Medha Antani

Inspirational


5.0  

Medha Antani

Inspirational


चुनौती-मैं विरुद्ध मैं

चुनौती-मैं विरुद्ध मैं

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“अंहं, नहीं। तुमसे ना हो पाएगा। ” यह बात मुझे किसी और ने कही होती तो शायद मैं कानों पर धरती ही ना, क्योंकि मैं पैदाइशी सिंह राशि हूं, जो एकबार कुछ कर लेने की ठान ले, तो उसकी दहाड़ से वो खुद भी न बच पाये। पर इसका इलाज कहां से लाऊं कि, यह बात मैंने खुद को, अपनेआप ही समझा रखी थी कि :”मेधा, तुमसे ना हो पाएगा !” वह भी छोटी सी उम्र में !


बात भी वैसे देखा जाय, तो छोटी सी ही थी, पर मेरे लिए हर छोटी चुनौती, बड़े आह्वान समान ही रही है, जब कि, यहां तो मेरे खुदके सामने खुद, मैं ही चुनौती रखकर खड़ी थी।


शुरू से शुरू करने से पहले, मैं अपने बारे में परिचय दे दूं, ता कि, मेरी बात समझने समझानेमें सरलता रहे। वर्तमान समय में मैं मंच कार्यक्रमों की सूत्रधार, टीवी वार्तालाप संचालिका, रेडियो जोकी, कहानीकार, कवयित्री एवं गीतकार के रूप में कार्यरत हूं, और मेरे कार्यों द्वारा संतुष्ट असंख्य जाने-अनजाने लोग मुझे प्रत्यक्ष और परोक्ष रूपमें असीम स्नेह देते रहते हैं, जो ईश्वर की परम कृपा केवलमात्र, और कुछ नहीं। पर अगर सब मांगे बगैर या मांगनेसे मिल जाय, तो पाने की प्यास और ईश्वर से आस कैसे जगी रहेगी?और आपके पास जो न हो, उसीको सर करनेकी लालसा किसमें नहीं होती? मैं भी उन्हीं में से एक हूं।और इसीके चलते, मैं खुद के विरुद्ध खुदको चुनौती दे बैठी थी, फिर खुद से थक कर हार बैठी थी।


तो बात यूं है, कि बचपन से मेरी आदत और लत बन चुका था, कड़ी महनत से पीछे न हटना और, हर क्षेत्र में अव्वल रहना, एक संगीतके क्षेत्र को छोड़कर। मेरा ऐसा कोई सपना नहीं था, कि उस क्षेत्र में नाम या पैसा कमाऊं, पर जब नाकामी मिली, तब वह बिलकुल रास न आई।


मुझे याद है, मैं छह सात साल की थी जब मैंने, सरकारी प्रसारण माध्यममें चाइल्ड आर्टिस्ट के तौर पे दो स्वरपरीक्षाएं दीं थीं, बालउदघोषिकाऔर गायिकाके लिए। अतिआत्मविश्वासु तो इतनी थी कि, दोनों सर कर लूंगी, पर जब परिणाम आया तो , उद्घोषणा में उत्तीर्ण, जब कि संगीतमें मुझे अनुत्तीर्ण घोषित कर दिया, जैसे मुझसे बताया जा रहा हो कि:” तुम से ये गाना वाना न हो पायेगा।“


और ज़ोर का झटका हाये….ज़ोरोंसे लगा !!इतने ज़ोरों से कि, छह सात सालकी मैं, अंदर से टूट गई। मेरे लिए तो यह प्रेस्टीज इश्यु बन गया, और हारना, वैसे भी सिंह राशिकी शान के खिलाफ है, ऐसे तेवर और फितरत तो जन्मजात ही थे। जो चीज़ हाथ में ली, उसमें जान डालकर भी उस चीज़ में अग्रीम होने से रत्तीभर कम चलता ही न था। 



पर इस हारी हुई जुआरी को फिर से खेलने का एक मौका मिला, जो मैंने दुगुने जोश से हथियाकर ले लिया। अब मैं चौदह साल की हो गई थी, जो अब भी हर क्षेत्र में राज्यकक्षा तक अपने झंडे गाड़ रही थी, एक संगीत को छोड़कर।



एक बहुत बड़ा लाइव सिंगिंग कोम्पीटीशन हो रहा था। पीछले ऑडिशनका बदला खुद से लेना ही था, उसी ज़िद में ‘ख़तरों के खिलाड़ी’ बनकर मैंने भी हिस्सा ले लिया। रिहर्सलके दौरान मेरा गाना बढ़िया रहा। वहां तक कि, निर्णायकगण भी बोल उठे: " स्टेजपे ऐसे ही गाना, तुम्हारे जीतने के आसार प्रबल हैं।" आहा !! उस समय मुझे वाकई ये लगा कि, लताजी के बाद उनका स्थान कोई ले सकता है तो वह सिर्फ़ मैं ही हूं !!!!



