बंटवारा
बंटवारा
बेबी!!! बेबी ये देखो निर्मला आयी है.....पानी पीने को दे दो फिर चाय भी दे देना ।
अच्छा अम्मा !!! आ रहे हैं दस मिनट में ....अभी थोड़ा हम फ्रेश हो जाएं ।
इधर सुहासी जी और उनकी छोटी बहन निर्मला जो अपनी बहन के यहाँ उनसे मिलने आयी थी ....आते ही निर्मला को ये सुनने को मिला....दो बेटियों की माँ हैं उनकी बहन लेकिन मौसी से मिलने अभी तक कोई नीचे नहीं आया।
दस मिनट बोल आधे घंटे बाद आई बेबी और पैर छूकर आशीर्वाद लिया और चली गयी हाँ...!!!! जीजी ने मुझे सादा पानी पिला दिया था तो अब मुझसे रहा नहीं गया तो मैंने पूछ ही लिया तो बातों को टाल-मटोल किया। मैंने भी घर की बात जान उसे छोड़ दिया और जीजी संग मायके और ससुराल के यादों में गोते लगाने लगी तभी बेबी आयी और जीजी को बुलाकर ले गयी।
अम्मा देखिए !! एक तो इतनी महंगाई है ऊपर से मौसी को खाना भी खिलाना होगा....अब रात को तो जाएंगी नहीं तो उनका खाना बनाएंगे तो उसका भी 500 रुपये लग जायेगा ।
अरे चुप रहो !!!बेटी उसके सामने मत कुछ कहो अगर उसने सुन लिया तो.....!!!
तो क्या ?? मेरा घर है जो मन वो बोलूं ....एक तो आपका और बाबूजी को खाना दो उसपर भी बस 2000 रुपए देती है महीने का....और उसमें भी कोई न कोई आता ही रहता है , बेबी ने गुस्से में कहा ।
पैसा ?? बेबी तुम जीजी के घर में ही रहकर और उन्हीं से पैसे ले रही... शर्म आती है या नहीं....तुम भी एक स्कूल की अध्यापिका हो और ऐसी हरकत ।
अचानक से बेबी निर्मला जी को देखकर घबरा गई जैसे उसकी चोरी पकड़ ली गयी हो।
रहने दो !!! मुझे भूख नहीं है तुम अपना देखो....और वैसे भी सुबह चली जाऊंगी तो तुम खर्चे की चिंता मत करो। बस पानी ही पिया है उसके पैसे लो मुझसे ही ले लो।
अब छोटी तो हो नहीं जो समझाएं सो जैसा करोगी वैसा भरोगी ।
अरे निर्मला....!!!! सुनो वो तो बस ऐसे ही....सुहासी जी अभी भी कुछ बताने को तैयार नहीं थीं ।
जीजी सच बताओ क्या बात है...ये आपके कमरे में एक स्टोव, अलग बर्तन है और राशन का सामान और बेबी कैसे पैसे की बात कर रही थी ।
अब तक सुहासी जी जो खुद को समेटे बैठी थी अचानक से फूट पड़ीं और रोने लगीं लेकिन ऐसे कि आवाज़ बाहर न जाये और अंदर से दरवाज़ा बन्द कर लिया।
निर्मला भाग्य फूट गए हैं हमारे....दो बेटियां हैं लेकिन देखो जमीन-जायदाद के चक्कर में हम अपने ही घर में खाने के पैसे देते हैं। अपने जीजा का तो पता ही है एक छोटी सी दुकान लगाते हैं ये स्कूल के सामने .....दिन के 100 रुपये के भी टॉफी बिक जाए तो बहुत है लेकिन फिर भी घर बैठना उन्हें मंजूर नहीं है।
गांव के खेत से अनाज बेच 3000 रुपये मिल जाते हैं तो 2000 तो इन्हें ही देना है और कुछ अपने दवा वगैर के लिए भी रख लेते हैं। कभी-कभी महीने का 1 हज़ार कमा ही लेते हैं ये लेकिन इतनी उम्र हो गयी लेकिन घर नहीं बैठ रहे कि जिस दिन मरूँगा उसी दिन घर बैठूंगा कुछ देर.....।
दोनों बेटियों की शादी में सब दे दिए.....अच्छे घर परिवार में हैं लेकिन अब हम उन्हीं के लिए बोझ हैं तो दामाद से क्या उम्मीद करें ।
जायदाद भी हमलोग दोनों में बांट दिए हैं 1 महीने बेबी खिलाएगी एक महीने सुमन लेकिन देखो.....और कहकर जीजी रोने लगीं ।
तभी जीजा जी के आने की आहट पा जीजी आंसू पोंछ मुस्कुराने का ढोंग करने लगीं और दरवाज़ा खोल दिया ।
