दर्द बिकता है
दर्द बिकता है
अपने हुनर से दुनिया को हंसाने वाला एक व्यक्ति अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ते - लड़ते अंत में मर जाता है लेकिन ये मतलबी दुनिया आज ये नहीं तो कोई और आएगा ये सोच कुछ वक्त खुशी से बिता लेती है लेकिन आपको हंसाने वाला इंसान कभी दर्द में भी हो सकता है लेकिन फिर भी वो अपना काम बड़ी बखूबी निभाता है ।
याद है सर्कस का जोकर ......कैसे भूल सकता है कोई भी क्योंकि हम सबका बचपन कहीं न कहीं उसके हरकतों पर एक बार हँसा ज़रूर है , लेकिन वो हँसता चेहरा हंसकर भी कितनी बार रोया है ये कौन जानता है ?
कितनी अजीब बात है ना कि दुनिया हँसाने वाले को दूर से देखकर भी हंसती है और अगर कोई दुख में है तो अनजान भी है तो उसे सहारा ज़रूर देती है ।
अगर मैं ये कहूँ कि दर्द के खरीददार बहुत हैं क्योंकि दर्द बिकता बहुत है तो यह अतिश्योक्ति नहीं होगी ।एक लंगड़ा व्यक्ति स्वाभिमान से अपनी इज़्ज़त को बचाकर दिनभर धूप में खड़े होकर गुब्बारे बेचता है लेकिन हमें उसकी मेहनत न दिख उसके बगल में बैठा भिखारी दिख जाता है और हम उसे भीख दे खुद को भगवान समझ बैठते हैं लेकिन मेहनत करने वाले को एक मौका नहीं दे पाते ।
क्या पता गुब्बारे बेचना उसकी खुशी थी लेकिन भीख मांगना उसका दर्द जिसे उसने मजबूरी में उठाया क्योंकि यहाँ दर्द बिकता है ।कोई परिवार खुश है तो दूसरा उसे देख दुखी हो जाता है कि अगर वो दुखी है तो दूसरा खुश क्यों है और लोगों की सहानुभूति बटोरने लगता है ।
कोई लेखक अपने लेख से प्यार और खुशियां लुटाता है तो पाठकगण को उसमें उतनी रुचि नहीं होती जितनी किसी के दुख के ऊपर लिखी कहानी या फिर किसी को किस तरह मानसिक आघात दिया जा सके यह पढ़ वो उससे जुड़ जाता है क्योंकि दर्द बिकता है ।
आखिर जब हमारे जीवन में खुशियों की कमी है तो दर्द क्यों बिक रहा , खुशियां बाटों दर्द नहीं ।
दोस्तों,कई बार हम लीक से हटकर चलते हैं तो कई बार हर का सामना करना पड़ता है लेकिन इसका अर्थ यह तो नहीं कि हम खुश होना छोड़ दें और दर्द की चादर ओढ़ लें , आप सभी अपनी ज़िंदगी में सिर्फ खुशियों को मौका दीजिये , दर्द की दुकान जल्द ही बंद हो जाएगी।
