Medha Antani

Crime Thriller


5.0  

Medha Antani

Crime Thriller


एक मौसम ऐसा भी

एक मौसम ऐसा भी

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पहाड़ों में शामें जल्द ही ढलकर रात का स्याह रूप धर लेती है। उस पर भूतों के साये जैसे बादलों के गर्जन, बिजली के नर्तनसे, तने हुए पर्वत और भी भयानक लगते है। यूँ तो समा बहकने बहकाने वाला था, पर निशी के लिए नहीं। कुछ ही दिन तो हुए थे, इस ऊंचाई वाले इलाके में आए हुए। भाड़े का यह बंगला दो लोगों के लिए काफ़ी बड़ा था। बंगले के आगे बड़ा बरामदा, उसके आगे मीनी जंगल जैसा बागीचा, फिर रोड की ओर पड़ता दरवाज़ा। उस पे आज, बाहर की घमासान से निशी को थोड़ा थोड़ा डर लगने लगा था।


“अशोक को भी इसी वक्त दो दिन के दौरे पर जाना था” उसे गुस्सा आया। उतने में ही ज़ोर से बिजली कौंधी, और बारिश ने हमला शुरू कर दिया। निशी ने खिड़की के कांच से बरामदे में झांका, तिरछी धारों से बरामदा पानी पानी हो रहा था। हवाओं से मिनी जंगल-बागीचे के पेड़ पौधे विकराल नृत्य कर रहे थे। उसका दिल ये नज़ारे देख, थडक गया।


कुछ सेकंड में लाइट भी चली गई! यहाँ तो यह रोज़ की बात है, यह निशी समझ पाए, उतने दिन भी तो नहीं हुए थे उसे यहां आए हुए। अचानक घर का मुख्यद्वार कीचूड़ कीचूड़ करने लगा। निशी की घबराहट का पारा बढ़ता गया। पीप हॉल से देखा, पर कोई न था। बंद द्वार के पीछे की आवाज़ और वेग बढ़ते गए, मानों कोई नॉब घुमा के, जबरन खोलकर घुसना चाहता हो। मोबाइल की फ्लैश लाइट ऑन किए, वह हिम्मत जुटाके चिल्लाई, "कौन है वहाँ??"


 कीचूड़ कीचूड़ कचक कचक


 "मेरे पास पिस्तौल है!" डर, बौखलाहट, झूठ साफ झलक रहे थे।


 कीचूड़ कीचूड़ कचक कचक


कांपते हुए, उसने अशोकको फोन लगाया। स्विच ऑफ आ रहा था। यहां उन्हें ठीक से जानता भी कौन था? पड़ौसी बंगले भी दूर थे। कुछ न सूझा, तो वह मोबाईल फ्लैश खिड़कीमें से रोड पर फेंकते हुए चिल्लाने लगी, "बचाओ बचाओ!!"


गड़गड़ाहट, कड़कड़ाहट और बारिश की धुआंधारी में आवाज़ तो नहीं, पर फ्लैशलाइट काम कर गई। वहाँ से गुजर रही किसी कार में बैठे लोगों की नज़र पड़ी, और तुरंत आ पहुँचे। निशी ने डरते, हांफते, दौड़ते जाकर द्वार खोला और बाहर आ के देखने लगी, "यहाँ, यहाँ कोई था द्वार का नॉब घुमा-घुमा कर खोलने की कोशिश "


 "अरे वो?" वो लोग हंस पड़े।


"चूहे थे, चूहे ! बहन जी, नये आए लगते हो। इस मौसम में चूहों की आदत डाल लो। ये बड़े बड़े, मोटे मोटे चूहे !! हमारे घरों में तो अब परिवार बन गए है हा हा!"


कुछ क्षण रुक कर, बोले, "यकीन नहीं होता? खुद ही देख लीजिये !"


निशी ने ध्यान से देखा। नॉब के ऊपर जो कपड़े का शॉ पीस टंगाया था, वो कुतरा हुआ था। दांतों की जालीदार नक्काशी देखकर वह हंस पड़ी, खुद पर और इस वाकये पर !!


एक साल बाद


फिर वैसी ही काली रात, बादल, बारिश। अशोक आज भी घर पर नहीं है। निशी को पिछले साल की वो रात याद आ गई। अब तो टॉर्च, इमरजेंसी लाइट इत्यादि साथ में है। डर तो ज़रा भी नहीं। चूहों से निपटना भी उसे आ गया है। सामने मिनी जंगल अब प्यारी सी फुलवारी में तबदील हो गया है।


 कीचूड़ कीचूड़ कचक कचक


फिर से द्वार पर नॉब के घूमने की आवाज़ पहले कम, फिर तेज़, तीव्र


"ओहो ! तो चूहे मियां महफिल जमाये है?!! अभी उसकी महफिल बरबाद कर देती हूँ!" निशी मुस्कुराती टॉर्च लेकर आगे बढ़ी, द्वार खोला और...


आठ माह बाद


बारिश, बादल और मौसम तो वैसे ही है। रात की कालिमा ज़्यादा है। हवा सांय सांय से द्वार पर सर पटक रही है और घर में है, लैम्प के उजास तले, सोच में गुम, अशोक ”अच्छा हुआ, जो तुमने उस साल, चूहे वाली घटना मुझे बता दी थी। वहीं से तो मुझे मेरे काम को अंजाम देने का विचार बीज मिला। ये मौसम भी क्या गज़ब चीज़ है! एक ऐसी ही बारिश वाली रात ने मुझे जीते जी मार डाला था। जब मैं दौरे पर से अचानक घर आया था और तुम किसी और की बाहों में!! नहीं कर पाया बर्दाश्त! पर मैं गरजने वाला नहीं, समय पर बरसने वाला बादल था। फिर एक ऐसी ही बारिश ने मुझे चुपचाप बरसने का मौका दिया।

तुम निश्चिन्त हो के द्वार खोल रही थी, और मैं निश्चित रूप से पत्थर लिए खड़ा था! बारिश ने भी क्या वफ़ा निभाई थी। मेरे खि़लाफ के सारे सबूत मिटा गई। फिर, दीवार पर तस्वीर बनी हुई निशी को ताकते, फूसफूसाया, "पागलों सा चाहता था मैं तुम्हें, पर तुमने जो बिजली मुझ पर गिराई, तुम्हारा वो मौसम मैं झेल नहीं पाया"


बाहर कड़ाके से बिजली गिरी, अंधेरे घर में क़ातिल रूपहरी रोशनी क्षण भर चमकी और खाई में उतर गई।


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