आ गए जी....!!!! पानी दे रहे हाथ-मुंह धो लीजिये , सुहासी जी ने अपने पति से कहा ।
तभी निर्मला गयी और जीजा के पांव छुए और आशीर्वाद लिया ।
कुशल-क्षेम पूछ निर्मला बूत सी बन अपने बहन और जीजा की स्थिति देखने लगी। जीजा को घर के माहौल से इतना रश्क़ था कि स्कूल से आकर एक मंदिर में जाकर बैठते और पूजा में ध्यान लगाते या यूं कहें अपने सच को भूलना चाहते ।
रात के नौ बजे और बेबी दो थाली खाना लायी....भिंडी की सब्जी और दो-दो रोटियां .....मैंने तो मना कर ही दिया था तो उसने पूछना भी उचित नहीं समझा। दोनों लोग मन-मसोस खाने लगे जब मैंने और रोटी के लिए पूछा तो बेबी ने कहा कि बुढ़ापे में ज्यादा खाएंगे तो बीमार पड़ जाएंगे फिर इनके बचाये पैसे से तो होगा नहीं फिर हमारा पूरा महीने का बजट बिगड़ जाएगा .....। बड़ी ही बेहूदगी से बेबी ने जवाब दिया और उसे इस बात का ज़रा भी मलाल न था।
आधे पेट खाकर दोनों उठ गए और जीजी अपने जूठे बर्तन धुलकर फिर बेबी को पकड़ाने गयीं ....निर्मला ऐसा देख टूट गयी थी कि बस सब देख रही थीं जैसे कुछ कहना सुनना शेष न था।
अपने जीजा के आंखों में बेचारगी महसूस कर रही थीं और शायद सच बाहर आने की शर्मिंदगी भी। निर्मला 55 वर्ष की थी और बड़ी बहन और जीजा भी उससे 15 साल बड़े थे ।
आज सब होते हुए भी निर्मला असहाय महसूस करने लगी सब तो सो गए ....लेकिन रात में अपने जीजा को कई बार उठ कर पानी-पीते देखा , शायद भूख लगी थी बिस्कुट पड़ा था मेरे बैग में लेकिन कहीं उनके स्वाभिमान को ठेस न पहुंचे मैंने पूछा नहीं, रात भर पलक भी न झपकी और सुबह के 4 बज गए ....। जीजा जी उठकर टहलने चले गए फिर वहीं से मंदिर.....। मुझे भी 6 बजे तक निकलना था वहां और रहने का मन नहीं था लेकिन तभी चौराहे के मंदिर पर शोर हुआ....मैं भी निकली और देखा कि जीजा जी आज चैन की सांस सो चुके थे। पुजारी उन्हें उठाकर लाये ....जीजी तो रोना भूल बस यही कह पायीं कि ये तो मुक्त हो गए अब न जाने हमें कितना भोगना है ......वादे के मुताबिक जीजाजी ठहरे कुछ देर अपने घर फिर जीजी की मांग उजाड़ चल दिये मोक्ष पाने.....मैं जीजी को देख रही थी शायद उन्हें मुझसे कुछ उम्मीद थी क्योंकि लोक-लाज में आकर क्रिया-कर्म तो बेटी-दामाद ने कर दिया और तभी दूसरी बेटी को पता चला कि मैं भी कल की आयी हूँ ।
ख़ैर..... जीजी के साथ रह...उन तेरह दिन में उनके साथ रही और अपना और उनका खर्च भी उठाया....फिर जीजी को ले चली आयी....एक वृद्धाश्रम जहाँ उनके जैसी औरतें और भी थीं....मैं तो अपने साथ उन्हें अपने घर ले जाना चाहती थी लेकिन जीजी ने अपने स्वाभिमान की खातिर मना कर दिया और वृद्धाश्रम चुन लिया ।
अबकी बंटवारा ईश्वर ने किया था....जीजी को यहाँ और जीजा जी को अपने पास ।
आज मुझे अपने किस्मत से जरा भी शिकायत नहीं थी.....बेऔलाद होना आज मेरे लिए कलंक नहीं था.....।
कलयुगी औलाद से बेऔलाद अच्छी थी मैं।
जहाँ हम अब बेटी-बेटे में फर्क नहीं कर रहे....वहाँ बेटियां ऐसा कर रही हैं ये दुखदायी था और कभी किसी दुश्मन की किस्मत भी इतनी बुरी न हो बस यही दुआ है।
घर आ तो गयी थी लेकिन दिल-दिमाग बीते दिनों में ही खोए थे। दिमाग का कोई कोना किसी भी हाल में इस दर्द को कम नहीं कर पा रहा था ।
जीजी भी पहले से बेहतर थीं खुश न सही पर दुखी नहीं थीं । अपनों से मिले घाव इतने गहरे हो गए थे कि अब छोटे-मोटे घाव का पता भी नहीं चलता था ।
