चिठ्ठियों की दुनिया
चिठ्ठियों की दुनिया
चिट्ठी आई है..... आई है... चिट्ठी आई है
80 के दशक का शायद ही कोई व्यक्ति होगा जिसने ये गाना सुना या गुनगुनाया नहीं हो और न केवल सुना, गुनगुनाया होगा बल्कि विरला ही होगा कोई जिसने चिट्ठी लिखी या पढ़ी न हो। चिठ्ठियां जो कभी लोगों के हृदय का स्पंदन हुआ करती थी वो आज चलन से बाहर होती जा रही है।
बदलाव प्रकृति का नियम है परन्तु किसी किसी कालखंड में जमाना बहुत तेजी से बदलता है और ऐसा ही 80 के दशक के लोगों के साथ हुआ है।
जब कभी चिठ्ठियों का अलग संसार हुआ करता था। डाकिये की आवाज से ही मन में तरंगों का संचार हो जाता था। पूरा परिवार एक साथ बैठकर उस चिठ्ठी को पढ़ता सुनता था। बार बार उन चिठियों को पढ़कर लिखने वाले व्यक्ति के उन्ही भावों को महसूस किया जाता था जो लिखते वक्त उसके मन में रहे होंगे। व्यक्ति की लिखाई से उसके व्यक्तित्व और अपनेपन को नजदीकी से महसूस किया जाता था तब जो सुकून, जो आत्मीयता व्यक्ति को महसूस होती थी,आज की युवा पीढ़ी शायद उस अनुभव से अब ताउम्र वंचित ही रहेगी।
भीलवाड़ा में एक वर्ष प्रवास के दौरान जो पत्र मैंने लिखे और जो मुझे परिवार से प्राप्त हुए उनका अहसास आज भी ज्यों का त्यों मेरे मन में विद्यमान है। छोटे भाई बहिनों से हंसी मजाक की वो बातें, माता पिता की सीख और नसियतें, खुद की छोटी से बड़ी बातें जो पत्र के माध्यम से इधर उधर होती थी ...उनका मधुर अहसास आज भी बरसों पुरानी यादों को ताज़ा कर जाता है।
*अहसास जो कभी पोस्ट्कार्ड, अंतर्देशीय या बेरंग पत्र और तार के माध्यम से हस्तांतरित होते थे बदलते जमाने में मोबाइल ने आते ही उनपर कब्जा कर लिया। कब्जा भी ऐसा की पारिवारिक पत्र का प्रचलन अब समाप्ति के कगार पर है।*
*कभी त्वरित संदेश भेजने का माध्यम रहे तार संचार के बारे में पिछले दिनों डाक विभाग ने आधिकारिक घोषणा की कि न के बराबर उपयोग के कारण तार का सिस्टम अब आमजन के लिए सदा के लिए बंद कर दिया गया है और अब तार सेवा भी इतिहास की बात हो गई।
ड्यूटी पर जाते समय रोज पोस्ट ऑफिस के सामने से खड़े होकर गाड़ी का इंतजार करते समय पोस्ट बॉक्स को देखकर अक्सर चिठ्ठियों के जमाने की यादें ताजा हो जाती है। इन्ही अहसासों से लबरेज प्रधानाचार्य मैडम श्रीमती अमरदीप कौर जी ने सुझाव दिया कि क्यूँ न इन पोस्ट बॉक्स के साथ एक फोटो खिंचवाई जाए ताकि जब भी फोटो देखें तो चिठ्ठियों का संसार और उस जमाने की यादें ताजा हो जाएँ। उनका अंदेशा है कि पता नहीं कब सरकार तार सिस्टम की तरह इन पोस्ट बॉक्स का उपयोग बंद कर दे तब कम से कम ये साक्ष्य तो फोटो के रूप में हमेशा साथ रहेगा।
सच ही है जमाने बदल जाते है केवल यादें जिन्दा रहती है।
