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धोखा

धोखा

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यह कहानी मेरी दूसरी पुस्तक "कयामत की रात" से है जो कि एमाज़ॉन किंडल पर उपलब्ध है। यह एक सत्य घटना पर आधारित है। 


हास्पिटल के रिसेप्शन के सामने रखी कुर्सियों पर राकेश और नंदन बैठे हुए क्लर्क के आने का इंतजार कर रहे थे। सुबह के पॉंच बजे थे, पर तब भी रिसेप्शन के सामने की सारी कुर्सियॉं पूरी भर गयीं थीं। लोगों की भीड़ लगी हुई थी। वो नागपुर का एक प्रतिष्ठित हॉस्पिटल था और वहॉं दूर-दूर से लोग इलाज करवाने आते थे। वहॉं सुबह जल्दी आकर नंबर लगाना पड़ता था। डॉक्टर सुबह नौ बजे से मरीजों को देखना चालू करते थे। राकेश और नंदन जब वहॉं सुबह साढ़े चार बजे आये थे तब वहॉं केवल एक किशोरवय का लड़का बैठा था। उसके बाजू में नंदन और राकेश बैठ गये। फिर धीरे-धीरे लोग आते गये और भीड़ बढ़ती गयी। बुकिंग क्लर्क प्रायः सुबह सात बजे से नंबर लगाना चालू करता था। वो अक्तूबर का महीना था और उस समय तेज ठंड थी।

सब लोग बार-बार घड़ी देख रहे थे। वक्त कट नहीं रहा था। कुछ पलों तक नंदन और राकेश को गौर से देखने के बाद उनके बाजू में बैठे उस किशोरवय के लड़के ने उनसे कहा-”आप लोग कहॉं से आये हो भैया?” तब उस लड़के को मुस्कुराकर देखते हुए नंदन ने कहा-”हम लोग जबलपुर से आये हैं। तुम बताओ, तुम कहॉं से आये हो और किसके साथ हो? हमारे आने के पहले से ही तुम यहॉं अकेले बैठे हो।” बड़ी मासूमियत से उस लड़के ने जवाब दिया-”भैया, मैं मंडला से आया हूँ और अपने पिता जी के साथ हूँ। वो मुझे यहॉं बैठा कर कहीं चले गये। यहीं आस-पास ही होंगे। आप बताईये, आपको क्या तकलीफ है? आप किस डॉक्टर से मिलने आये हो?” तब नंदन ने कहा-”मैं यहॉं डाक्टर टावरी को दिखाने आया हूँ।

कुछ महीनों से मेरा दांया हाथ लिखने में कंपकंपाने लगा है। उसी के इलाज के लिये आया हूँ। तुम बताओ, तुम्हें क्या तकलीफ है?” नंदन का ये प्रश्न सुनकर वो लड़का कुछ उदास हो गया। फिर उदास स्वर में ही उसने उत्तर दिया-”भैया, मुझे बचपन से ही मिर्गी के दौरे आते हैं। मैं भी डॉक्टर टावरी को ही दिखाने आया हूँ।” उसे इस तरह उदास देखकर नंदन ने सहानुभूतिपूर्वक उससे कहा-”कोई बात नहीं बेटा। ये भी एक बीमारी ही है। और बीमारी का इलाज होता है। तुम ठीक हो जाओगे। भगवान पर भरोसा रखो।” नंदन की बात सुनकर उस लड़के के चेहरे पर रुखी सी मुस्कान आ गयी।

