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Madhu Vashishta

Action Inspirational

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Madhu Vashishta

Action Inspirational

धन्यवाद गुरु जी।

धन्यवाद गुरु जी।

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     आज के समय में जबकि बच्चे कॉन्वेंट या प्राइवेट स्कूल में पढ़ने में गर्व महसूस करते हैं और अभिभावक जन भी भले ही स्कूलों की महंगी फीस तले पिस रहे हो लेकिन फिर भी उन्हें अपने बच्चों की सफलता इन प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाने के बाद ही दिखती है है। हालांकि हमारी वय के लोग समझ सकते हैं आज की शिक्षा में भले ही बच्चों की प्रत्येक क्षेत्र में जानकारी अधिकतम हो लेकिन संस्कार और मूल्यों में वह बहुत पिछड़े हुए हैं। अध्यापकजन भी गुरु बनने की बजाए पैसों की अंधी दौड़ में शामिल है बच्चों को सिर्फ किताबी जानकारी देना है उनका एकमात्र लक्ष्य रह गया है नैतिक मूल्य तो दोनों के ही पास बहुत कम है।


       इस मामले में मैं खुद को भाग्यवान समझूंगी कि 70 के दशक में जब मैं पढ़ती थी तो वास्तव में मैंने एक गुरु से ही शिक्षा ग्रहण करी है। जी हां हम सरकारी कॉलोनियों में ही रहते थे। यह वह समय था जब की ट्यूशन पढ़ना जरूरी नहीं होता था हमारे सरकारी स्कूल में ही अध्यापक एक्स्ट्रा क्लास लगा लेते थे और नंबरों की इतनी परवाह नहीं थी पास होना ही काफी था। फेल होने पर भी कोई आत्महत्या जैसा विचार नहीं आता था अपितु अगले साल और मेहनत कर लेंगे इस विचार के साथ स्कूल में ही दोबारा से जाया जाता था। ना तो तब घर-घर में टीवी थे ना ही कोई सोशल मीडिया। तब सब लोग जीवन खुलकर जीते थे। देर रात तक दोस्तों के साथ खेलना और फिर पढ़ाई करना। लड़कियों पर तो यूं भी कोई पढ़ाई का खास बंधन नहीं होता था। घर का काम आना ही उनकी प्राथमिकता थी। जी नहीं ,फिर भी किसी को नारी मुक्ति आंदोलन की जरूरत नहीं थी। यह सिर्फ हमारी उम्र के लोग ही समझ सकते हैं कि कितना सुख है बंधन में, यह हमारे गीतों में भी झलकता था। आजकल की आजाद ख्याल नारियां शायद ही कभी वह सुख महसूस कर पाएं।


   लगातार पास होते होते हम नवीं क्लास में चले गए थे और अब हमारे सब्जेक्ट भी बहुत ज्यादा बढ़ गए थे । मेरी माता जी को किताबी ज्ञान अधिक ना होने से वह हमको नहीं पढ़ा सकती थी और आगे भी मैं आराम से पास होती रहूं इसलिए पिताजी ने मुझे ट्यूशन पढ़ाने की सोची। बस तभी हमारा अपने गुरु से मिलना हुआ।


