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दोहरे मापदंड

दोहरे मापदंड

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"मैम... जरा सोसायटी के ऑफिस में आ जाइए प्लीज़.....

वो क्या है कि आपके घर पर अभी सर नहीं है, नहीं तो हम आ जाते..." मैनेजर ने इंटरकॉम पर प्रतिमा से अनुरोध किया।

वहाँ पहुँचने पर पता चला सोसायटी के दो भद्र महानुभावों को प्रतिमा के यहाँ होने वाली बाल मजदूरी अखर रही है। वो चाहते थे की तुरंत उस बच्चे को घर भेजा जाऐ। वो लोग अभी ऑफिस तो नहीं आये थे पर 3/4 मेल जरूर भेज चुके थे। प्रतिमा ने कुछ नहीं कहा और अपने घर रहने वाले 13 वर्षीय मुकेश को बुला लिया।

"मुकेश ... यहाँ के लोग कहते हैं कि तुम्हें नौकरी नहीं करनी चाहिए और तुंरत वापस गांव चले जाना चाहिए।" प्रतिमा ने उसे बताया।

मुकेश का चेहरा एकदम से सफेद हो गया। बेहद घबराकर उसने पूछा.."कौन से लोग मम्मी... वो ऐसे कैसे बोल सकते हैं...अब क्या होगा..मैं कहीं नहीं जाऊँगा..."

मैनेजर चकरा गया..उसने तो कुछ और ही सोचा था।

"हाँ जी...ये मुझे मम्मी ही बोलता है जैसे मेरे बेटे बोलते हैं, उन्हीं से सीखा है। ये यह सोच कर ही घबरा गया कि अब इसकी अम्मा को फिर से इस के साथ मजूरी करने खेत पर जाना होगा और फिर इसके एक पैर से लाचार बाबू जी को घर पर कौन संभालेगा....इसे फिर से एक वक्त ही खाना मिलेंगा वो भी सूखी रोटी...इसकी पढ़ाई यही छूट जायेगी और जो आत्मविश्वास यहाँ रहने से आया है सब मिट्टी हो जायेगा..." प्रतिमा ने कहा।

मुकेश को स्तब्ध खड़ा देख प्रतिमा ने मुस्कुराते हुए कहा- "तुम घर जाओ मुकेश..कोई कहीं नही भेजेगा तुम्हें..."

"मम्मी मै बता रहा हूँ, मैं कहीं नहीं जाऊँगा।" बोलता हुये मुकेश घर की तरफ भाग लिया।

मैनेजर हैरान परेशान प्रतिमा को ताक रहा था।"हमारे यहाँ कामवाली घर का काम करती हैं, वाशिंग मशीन मे कपड़ें धुलते हैं, कुल मिलाकर तीन लोग घर में रहते है फिर बाल मजदूरी कैसे होती होगी, ये बताइये जरा....आप लोग जानते भी है बाल मजदूरी क्या होती हैं..."तमतमायी प्रतिमा बोली।

"फिर ये क्या करता है मैम...."सकुचाते मैनेजर ने पूछ ही लिया।

"दोनों बेटे यहाँ नहीं रहते हैं, बस कॉलेज की छुट्टी मे आ पाते हैं। साहब सुबह के निकले रात को आते हैं....बच्चों की दादी को अकेले घर मे छोड़ कर मैं कहीं भी जा नहीं सकती, 80 वर्षीय माताजी बिल्कुल अकेली पड़ जाती थी...यह दिन भर उनके साथ रहता है, उनके और घर के छोटे-मोटे काम करता है ...माताजी का अकेलापन कट जाता है...उनसे रामायण वगैरह की कहानियाँ की चर्चा करता है, जो नौटंकी में गांव में देखता होगा। TV की कहानियों पर बातें करते रहते हैं दोनों....दोपहर में मैं घंटे दो घंटे इसे पढ़ाती हूँ.... हिंदी काफी सीख ली, अब अखबार पढ़ कर भी सुनाने लगा...इंग्लिश सीख रहा है जिसका TV के विज्ञापन के साथ अभ्यास होता रहता है..." प्रतिमा ने खुलासा किया।

मैनेजर प्रसन्न नजर आने लगा....शायद उसको मुकेश मे अपने गांव मे रह रहे बच्चे नजर आये हो।

"इसका चाचा हमारे परिचित का ड्राइवर है..जब ये यहाँ आया था तो दुबला पतला डरा हुआ सा था। कई दिन हिंदी बोलने मे लगे। बेटो को देख कर मम्मी-पापा, दादी माँ ही बोलने लगा...अब तो दिन भर कान खाता रहता है....हम लोगों के साथ घूमने भी जाता है, हमेशा साफ-सुथरा रहता है ...महीने की तनख्वाह पूरी गांव भेजता है। कहता है, थोड़ा बड़ा हो जाऊँ तब तक आपसे खाना बनाना सीख कर एक पराठें सब्जी का ठेला लगा लूँगा....." प्रतिमा बोली।

"मैम... आप जाइए... मैं सबको समझा लूँगा.... इसे वापस भेज कर इसकी और इसके परिवार की जिंदगी बर्बाद नहीं होने दूँगा...."मैनेजर ने प्रतिमा को आश्वासन दिया।

प्रतिमा लौटने को हुई कि मुकेश दौड़ता हुआ वापस आ गया....

हाफँते हुए उसने बताया " मम्मी पता है....मैं जब भी डाँगी घुमाने जाता हूँ, B ब्लॉग वाली एक आंटी और एक छड़ी लेकर घूमने वाले अंकल मुझे अपने घर काम करने को बोलते रहते हैं...कल भी मेरे से कह रहे थे, मैंने उनकी बात नहीं सुनी तो गुस्सा रहे थे....उन्हीं आंटी ने भैया जी से बोला होगा यहाँ से भेजने को....मैनेजर अवाक् खड़ा इस बात की गवाही दे रहा था कि मुकेश सच कह रहा था।


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