इतने में ही बुकिंग क्लर्क आ गया। उसने सीटों पर बैठनेे के क्रम के हिसाब से ही सबकी पर्ची काट कर नंबर लगाये। उस लड़के को पहला नंबर मिला और नंदन को दूसरा। सबके नंबर लगाने के बाद क्लर्क ने कहा-”अब आप लोग यहॉं से जा कर वेटिंग रूम में बैठ सकते हैं या वहॉं हॉल में बने काउंटर पर डॉक्टर साहब का रूम नंबर पूछकर वहॉं जाकर बैठें। यहॉं सिर्फ वही लोग बैठेंगे जिनको नंबर लगाना है। जिनका नंबर लग चुका है, वो लोग यहॉं से चले जायें।” तब सब उठकर वहॉं से बाहर चले गये। हॉल में आने के बाद राकेश ने नंदन से कहा-”यार, अभी तो केवल छह बजा है। डॉक्टर नौ बजे से देखेगा। चलो चाय पीकर आते हैं। क्या करेंगे यहॉं बैठकर?” नंदन ने उससे सहमति जताते हुए कहा-”ठीक है।” वो लड़का उनके साथ ही खड़ा था। नंदन ने उससे पूछा-”चाय पीने चलोगे हमारे साथ?” उस लड़के ने हॉं में सिर हिलाया। तीनों हॉस्पिटल से बाहर निकल गये।

बाहर एक गुमठी से चाय लेकर तीनों वहॉं से थोड़ी दूर खड़े होकर चाय पीने लगे। तब उस लड़के ने नंदन से कहा-”भैया, आपसे एक बात कहॅूं। आप बुरा तो नहीं मानोगे।” नंदन ने मुस्कुराकर कहा-”नहीं भाई, बिल्कुल बुरा नहीं मानूंगा। कहो क्या कहना है।” तब उस लड़के ने कहा-”भैया, मेरे पिता जी को ड्रिंक करने की आदत है। खूब शराब पीते हैं। मुझे मारते हैं। कहते हैं कि तूने मेरे साथ धोखा किया है। आप बताओ भैया, यदि मुझे बीमारी है तो मैंने उन्हें कौन सा धोखा दिया है? इसमें मेरी क्या गलती है?” ये बात सुनते ही नंदन के रोम-रोम में जैसे ज्वालामुखी धधक उठा। उसका चेहरा गुस्से से लाल हो गया। ये देखकर वो लड़का थोड़ा घबरा गया। तब स्वयं को संयत करके नंदन ने मृदुल स्वर में उस लड़के से पूछा-”बेटा, तुम्हारे पिता जी करते क्या हैं ?

मतलब नौकरी करते हैं या उनका खुद का कोई काम-धंधा है?” नंदन को ऐसे विनम्रता से बात करते देखकर उस लड़के का भय दूर हुआ। धीमी आवाज में उस लड़के ने कहा-”वो लोक निर्माण विभाग में क्लर्क हैं। वो चाहते थे कि पढ़-लिख कर मैं सेना में जॉंऊ। पर मेरी बीमारी के कारण ये नहीं हो सकता। जबसे उन्हें मेरी बीमारी का पता चला वो ज्यादा शराब पीने लगे। पहले इतना नहीं पीते थे। अब तो दिन-रात पीते हैं। बात-बात पर मुझसे नाराज हो जाते हैं और मुझे मारते हैं। कहते हैं कि तूने मुझे धोखा दिया।” इतना कहते-कहते उस लड़के की ऑंखों में ऑंसू आ गये। तब राकेश ने अपनापन दर्शाते हुए उससे कहा-”अरे बेटा, रोते नहीं हैं। शांत हो जाओ।” नंदन ने अपनी जेब से रुमाल निकाल कर उसके ऑंसू पोंछ दिये।

जब वो लड़का पुनः सामान्य हो गया तब नंदन ने उससे कहा-”देखो बेटा, हर मॉं-बाप की अपनी संतान से कुछ अपेक्षाएं होतीं हैं। इसमें गलत कुछ भी नहीं है। और जब उनके बच्चे उनकी अपेक्षाओं को पूरा ना कर पाएं तो उन्हें दुःख होता है। ये भी एक सामान्य सी बात है। पर कुछ लोग अपने दुःख में इतना दुःखी हो जाते हैं कि उनकी अकल काम करना बंद कर देती है और साधारण सी बात भी उनकी समझ में नहीं आती। तुम्हारे पिताजी के साथ भी ऐसी ही है। तुमने उन्हें कोई धोखा नहीं दिया है। यदि तुम्हें ये बीमारी है तो इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है।