   हमारे कॉलोनी से थोड़ी ही दूर पर सरस्वती माता के प्यारे राजदुलारे लेकिन उनके दोनों पैर और एक हाथ नहीं था। केवल एक हाथ और आंखों में एक मोटा सा चश्मा, जी नहीं उनके लिए सिवाय श्रद्धा और सम्मान के कोई भी और शब्द का हम प्रयोग नहीं कर सकते। हम सब उनको भाई साहब कहते थे। उन्होंने लगभग 6 सब्जेक्ट में m.a. कर रखा था और वह तब भी पढ़ते ही जा रहे थे। हमारी कॉलोनी की लगभग सभी लड़कियां आर्ट्स साइड के हर सब्जेक्ट उनसे पढ़ने के लिए जाती थी। सुबह 5:00 बजे ही सरस्वती वंदन करके वह ट्यूशन पढ़ाने बैठ जाते थे और रात तक वह ट्यूशन ही पढ़ाते रहते थे। भाई साहब का उस सरकारी मकान की बालकनी में एक छोटा सा पलंग और बड़ी सी सरस्वती मां की मूर्ति , बहुत सी रखी हुई पुस्तकें और वह स्वयं में ही ज्ञान का भंडार थे। हम सब वहां इम्तिहानो के दिनों में बहुत देर तक पढ़ते रहते, जो भी पढ़ा होता था उसे याद करते रहते थे। अपने स्कूल में मिला हुआ होमवर्क भी वहां ही बैठकर करते रहते थे। घर जाकर हम केवल खेलते और अपने घर के ही काम करते थे।तब कोई ट्यूशन पढ़ने के लिए 1 घंटा या 2 घंटे का नियम नहीं था जब तक तुम को समझ ना आए तब तक तुम पढ़ो। उनकी बालकनी के बाहर ही पार्क खुलता था। उसमें आराम से बैठकर पढ़ते रहो। भाई साहब से मैंने नौवीं क्लास से लेकर कॉलेज तक की ट्यूशन पड़ी है।               


      उनके द्वारा पढ़ाने को ट्यूशन पढ़ना कहना एकदम अनुचित होगा क्योंकि कई बार तो ऐसा भी देखा गया कि मानो किसी के माता-पिता की ट्रांसफर हो गई और वह अपना फ्लैट छोड़कर दूसरे फ्लैट में चले गए तो लड़कियां भाई साहब के घर में ही उनकी बहनों और माता पिता के साथ में उनके घर में ही रह जाती थी और रात तक पढ़ती रहती थी।                


        हम जब भाई साहब को अपना रिजल्ट सुनाते थे तो वह बहुत खुश होते थे। वह अक्सर यही कहते थे कि मुझे तुमसे कुछ नहीं चाहिए सिर्फ तुम अच्छा रिजल्ट लेकर आओ तो मुझे लगता है मेरा पढ़ाना सफल हो गया। मुझे आज भी महसूस होता है कि अगर कहीं गुरु शिष्य की परंपरा होती भी होगी तो गुरु जरूर मेरे उन भाई साहब के जैसा ही होता होंगे। मेरी माता जी को स्कूल की पढ़ाई तो नहीं आती थी इसलिए वह मुझे स्कूली पढ़ाई पढ़ाने में असमर्थ थी लेकिन सांसारिक और दुनियादारी की पढ़ाई मैं उनसे होशियार शायद ही कोई रहा होगा। ऐसे ही पिताजी भी अपनी व्यस्त जिंदगी के कारण मुझे नहीं पड़ा पाते थे। भाई साहब हमेशा कहते थे कि तुम लोग अच्छे से पढ़ोगे तो मुझे बहुत खुशी होगी। तुम्हारी सफलता ही यह बताएगी कि मैं कितना अच्छा टीचर हूं। जी हां, मैंने स्कूल कॉलेज पढ़ने के बाद में अपनी सरकारी नौकरी भी बहुत अच्छे से निभाई है। काफी समय पहले गुरु जी के ही किसी शिष्य के द्वारा मुझे पता चला कि अब भाई साहब इस दुनिया में नहीं है और उनका परिवार कहां है, मैं नहीं जानती। मेरा भी विवाह हो गया था और उनके पापा की भी सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें भी वह सरकारी मकान छोड़ना पड़ा होगा।


    उनके पढ़ाने के कारण ही मेरी और मेरे साथ पढ़ने वाली सहपाठियों की सफलता ही यह दर्शाती है कि हमारे गुरु जी कितने अच्छे रहे होंगे। मैं उन्हें याद कर रही हूं हो सकता है स्टोरी मिरर में कोई और भी उन गुरु का शिष्य रहा हो तो उम्मीद करती हूं कि मुझे कोई गुरु बहन की भी प्राप्ति हो सकती है।



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