Medha Antani

Others


5.0  

Medha Antani

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लोअर बर्थ

लोअर बर्थ

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सुबह कोई सवा छह साढ़े छह बजे होंगे। किचन में बच्चों के टिफिन बनाते हुए नीता की एक आँख घड़ी पर टिकी हुई थी। ट्रेन तो समय पर आ चुकी होगी। महेश आते ही होंगे। उसका पसंदीदा नाश्ता गर्म है, तब तक वह आ जाए तो ,अच्छा। दोबारा गर्म किए गए नाश्ते में उतना मज़ा कहां?

और फिर डोरबेल पर डोरबेल बजती रही। नीता दौड़ मचाते हुए दरवाज़ा खोलने गई:"अरे बाबा, आ रही हूं। इतनी बेसब्री ? बहरी थोड़े ही हूं ? मैं तो क्या, सारा बिल्डिंग जग जाएगा इतने शोरगुल में..."

 .." परे रहो ! हटो !जल्दी पानी लाओ !..ठंडा ! अरे छोड़ो.. पानी को छोड़ो! चाय लाओ चाय ! अदरक वाली !जल्दी !!तंग कर दिया सब ने मिलकर। ऐसे थोड़ी चलता है ?औरों को भी समझना चाहिए ना ?आदमी हैं, तो क्या हुआ? इंसान नहीं हैं क्या हम ? यह मेरा आखिरी सफ़र होगा !"

 "हैं..??? यह क्या बड़बड़ कर रहे हो ?" एक तो वैसे ही अचानक आए हुए तूफ़ान से नीता बौखला गई थी, उस पर महेश की बातें सुनकर वह और भी घबरा गई।

 "..तुम भी ना !आधा सुनकर उल्टा समझ लेती हो ! मैं रेलवे के आखिरी सफ़र की बात कर रहा हूं, तुम्हारी मेरी नहीं।" हाथ मुंह धोते हुए महेश ने कहा।

  मौके की नज़ाकत समझकर नीता चुप रह गई और फटाफट चाय नाश्ता लेकर आई। चाय की चुस्की और मनपसंद नाश्ते के जा़यके से महेश का माथा थोड़ा ठंडा होता देख,नीता ने पूछ ही लिया:" क्या हुआ? किस पर बरस पड़े हो ? क्या आप का टूर अच्छा न रहा ? सौदा हुआ या नहीं ? थके थके से भी लग रहे हो !"

  "अरे कुछ पूछो ही मत !" महेश का गुस्सा अब नरम पड़ गया। वैसे भी महेश उन लोगों में से था, जिसे ग़म खाना और गुस्सा पी जाना भली-भांति आता था, पर आज मामला कुछ और था।

  "रेलवे वाले कहते हैं, आपकी यात्रा सुखद हो !अरे काहे की सुखद ?यात्रीगण सुख से रहने दे ,तब ना ?"

  'अच्छा तो बात यह है !'नीता की घबराहट कुछ कम हुई" अब बताओगे भी, या मन ही मन झूंझलाते रहोगे?"

  " परसों रात मैं यहां से निकला। सुबह ठीक-ठाक पहुंच गया। सारा दिन डीलर्स के साथ सौदा करने की भगदौड़ खूब रही, पर फिर भी मैं सुकून से था कि ,सब की सब डील पक्की हो गई है। मेरा टूर पर आना सफल रहा।"

  "तो फिर ? तकलीफ़ कहां हुई ?"

  "तकलीफ़ तो कल रात को शुरू हुई, जब मैं वापस आने के लिए ट्रेन में चढ़ा !"

  "आपकी तो कन्फर्म बुकिंग थी न ?वह भी ए.सी कोच में?"

