एक पुराना महल....
एक पुराना महल....
एक तूफ़ानी रात, बिजली ऐसे कड़कती कि कलेजा ही चीर रख देती, बारिश थी के थमने का नाम नहीं ले रही थीं, तभी संग्राम सिंह की जीप रास्ते में रूक गई, उसने बहुत बार स्टार्ट की लेकिन जीप चालू ना हुई, थक हार कर उसने सोचा क्यों ना रातभर रूकने के लिए कहीं ठिकाना ढूंढ़ लूँ, क्योंकि जीप तो खुली हुई थी और ये जंगली जानवरों का इलाका अगर कहीं से कोई जंगली जानवर आ गया तो बेमौत मारा जाऊँगा।
उसने अपना रैनकोट पहना, अपनी बंदूक हाथों में पकड़ी और उतर पड़ा जीप से रातभर रूकने के लिए ठिकाना ढूंढ़ने लगा, उसने इधर उधर देखा उसे दूर एक रोशनी दिखाई दी, वो उस रोशनी की दिशा की ओर बढ़ चला, पास जाकर पता लगा कि वो तो एक महल है, जो बहुत पुराना है, उसने महल का दरवाज़ा खटखटाया तभी एक बूढ़े ने दरवाज़ा खोला।
बाबूजी! कौन हैं आप? उस बूढ़े ने पूछा।
बाबा! मैं वन विभाग का अफसर हूँ, मेरा नाम संग्राम सिंह है, पेड़ों की चोरी की कुछ शिकायतें आईं थीं इसलिए अकेले ही जाँच करने निकल पड़ा, मुझे क्या पता था कि बारिश होने लगेगी, वैसे भी मैं यहाँ बिल्कुल नया नया हूँ, इसलिए ज्यादा कुछ जानता नहीं इस जगह के बारे में।
तो बाबूजी! बाहर क्यों खड़े हैं भीतर आ जाइए, मैं रामदीन हूँ, यहाँ की देखभाल करता हूँ, उस बूढ़े ने कहा।
लेकिन, तुम्हारे मालिक तो कुछ ना कहेंगे, संग्राम सिंह ने रामदीन से पूछा।
जी, मालिक को गुजरे हुए तो जमाना हो गया, उनका बेटा, बहु है जो अब विदेश में रहते हैं, मैं ही इस महल की देखरेख करता हूँ, रामदीन बोला।
अच्छा, बाबा! क्या चाय मिल जाएंगी, संग्राम सिंह ने पूछा।
हाँ, बाबूजी ! जरूर, चलिए आप बैठक के अलाव के पास बैठिए, मैं तब तक चाय लाता हूँ और हाथ पैर ठीक से सेंक लीजिएगा, क्योंकि ये पहाड़ी इलाका है यहाँ अक्सर ठंड रहती है और बारिश के बाद तो और भी ठंड बढ़ जाएगी, रामदीन बोला।
ठीक है बाबा! और इतना कहकर संग्राम सिंह ने अपने कोट की जेब से सिगार निकाला और अलाव से सुलगाकर पीने लगा, तब तक रामदीन भी चाय लेकर आ पहुँचा, संग्राम सिंह ने चाय पी और आरामकुर्सी पर बैठ गया, उसे अब झपकी आने लगी थी,
रामदीन बोला, मैं आपके लिए मैं कम्बल ला देता हूँ, आप यहीं इसी आराम कुर्सी पर सो रहिए।
ठीक है बाबा! संग्राम सिंह बोला।
और रामदीन ने संग्राम पर कम्बल डालते हुए कहा कि अब आप सो जाइए, यहाँ अलाव जल रहा है, आपको ठंड भी नहीं लगेगी, मैं भी यहीं फर्श पर बिस्तर बिछाकर सो जाता हूँ।
और दोनों बैठक में सो गए, करीब आधी रात के वक्त एकाएक संग्राम को लगा कि कोई गाना गा रहा है, उसने बैठक की बड़ी सी नक्काशीदार खिड़की से बाहर झाँककर देखा कि एक लड़का और एक लड़की गाना गा रहे हैं और जैसे ही उस पर उनकी नज़र गई, वे दोनों गायब हो गए संग्राम ने भी चारों ओर नज़रें दौड़ाईं लेकिन दोनों ना दिखें, वो कुछ देर वहीं खड़ा रहा फिर उसने अपनी कोट की जेब से एक सिगार निकाला लाइटर से जलाया और वहीं खिड़की पर खड़े होकर पीने लगा और तभी उसी समय हवेली की छत से दो शरीर नीचे गिरे और जमीन पर गिरते ही वो लहुलुहान हो गए, ऐसा मंजर देखकर संग्राम की चीख निकल गई उसकी चीख सुनकर रामदीन भी जाग पड़ा।
और भागकर संग्राम सिंह के पास आकर पूछा___
क्या हुआ ? बाबूजी, आप चीखें क्यों?