पर उन्हें अपने दुःख में ये बात समझ में नहीं आ रही। और जब तक वो शराब के नशे में रहेंगे, तब तक समझ में आएगी भी नहीं। जब वो नशे में ना हों, तब तुम्हारी मॉं या और कोई उन्हें समझाये तब शायद वो समझ जायें।” तब उस लड़के ने कहा-”मॉं का पॉंच साल पहले बीमारी से देहांत हो गया था। उसके बाद से ही पापा ने शराब पीना चालू किया। मेरा कोई और भाई-बहन भी नहीं है। घर में बस मैं, पापा और दादा-दादी हैं। पास ही में चाचा-चाची भी रहते हैं। सब उनको समझाने की बहुत कोशिश करते हैं पर वो किसी की मानते नहीं। उल्टा सबसे झगड़ने लगते हैं।” उसकी मॉं के बारे में सुनकर नंदन और राकेश को बहुत दुःख हुआ।

अब नंदन की समझ में नहीं आ रहा था कि वो उससे क्या कहे। इस बार राकेश ने उसे समझाते हुए कहा-”देखो बेटा, बुरा समय हर किसी की जिंदगी में आता है। पर हमें हिम्मत नहीं हारनी चाहिये। तुम्हारे पिताजी की ये हालत तुम्हारी मॉं की असमय मौत के कारण हुई है। वो खुद को अकेला महसूस करते हैं। अपने पिताजी को समझाने की कोशिश करते रहो। और मन लगाकर पढ़ो। जब तुम पढ़-लिख कर कुछ बन जाओगे, तब हो सकता है कि तुम्हारे पिताजी को उनकी गलती का अहसास हो जाये। अभी यही मान कर अपना संघर्ष जारी रखो।” उस लड़के ने स्वीकृति में सिर हिलाया। तब नंदन ने भी राकेश की बात से सहमति जताते हुए उस लड़के से कहा-”ये समझ लो कि अभी भगवान तुम्हारी परीक्षा ले रहा है।

अपने आप पर विश्वास रखो। ये याद रखो कि तुमने किसी को कोई धोखा नहीं दिया है। अपना काम करते रहो पूरी लगन से बस।” नंदन और राकेश की बातें सुनकर उस लड़के को कुछ अच्छा महसूस हुआ। उसके चेहरे पर मुस्कुराहट आ गयी।

उसके बाद वो हॉस्पिटल के अंदर आकर डॉक्टर टावरी के कमरे के सामने रखी कुर्सियों पर बैठ गये। थोड़ी देर बाद उस लड़के के पिता भी वहॉं आकर बैठ गये। वो चालीस वर्ष से कम उम्र के व्यक्ति लग रहे थे। उनके मुँह से शराब की बदबू आ रही थी। चेहरे से अलग ही समझ में आ रहा था कि वो नशे में हैं। उस लड़के ने इशारे से नंदन और राकेश को बताया था कि वे उसके पिता हैं। कुर्सी पर बैठे-बैठे ही वो सो गये। कुछ समय बाद डॉक्टर टावरी आये और बाहर खड़े उनके असिस्टेंट ने नाम लेकर उस लड़के को अंदर जाने को कहा। तब बड़ी मुश्किल से अपने पिता को जगाकर वो लड़का उनके साथ अंदर चला गया। करीब बीस मिनिट बाद वो लड़का बाहर निकला। उसके बाहर आने के पहले ही डॉक्टर के असिस्टेंट ने नंदन को तैयार रहने को कहा था। उस लड़के और उसके पिता के बाहर आते ही नंदन और राकेश अंदर चले गये। अपने पिता के साथ होने के कारण वो लड़का उनकी तरफ देख भी नहीं पाया था। 