  " वही तो ! जिंदगी में पहली बार लोअर बर्थ मिली थी। दिन भर का थका हुआ मैं, बहुत खुश था कि चलो, कोई ना! रात अच्छी नींद सोऊंगा। पर जैसे ही मैं सीट पर पहुंचा, मेरे सामने चार चार महिलाएं बैठी थी। मैं समझ गया, मेरा लोअर बर्थ अब गया। वह कुछ ना कुछ फ़िराक़ में ही थी। और वही हुआ।

उनमें से सबसे बड़ी महिला ने मुझे कहा कि 'भाई साहब, ये मेरी तीन बच्चियां है। एक का रिजर्वेशन बी-फॉर में है। यदि आप वहां चले जाएं, बड़ी मेहरबानी होगी। छोटी बच्चियाँ है। मेरे साथ में रहेंगी, तो मुझे आसानी होगी।"

अब तीनों बच्चियाँ होंगी, कोई बाईस पचीस साल की। अब ट्रेन तो चल पड़ी थी, मैं भी क्या कहता ? अपने सामान को लेकर मैं बी-वन से बी -फोर तक कैसे पहुंचा, मेरा मन जानता है। वहां जाकर मैं जैसे ही सेट हो गया और सोने को ही था, वहां टी.सी आकर कहता है,' अरे भाई जी! लेडीज क्वोटा में आप क्या कर रहे हो ? यहां तो लेडीज क्वोटे की सीटें हैं। लेडीज ही लेडीज के साथ एक्सचेंज कर सकती है। मैं फिर अपना सामान लिए वापस बी-वन में गया। तब तक तो ये सब ,पसारा करके सो चुकीं थीं। मेरी तो लोअर बर्थ भी गई।"

"तो आपने जगा कर उन्हें बताना था ना ?" नीता ने कहा।

"हां ,तो बताया न ! उन्हें मालूम था कि लेडीज क्वोटा की सीट है, फिर भी मुझे बलि क्यों चढ़ाया ?तो आंटी जी बोली :'बेटा अब मैं तो वहां जा नहीं सकती। घुटने का दर्द है। वहां से यहां आने को कोई राज़ी ना था। बच्चियाँ तो छोटी है। तुम आदमी ज़ात हो। थोड़ा एडजस्ट नहीं कर सकते ? एक काम करो। यहां ऊपर हमारा बर्थ है, वहीं चले जाओ।'

अब मैं अगर अपनी सीट वापस मांगने की ज़िद करता, तो लोग टूट पड़ते कि इसे स्त्री सम्मान की समझ ही नहीं है।

कसम से नीता ! एक तो दिन भर के काम की थकान, ऊपर से मेरे कमर की जकड़न ,और अपर बर्थ पर चढ़कर सोना !मेरी पूरी रात अकड़ कर गुज़री है !मैं ऊपर करवटें भी ठीक से ना ले पाता था ,और वह आंटी जी लोअर बर्थ के मज़े खर्राटे ले ले कर ले रही थी। मर्द हैं, उसका मतलब यह तो नहीं कि हमें दर्द नहीं होता ? हर बार त्याग, खासकर रेलवे में लोअर बर्थ का त्याग हमें ही करना पड़ता है! क्यों? एक तरफ आप लोग वुमन ईक्वालिटी की बात करती हैं, और दूजी ओर !

और छोटी बच्चियाँ ?अरे, अच्छी ख़ासी जवान लड़कियाँ थी वो! कल लड़का मिल जाए तो आज ही ब्याही जाए इतनी सयानी और बड़ी।"

महेश बड़बडाता रहा। तब तक नीता गर्म पानी भरके, सेक करने वाली थैली लेकर आ गई:"आप तो हैं ही दयालु, कृपालु।आपको तो नोबेल प्राइज़ मिलना है ना, सबकी मदद करने के लिए? सीधे मुंह पहले ही मना कर दिया होता !

कोई नहीं महेश जी !बड़े-बड़े देशों में छोटी-छोटी बातें होती रहती है! अब के ना,आप सीधे प्रधानमंत्रीजी को लिखिए, कि लोअर बर्थ ही हटवा दें

ताकि,झंझट ही ख़तम। या तो आपके लिए चार्टर्ड प्लेन ही बनवा कर भेज दें? क्या कहते हो?

अब चलिए ,पीठ सीधी कीजिए और यह थैली से सेक कीजिए। तब तक मैं मलने के लिए बाम लाती हूं।"

और फिर दोनों हँस पड़े। और कर भी क्या सकते थे वो? 

मेरा भारत महान !!


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