Win cash rewards worth Rs.45,000. Participate in "A Writing Contest with a TWIST".
Win cash rewards worth Rs.45,000. Participate in "A Writing Contest with a TWIST".

Richa Baijal

Tragedy


4.0  

Richa Baijal

Tragedy


डिअर डायरी : डे 17 खुश होना क्या है

डिअर डायरी : डे 17 खुश होना क्या है

2 mins 214 2 mins 214

10.04.2020


"आज बहुत दिनों के बाद "डेटोल " तो नहीं, लेकिन सेवलॉन की एक शीशी मिल गयी मार्केट में ",मैं बहुत खुश थी आज। और मेरा 'अचीवमेंट ' क्या है ? एक ज़रूरत की चीज़ का बहुत दिनों के बाद मिल जाना। हम जिस तरह से रहते हैं, उस हिसाब से हमारी ज़रूरतें बदलती जाती हैं। लेकिन आज कोरोना के इस महाकाल में सबकी ज़रूरत समान्तर -सी हो गयी है। फर्क इतना है कि कोई 250 ग्राम आटे के लिए लाइन में खड़ा है तो किसी को 10 किलो आटा चाहिए। ज़रूरत की अगर सब्जी भी आपको मिल गयी है तो कितनी ख़ुशी होती है।

आज से पहले इतनी ख़ुशी महसूस नहीं की होगी आपने। 

हम तो अपनी ज़रूरत का सामान लेकर घरों में बंद हो जाते हैं, लेकिन देश के कुछ सेवक ऐसे भी हैं जो दूसरों की सेवा कर रहे हैं।

देश के कई राज्यों में किराना वाले घर घर जाकर सामान दे रहे हैं। पशुओं की सेवा कर रहे हैं। तपती गर्मी में उनकी ये सेवा हम  नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते। मेरी बात का मर्म वही लोग समझ सकते हैं जो 3 - 4 दिन पहले अपने ज़रूरत के सामान की पर्ची बनाते हैं और बेसब्री ऐसे फिर उस सामान का इंतज़ार करते हैं। वो शख्स 'मसीहा ' से काम नहीं होता जो उस सामान को लेकर उनके घर आता है। सच कहूं तो पिज़्ज़ा, बर्गर का स्वाद भी फीका है ; मेहनत से लाकर इकठ्ठा किये गए इस सामान से बने दाल - चावल के सामने। पैसा पहले भी सब कुछ खरीद कर ला देता था हमारे सामने, लेकिन वो दर्द नहीं था, वो तकलीफ नहीं थी और इस एहसास के बाद ख़ुशी का वो एहसास नहीं था।

एक फर्क महसूस करना आप सभी : 'आप वाशिंग मशीन भी घर लाये होंगे।अपने पैसा दिया,और मशीन घर आ गयी। ख़ुशी तो होगी लेकिन नमी कभी न देखी होगी आपने अपने अपनों की आँखों में। आज अगर आप बस राशन ले आते हो घर में तब आपकी भी ऑंखें नम होती हैं और आपकी अर्धांगिनी की भी। ख़ुशी भी होती है और नमी भी....साथ ही साथ सुकून भी। '

आज हमारी ख़ुशी कम पैसों में मिल रही है।

किसी को और कुछ खाना ही नहीं है, सिवाय सुकून की दाल रोटी के ; वो भी बिना धक्के के मिल जाये तो। फिर आप सोचिये, जिनका सुकून ही दाल रोटी था, वो इस वक्त किस हाल में होंगे ? 

यही दुआ है कि कोरोना ख़त्म हो जाये। हमसे पहले की एक पीढ़ी भी इसी तरह तड़पी होगी जब प्लेग और हैजा जैसी महामारी ने हमारे देश को झकझोरा था। उन लोगों को दिल से " थैंक यू " है जिन्होंने इस वक्त में हाथ बढ़ा कर किसी की एक रुपये की भी मदद की है।

शुक्रिया !

फिर बात करते हैं।

डियर डायरी, मुमकिन है कल।


Rate this content
Log in

More hindi story from Richa Baijal

Similar hindi story from Tragedy