कुछ देर बाद नंदन और राकेश जब बाहर आये तो वहॉं वो लड़का और उसके पिता नहीं थे। नंदन ने सोचा कि शायद डॉक्टर ने उन्हें कोई जॉंच कराने के लिये कहा हो और वे वहीं हों। उसने राकेश से कहा-”चल यार, मुझे तो डॉक्टर ने केवल दवाईयॉं ही लिखी हैं। उस लड़के को ढूँढ़ते हैं। मेरा मन कर रहा है उसके पिता से एक बार बात करने का।” तब राकेश ने उसे हास्पिटल से बाहर एकांत में चलने को कहा। वो दोनों जब एक सुनसान जगह पर आकर खड़े हो गये तब राकेश ने कहा-”देख भाई, उसके पिता से बात करने का कोई मतलब नहीं। तूने खुद भी देखा था कि वो नशें में है। वो लड़का अपने पिता के सामने हमसे बात तक करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। यदि हमने उसे कुछ समझाने की कोशिश की तो हो सकता है कि वो आदमी हमसे ही लड़ने लगे। या ये भी हो सकते कि वो उस लड़के को ही मारने पीटने लगे कि उसने खुद सोच, रहना तो उसे अपने पिता के साथ ही है।” लाचार मन से सहमति में सिर हिलाते हुए नंदन ने कहा-”हॉं यार, बात तो तेरी सही है। ये शराबियों का कोई भरोसा नहीं होता कि नशें में कब क्या कर बैठें। पर तुझे तो पता है ना कि मुझे ऐसे लोगों से कितनी नफरत है। होना तो ये था कि वो आदमी अपनी पत्नी की मौत के बाद अपने बच्चे का और भी ज्यादा ध्यान रखता। पर उल्टा शराब पीकर अपने बीमार बच्चे को मारता-पीटता है। उसे धोखेबाज कहता है। कैसा बाप है? इसकी बुद्धि भी मेरे बाप की तरह ही भृष्ट है। जी तो करता है इसे यहीं पकड़ कर दो-चार जमा दूँ ।” तब राकेश ने उसे समझाते हुए कहा-”यार देख, तेरे साथ जो तेरे पिता जी ने किया, वो भी गलत है। पर वो आदमी तेरे पिता से तो अच्छा ही है।

अंकल कुछ नहीं कमाते और आंटी की कमाई के पैसों से बस जुआ खेलते थे और शराब पीते थे, ये हम सबको पता है। पर वो इंसान कम से कम जुआ तो नहीं खेलता। वो खुद कमा रहा है और अपने बच्चे का इलाज भी करा रहा है। वो बच्चा उसी के भरोसे है। हमें कोई अधिकार नहीं है उससे मारपीट करने का। वो अपनी पत्नी की मौत के दुःख में टूट गया है बस। और अपने बच्चे की बीमारी ने उसे और भी ज्यादा दुःखी कर दिया है। वो अंकल जी से तो कहीं बेहतर इंसान है जिन्होंने आंटी जी जैसी सीधी-सादी, सभ्य महिला और तेरे जैसे अच्छे और लायक इंसान को इतना दुःख दिये।” राकेश की बात सुनकर नंदन की ऑंखों में ऑंसू आ गये। राकेश ने उसके कंधे पर हाथ रखकर उसे सांत्वना दी।

फिर नंदन ने अपने आँसू पोंछते हुए कहा-”यदि मॉं की सरकारी सर्विस ना होती तो पता नहीं मेरा और मेरे भाई का क्या होता। कर्जे में गड़ा दिया था हमें इस आदमी ने। बड़ी मुश्किल से सबकुछ ठीक हो पाया है। नर्क जैसी तकलीफ झेली है हम लोगों ने मेरे पिता के कारण। इसलिये मुझे जुआरियों और शराबियों से इतनी नफरत है।” तब राकेश ने उसे समझाते हुए कहा-”चल अब भूल भी जा पुरानी बातें और भगवान पर भरोसा रख। जैसे उसने तेरे साथ सब ठीक कर दिया वैसे ही वो एक दिन इस बच्चे के साथ भी सब ठीक कर देगा।” नंदन ने धीरे से सहमति में सिर हिलाया और वो दोनों हॉस्पिटल से अपनी दवाइयॉं लेकर वहॉं से चले गये।



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