फ़िल्मी असर या बोझिल संस्कार
फ़िल्मी असर या बोझिल संस्कार
हमारी जिन्दगी में फिल्मों का बहुत बड़ा योगदान रहा है, क्योंकि हर किसी के पास एक सपनों की दुनिया होती है जिसमें सब अच्छा ही होता है...लेकिन असल जिन्दगी में शायद ही किसी के साथ होता हो।
अब आप कहेंगे कि जीवन में उतार-चढ़ाव तो लगे ही रहते हैं इसमें नया क्या है???
आज की कहानी का शीर्षक कुछ ऐसा ही सोच कर लिया है, आपने कभी ध्यान दिया......अजी!!! दिया ही होगा, फिल्मों में पहले के बच्चे बीवी के आते ही कैसे घर-परिवार छोड़ उसकी खिदमत में लग जाते थे और मां रोती रह जाती थी और सास अपनी बहुओं को बहुत प्रताड़ित करती थी ....तो इससे हुआ ये कि सास या सास बनने वाली माँ को यह सोचने का अधिकार मिल गया कि बहू के आते ही बेटा भक्त हो जाएग इसलिए उसे बचपन से अब ऐसी सीख दी जाती है या यूँ कहें उसे ऐसा जताया जाता है कि दुनिया का हर बेटा इसके लिए जिम्मेदार है .....लेकिन उन्हीं माँओं को अपनी गलतियां ना देखने का लाईसेंस मिल गया, जिससे लड़कों में कुछ ना करते हुए भी एक अपराध बोध ने जन्म ले लिया है।
अब आपको लगेगा मैं ऐसे ही बोल रही .....पर ऐसा नहीं है अब आपको अमिताभ जी की 'बागबान' तो याद ही होगी .....उसमें क्या है??? उस फिल्म का संदेश कुछ और है लेकिन एक माँ के नज़र से बेटा बीवी के आने से बदल जाता है लेकिन एक बात मुझे यह समझ नहीं आती कि कुछ दिनों की आयी लड़की उसे अपने इशारों पर नचा लेती है,कुछ भी करा लेती है और बेटा करता जाता है .....लेकिन जब बेटा आपकी सुनता हो तब आप जो बोलें आपकी करे ......तो माँ जी ये कठपुतली तो आपने ही बनाया है, है ना!!! भई माँ के इशारे पर नाचे या बीवी के ......इन दोनों के बीच उसका खुद का व्यक्तित्व कहाँ है???
बस हमने एक चीज़ देखी नहीं कि अपनी पूरी जिन्दगी उसी सोच पर निकालना शुरु कर देते हैं, ये कोई नहीं सोच रहा कि माँ की दी हुई इस सोच से सच में बहुत सी बहुयें एक नरक सी जिन्दगी जी रही हैं और बहुत ने सच में परिवार की जिन्दगी भी नरक की है इसमें संदेह नहीं है।
सास भी कभी बहू थी और एक बहू भी सास बनेगी ये सबको पता है लेकिन उस सोच का क्या कर सकते हैं जो अपने बेटों को सिखाया जा रहा।
बेटा राम चाहिये लेकिन खुद कौशल्या नहीं बन सकतीं तब तो 'बिन्दु' जैसी सास इनकी प्रेरणा होती हैं ।
आज के समय में स्थिति ये है कि शादी हुई नहीं कि बेटा भी खुद को राम बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ता और फलस्वरुप कुछ रिश्ते नासूर से चलते रहते हैं और कुछ जिनमें इनसे निकलने की हिम्मत होती है वह अलग हो जाते हैं।
कुछ माँयें तो पहले बहुत अच्छी होती हैं लेकिन बेटे की शादी होते ही वह एक अनजाने भय से ग्रसित होकर और लोगों की बातों में आकर अपना घर बनने से पहले ही तोड़ देती हैं और बाद में सुनती बहू है कि इसने आते ही घर तोड़ दिया.....कोई ये बताए कि जिस लड़की को अभी पूरे घर के सामानों का भी नहीं पता बल्कि आपके बेटे के बारे में भी ज्यादा नहीं पता वह जिम्मेदार कैसे हो जाती है ?????
कुछ फिल्में सच में सिर्फ एक सकारत्मक सोच को ही दर्शाती हैं लेकिन कुछ लोगों की सोच से उसके दृष्टिकोण को दिखाती हैं, जैसी नज़र उसका वैसा नजरिया, वो कहा गया है ना कि गिलास आधा भरा है या आधा खाली है उसे हमें कैसे देखना है वह हमारी सोच पर निर्भर करता है।
भई !!! आखिर क्यों ??? सब जानकर भी हम सिनेमा को वहीं तक क्यों नहीं रखते और सबसे बड़ी बात संस्कारों से पूर्ण मातायें आपको अचानक से अपने दिये गये संस्कारों पर संदेह कैसे होने लगता है ???
आजकल के बेटे माँ-बाप को खुश रखने के चक्कर में बीवी की कद्र करना ही भूल गये हैं उन्हें यह क्यों समझ नहीं आता कि हर रिश्ते की एक हद है और अपनी अलग एहमियत।
दोनों को मिलने पर ही मुश्किलें आतीं हैं, तो कृपया बातों को समझें और अपने बेटों की बसने वाली गृहस्थी को बसने से पहले ही उजाड़ें ना ।
