दो बाल मन
दो बाल मन
बाल जीवन हमे जितना सरल लगता है उतना शायद ही होता है। मासूमियत और अज्ञानता को जब संघर्ष और गरीबी का साथ मिलता है तो बहुत ही संघर्षशील युद्ध नज़र आता है।
हालांकि मेरा बचपन उपर्युक्त दोनो अवस्थाओं से दूर रहा परंतु मैंने अपने नजदीकी कारखाने में जीवन कमा रहे एक बालक को देखा है। नाम से विराट मगर शरीर से विराट अतिशयोक्ति होगा, हाँ मगर काम से वो अथाह विराट था।
एक दिन अपने घर पर खाली बैठा मैं सोच रहा था कि जाऊँ एक बार पिता जी का कारखाना ही देख आऊँ, परंतु अपने आलस के कारण उठ नहीं पा रहा था। अंततः जाने को तैयार हुआ तो दो किलोमीटर की दूरी साधन ना होने के कारण लंबी जान पड़ी। पर कैसे भी मैं वहाँ पहुँच और वहाँ के दृश्य में एक अलग ही कठोरता दिखाई दी। मजदूरों में लोग जितने गरीब थे उतने ही ताकतवर। लोगों की कार्य क्षमता से मैं भांप पा रहा था कि ये योद्धा कितना गरीब होगा। गरीबों में भी वर्ग होते थे। जो लोग अपनी गरीबी को कोसते, गुस्से से लाल होकर, ये... भारी भारी हथौड़े ईंटे-पत्थरों पर पूरे वेग से चला रहे थे वे सबसे गरीब थे। जो उससे कम गरीब थे वो लोहा पिघला रहे थे। और उनमें सबसे अमीर जन कुर्सियों पर बैठ कर आदेश दे रहे थे और निरीक्षण कर रहे थे। मेरी समझ में बस ये नहीं आता था कि मेहनत विपरीत होने पर भी कुर्सियों पर बैठे लोगो को ज्यादा बड़े और कड़े नोट मिलते थे और पत्थर तोड़ते इंसान को लोहे के सिक्के।
इसी बीच मेरी नज़र मेरी उम्र के एक किशोर पर पड़ी जिसका काम था बस लोहे की तेढ़ी कीलियाँ बीनना।
उसने पिता जी से कितनी ही बार आग्रह किया था कि उसका काम और वेतन बढ़ा दिया जाए। परंतु पिता जी को न जाने क्या सूझती कि वो उसका काम बढ़ाते ही नहीं थे। बस रात का खाना और कुछ पैसे देकर उसको कल आने को कह देते। वो निराश और तृप्त मन से वापस चला जाता। एक दिन मुझे रहा नहीं गया और मैंने पूछ ही लिया, 'आप उसका वेतन क्यों नहीं बढ़ा रहे हैं?'
उन्होने बड़ी पेचीदा बात बोली। कहने लगे कि बच्चे से काम लेना अपराध है, पंद्रह वर्ष की आयु से पहले वो उससे काम नहीं करा सकते, वो तो उसका पेट पालने को थोड़ा सा काम कराना ज़रूरी है नहीं तो उसका स्वाभिमान कम होगा।
मैंने कहा, ' ऐसा क्या होता है पंद्रहवें वर्ष के पहले दिन में जो चौदहवें के आखिरी दिन नहीं होता कि उसको काम करने का दर्जा मिल जाए? '
उन्होंने कहा, ' ये सरकार का नियम है बाल कल्याण के लिए। '
मैंने कहा, ' ये कैसा कल्याण है कि कोई बच्चा भूख से मर रहा हो तो भी वो कमा नहीं सकता? '
उन्होंने कहा, ' एक निर्धारित तिथि तो होनी ही चाहिए नहीं तो शोषण होने लगेगा।'
'फिर आप लोग मुझसे ये बसते का बोझ क्यों उठवाते हैं'
गुस्से में उन्होंने कहा, 'तुम नहीं समझोगे, जाओ यहाँ से।'
अगले दिन मैंने उसे बात की, जानकर बहुत हैरानी हुई कि वो बसते ढोना चाहता है। जिस चीज़ से मैं परेशान हो चुका था वो वही करना चाहता था। शायद कभी स्कूल नहीं गया तभी वहाँ का संघर्ष जानता नहीं।
एक समय आया जब वो पंद्रह का हुआ और उस दिन से उसने सामानों का यातायात शुरू कर दिया। उसका वेतन बढ़ा और चाहत भी। उसकी चाहत उसकी उम्र की तरह बढ़ती ही गयी और इसी में उसने ना जाने कैसे कैसे काम किये। उसके कपड़े तो नए हो गए, समाज में उठना बैठना होने लगा, मेहनत दोगुनी हो गयी और लालच भी। शायद सालों की उसकी पेट की भूख अब मन की भूख में बदल गयी थी। उसका स्कूल जाने का भाव भी मर गया और देखते ही देखते कुछ सालों में उसने अपनी गाड़ी ले ली, मगर रहता उसी मेट्रो के ब्रिज के नीचे ही। कभी कभी मैं सोचता कि उसकी मानसिकता का विकास इतनी तेजी से कैसे हुआ, जबकि मैं अभी भी अपनी परीक्षाओं से डरता हूँ।
मासूमियत और अज्ञानता दोनो मर गयी हम दोनो के लिए मगर संघर्ष और गरीबी सिर्फ उसकी मरी, मेरी नहीं । वो अपनी हर स्थिति में मस्त रहने लगा।
आज उसका एक घर है एक बेटा भी और वो तो स्कूल भी जाता है। विराट और मैं दोनो उसके बेटे के पीछे-पीछे स्कूल जाना चाहते हैं। वो इसलिए क्योंकि वो कभी स्कूल नहीं गया और मैं इसलिए क्योंकि मैंने कभी स्कूल का महत्व कभी समझा ही नहीं।
