बैठ।"

"कल रात तुम जो पूछ रहे थे ....."

"क्या पूछ रहा था भाई, अब तो मुझे कुछ याद नहीं, शायद ज्यादा ही पी ली थी। मुझे तो ये भी याद नहीं मैं अपने कमरे में कैसे आया।"

"देख भाई, तुझे मेरी कसम,अपनी दोस्ती का वास्ता देकर पूछता हूँ ....।"

"क्या हुआ यार, कोई गाली वाली दी क्या मैंने रात में...यार आई एम् सारी। तुझसे कोई नाराजगी नहीं है,नशे में कुछ बोल गया हूँ तो अपना भाई समझ कर माफ़ कर देना।"

"ऐसा कुछ नहीं हुआ है....वो जो तुम नौकरी की बात कर रहे थे ...दया के आधार पर।"

"अच्छा वो ....वो तो ऐसे ही..बस।"

उसकी आवाज कँपकँपाने लगी, वो इधर-उधर देखकर बात करने लगा। उसकी नजर भटकने लगी जैसे कुछ भी देखना न चाहती हो।

"तू मेरा सबसे प्यारा दोसत है, मेरे सर पर हाथ रखकर मुझे अपनी मंशा बता, मैं बहुत डर महसूस कर रहा हूँ।"

कुछ देर अजीब सी चुप्पी हम दोनों के बीच छा गयी। अचानक उसके मोबाइल की घण्टी बजी।

"हाँ पापा... नमस्ते ..जी..ट्रेन दस बजे की है ..क्यों..आप को तो कही जाना था ...मै आ जाऊँगा ..अच्छा स्टेशन पर...आप खुद आ रहे हैं..जी ठीक है..मिलते हैं ..।"

बात करने के बाद वो कुछ सोचने लगा और फिर रोने लगा।

"क्या हुआ ,सब ठीक तो हैं न घर में।"

मैंने उसके कंधे पर हाथ रखकर पूछा।

"तुम ये जानना चाहते थे न कि मैं रात को वो दया वाली नौकरी के बारे में क्यों पूछ रहा था ...मेरे मन में पाप पैदा हो गया था..अपने पापा की हत्या करने का पाप...कि उनके मरते ही मेरी नौकरी पक्की हो जायेगी। वैसे भी कोई ऐसा रिश्ता हमारे बीच शायद बन ही नहीं पाया जो मुझे ऐसा सोचने से रोक पाता पर आज मैं एक बहुत बड़ी गलती करने से बच गया हूँ। ...तुम्हें पता है, अभी पापा का फोन था, मुझे खुद स्टेशन लेने आयेंगे। मेरा जी करता है कि उड़ कर उनके पास पहुँच जाऊँ और छोटे बच्चे की तरह उनकी गोद में चढ़कर गले लग जाऊँ।"

कहकर वो बेतहाशा रोने लगा। मेरी आत्मा तक काँप गयी। उसके इस भयानक इरादे का सारा आधार खुलता सा गया।

समय बीतता गया, नए रिश्ते बने और मैं इतने सालों बाद अपने बच्चों के बीच केवल एक सुखद अहसास के कारण उस बात को भूल पाता हूँ।

सोचता हूँ कि अगर उस दिन सुबह उसके कमरे तक पहुँचने से पहले उसके पापा को न कर अपने बेटे को जरा सा प्यार देने के लिए न समझाता तो शायद क्या हो जाता ?

और हाँ अब मेरे कमरे में किसी हिटलर के पोस्टर की कोई जगह नहीं है।


Rate this content
Log in

More hindi story from Harish Sharma

Similar hindi story from Drama