बाबा! अभी कुछ देर पहले एक लड़का और लड़की गाना गा रहे थे और कुछ देर में वो गायब हो गए फिर पता नहीं ऊपर छत से गिरे और धरती पर गिरकर लहूलुहान हो गए, आपको मेरी बात पर भरोसा नहीं होता तो खिड़की से बाहर झाँकिए, दोनों की लाशें, फर्श पर पड़ी होंगी।
रामदीन ने खिड़की से बाहर झाँका तो उसे कोई नहीं दिखा और बोला कोई नहीं है बाबूजी !आपका वहम होगा।
वहम नहीं बाबा! कोई तो था वहाँ, संग्राम सिंह बोला।
हाँ, वो दोनों अक्सर यहाँ आते हैं लेकिन किसी को कोई नुकसान नहीं पहुँचाते, रामदीन बोला।
लेकिन वो दोनों हैं कौन ? संग्राम ने पूछा।
वो दोनों प्रेमी हैं और उनकी एक कहानी है, रामदीन बोला।
तो बाबा! सुनाइए कहानी, मुझे भी सुननी हैं, संग्राम बोला।
तो सुनो, सालों पहले इस महल में राजा दुर्गेश प्रताप सिंह रहा करते थे, वो थोड़े क्रूर प्रकृति के थे, उनकी जनता उनसे खुश नहीं थीं, उनकी एक सुन्दर सी बेटी थी जिसका नाम राजहंसिनी था, वो हंस की ही तरह सफेद थीं।
उनके ही गाँव में एक किसान पर उन्होंने इतना लगान चढ़ा दिया कि वो उतार नहीं पाया, इसलिए उस किसान की राजा के सैनिकों ने इतनी पिटाई की कि वो सह ना सका और वो मर गया लेकिन उसके बेटे मधुबन ने अपने पिता की मौत का बदला लेने की ठानी और इसके लिए उसने राजहंसिनी को चुना , उसने सोचा कि वो उससे प्यार का नाटक करके राजा से बदला लेगा, क्योंकि राजा सबसे ज्यादा प्यार अपनी बेटी से करता था ।
एक रोज राजहंसिनी अपनी सहेलियों के साथ घूमने गई और उसे वहाँ मधुबन मिला, मधुबन की बातों ने उसका मन मोह लिया और धीरे धीरे दोनों के बीच मेल मिलाप बढ़ने लगा, दोनों एक दूसरे को दिलोजान से चाहने लगे।
अब रोज रात को मधुबन, राजहंसिनी से मिलने आने लगा, राजहंसिनी अपनी खिड़की से रस्सी लटकाती और मधुबन चढ़कर राजहंसिनी के कमरे में पहुँच जाता, इसी तरह दोनों की मुलाकातें होती रहीं लेकिन एक दिन ये भनक राजा को लग गई और उसने राजहंसिनी से ये कहा कि मधुबन अपने पिता की मौत का बदला लेने के लिए उससे प्यार का नाटक कर रहा है।
राजहंसिनी को ये बात सच नहीं लगी, उसने राजा से कहा कि वो ये सच मधुबन के मुंह से सुनना चाहती है और जब मधुबन रात को उससे मिलने आया तो राजहंसिनी ने उससे ये सवाल पूछा।
तब मधुबन बोला कि मैंने तुमसे प्यार का नाटक किया तो इसी इरादे से था लेकिन मैं अब तुम से सच्चा प्यार करता हूँ और उसी समय राजा भी दो तीन सैनिकों के साथ वहाँ आ पहुँचे और सैनिकों से कहा कि इसके हाथ पैर बाँधकर महल की छत से फेंक दो और यहीं किया गया, राजहंसिनी चीखती रही चिल्लाती रहीं लेकिन उसकी किसी ने नहीं सुनी और दूसरे दिन वो भी रात के समय हवेली की छत से कूद पड़ी, इस तरह वे दोनों ये दुनिया छोड़कर चले गए।
रामदीन ने कहानी सुनाने के बाद कहा कि बाबूजी !अभी रात बाकी़ है, आप सो जाइए और संग्राम उस आराम कुर्सी पर सो गया।
जब सुबह संग्राम की आँख खुलीं तो वो अपनी जीप में था और उसके सामने एक वीरान उजाड़ से टूटे फूटे महल के खण्डहर थे, उसके ही सामने उसकी जीप खड़ी थी और वो सोच में पड़ गया कि जो उसने देखा क्या वो सपना था या हकीकत? क्या रात में वो वाकई किसी पुराने महल में गया था?