पर शायद आसमांवाले वो निर्णायकके कानोंको मेरा गाना पसंद नहीं आया। यकायक मेरी नाक बंद हो गई और गला बैठ गया। न वो ज़ुकाम था, न कुछ और।अरे, गाना तो छोड़िए साहब, ! मेरा बोलना भी बंद!! प्रोग्राम शुरु होने के पंद्रह मिनिट पहले ही !!अब आखरी पलों में जो किया जा सकता था, वह उपाय किया, पर स्थितिमें सुधार ही न दीखे।मेरे पास एक ही रास्ता बचा।


नियतिके सामने मैं हार गई और स्टेज पर गाते हुए प्रतियोगियों को देख, ऑडिटोरियम से बाहर वोकआउट कर गई, अपने आंसुओं को दबाकर, क्योंकि, सिंह कभी रोया नहीं करते। उपरवालेने भी क्या भैरवी राग छेड दिया, जैसे ही मैं कम्पीटीशनको छोडकर घर पहुंची, गला एकदम साफ!नाक खुल गई, कहीं कोई ख़राबीका नामोनिशान नहीं!!। पर उस दिन से, हमेशां के लिए संगीत के प्रति मैने अंदर एक पिंजर बना लिया कि, शायद मैं गाने के लिए नहीं बनी हूँ। संगीत मेरे लिये नहीं है। मैंने आखरी बार खुदको समजा दिया, यह कहकर कि, :”मेधा, तुमसे कभी भी न हो पायेगा।कुदरत भी यही चाहती है, वर्ना आज ऐन वक्त पर दगा न देती।“


ख़ैर, तबतक मैं वक्ता, उदघोषिका, वोईस ओवरके कार्यौमें सहजरुपसे चलती रही, बढ़ती रही।तब से लेकर आज तक, एंकरिंगके क्षेत्र में मुझे हुतत काम-दाम और नाम मिले। किसी भी कार्य क्रममें सूत्रधार का, उसके शब्द, उसकी आवाज़का एक अलायदा और आला दायित्व होता है।ज़रा सा तालमेल ऊपर-नीचे हो जाय, तो बना-बनाया शो बिगड़ जाता है, और यदि संचालक, सूत्रधार, ऐंकर, का़बिल हो, तो बिगड रहा शो भी उसके शब्दश्रृंगारकी वजह से बनसंवर जाय, यह बात मैंने सीखते सीखते जान ली। समयके साथ साथ सितारवादन सिखा, भरतनाट्यम् भी सीखा, जिससे सूर की पकड़, रागों की समज भी मिली। आवाज़ और अल्फाज़ से मेरा नाता तो रहा पर वह आवाज़ कभी भी निकल ना पाई, जिसे हम सूर या संगीत कहते हैं।



 शादी के बाद भी एंकरिंग, पेशन और प्रोफेशन बनकर चलता रहा। जब मैं कीसी शो में मेरे साथ मंच साझा कर रहे गायकों को देखती, सुनती, तो मन ही मन भगवान को कोसती ज़रुर, मुझे ही क्यों उसने आडे हाथ रखकर रोका?मुझे मधुर आवाज़ तो दी, पर वो संगीतकी तरफ खनकने से पहले ही क्यों खा़मोश कर दी? वह इक्के-दुक्के निष्फल वाकये याद आ जाते और मन भारी हो जाता।और फिर, सोचकी तो कोई सीमा नहीं होती। मन पूर्वग्रहित हो गया, कि मुजसे न हो पाया, तो आगे भी न हो पायेगा।


उसी दरमियान एक बडा कोन्सर्ट होने जा रहा था - शामे ग़ज़ल। मैं उस कोन्सर्टकी निवेदिका थी और मेरे साथ एक सुप्रसिद्ध गायिका थी। मुझे सुनने इस बार पतिदेव भी आए थे। सचमुच, मानना पड़ेगा, धन्य है उस पतिको, जो घर तो घर, बाहर भी पत्नी की सुनना पसंद करते हैं!! शो जबरदस्त सफल रहा। हम दोनों कलाकारों को बराबर की प्रशंसा मिली। जहां ठुमरी, ग़ज़ल, नज़म सब पर छायीं हुईं थीं, वहीं अल्फाज़, रसास्वादन भी सबको भाये हुए थे।गायिका और निवेदिका-दोनोंकी की मेहनत निखरी रही। अख़बारोंने भी हमारी प्रशंसा की।



अपनी पत्नी के सामने किसी और स्त्रीकी तारीफ करोगे, तो आगे जो हुआ, आपके साथ भी हो सकता है - जनहित में जारी !


उस दिनसे मेरे पतिमें मैंने बदलाव देखा।उस गायिका और उसकी एक ग़ज़ल मेरे घर में ज़्यादा तवज्जो और तारीफें पाते रहे।औरंगज़ेब अचानक मेहंदी हसन बन गया। मामूली सी बात थी, उन्हें एक ग़ज़ल पसंद आई और वह उसे लगातार गुनगुनाने लगे। मेरी एंकरिंग तो जैसे कहीं वजूद में ही न हो, एसा माहौल बन गया। उस एक ग़ज़ल के लिए मैंने भी क्या समा बांधा था, शेर शायरी अश्आरोंसे उसकी पेशगी की थी, उसका तो ज़िक्र तक न किया गया।मुझसे कतई बरदाश्त न हुआ।और क्यों करूं ?स्त्री जो ठहरी।जलन होना लाज़मी है।अब तो सिंहकी पत्नी जाग उठी ..ईगो इश्यू आडे आ गया!!अरे भाई, हस्बेंड मेरे, और तारीफ़ किसी और स्त्री के हूनर की ?



अब तो मैंने भी दिखा देना था, ऐसे ही थोड़े ही छोड देना था?। इस बार मेरा ललकार मंत्र था.." मेधा, तुमसे हो पाएगा !" मैंने उस सिंगरकी रेकोर्डेड आवाज़ के साथ अपनी आवाज़़ मिला के गाना सीखना शुरू कर दिया, वह भी छुप छुप के। सूर, राग रागिनीसे तो मैं ज्ञात थी ही, सितारवादन का थोड़ा-बहुत अनुभव भी काम में आ गया।



अब आप ही सोचिए, मंजी हुई क्लासिकल सिंगर के साथ आवाज़ मिला रही है एक फेल्योर...लूज़र, जो सिंगर बिल्कुल न हो, ऐसी एंकर ! कहां तक पहुंच पाती?।पर आख़िर में, मैं हनीसिंघ से बेगम अख्तर बन ही गई। उस गायिका को गुरु द्रोण बनाकर, उसीकी गाई हुई ग़ज़ल पर कथाकथित महारथ हांसिल कर ली, वही अंदाज़, वही आरोह अवरोह, वही तान और मुरकी हरकत के साथ।



तीन महीने बाद एक एम्फीथियेटरमें छोटी सी महफ़िल थी , जिस में सब अपनी अपनी पसंदीदा कृतियां परफॉर्म करने वाले थे। पतिमहाशय भी, बतौर ऑडियंस परफॉर्म कर रहे थे। 

मैं स्टेज पर आई। मंच पर बचपनसे खेलनेवाली मैं, एकदमसे स्टेजफियर महसूस करने लगी। मेरे ज़हन में अतीतकी घटनाएं हावी होने लगी।आज फिर, एक जंग, एक चुनौती की घड़ी आई थी। मैं विरुद्ध मैं थी। ‘मुझसे न हो पाएगा ‘के विरुद्ध ‘मुझसे हो पायेगा' की चुनौती। मैंने स्वस्थ हो, अपनी पेशकश रखी। मैंने वही, ’हस्बेंड की चहिती गायिका की गाई हुई फेवरीट ग़ज़ल' गाना शुरू किया.." सात सुरोंका बहता दरिया तेरे नाम…"


ग़़ज़ल खत्म हुई, तो हवा में सूर, ऑडियंसमें आश्चर्यके बाद तालियों की बौछार और मेरी आंख में आंसू थे, क्योंकि सिर्फ मैं ही जानती थी कि, यहां तक का सफर मैंने किस तरह, भीतर के युद्ध को चुपचाप, खुद ही लड़कर, उससे विजय पाकर तय किया था। मुझे साबित तो वैसे कुछ न करना था, पर वो “ तुम से न हो पायेगा” वाली जकडन जो मैं ने खुद ही, एक दो घटनाओं के आधार पर बना ली थी, उसे खुद ही जूठी साबित करना था, जो शायद मैं कर पाई। श्रोता, प्रेक्षक सबसे बडे निर्णायक होते हैं। उन्हें प्रस्तुति पसंद आई, न आई, तुरंत उनकी तालियां या ख़ामोशी बता देतीं हैं।मुझे ताज्जुब तो तब हुआ, जब श्रोताओं में से किसीने यह कहा, कि आप एंकरिंग के साथ गायिकाके रूपमें भी क्यों प्रस्तुत नहीं होतीं? कानों को यह सुननेको भरोसा न बैठा, तो मनको भरोसा कैसे बैठेगा?



जब मेरे पतिने मेरे इस नये नये से हूनर को सराहा, तब जा के संतुष्ट हुई।मेरे मनकी ग्रंथियों से कुंठीत मैं स्वयं ही उभरी और सालों पुरानी नाकामीको कुछ हद तक कामयाबी दे पाई, उसकी संतुष्टि हुई। मैं नहीं कर सकती, से ले कर, मैं क्यों नहीं कर सकती, का द्रढ निर्धार कर पाई, उसकी संतुष्टि हुई।


अब तो मैं स्टेजपे कभी-कभार जनमनरंजन के लिए, पर महद् अंश पे आत्मरंजनके लिए थोडा बहुत गा भी लेती हूं। मुझे सिंगर तो वैसे भी बनना नहीं है, बिना कड़ी साधना के कोई सींगर बन भी नहीं सकता। वो कहते हैं न, जिसका काम, उसीको साजे, हम गाते न सही, बतियाते या लिखते ही भले, पर एक दो रिजेक्शन से अपने अंदर पाल रखी जूठी बंदिश और बेड़ियों को तोड़ फोड़कर खुद को ही जीतना, मेरे लिए कोई बडे से सिंगर बनने से भी बढ़कर रहा। बस, ठान लेना ज़रूरी है कि, जिद्द है तो जीत है।


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