किटी पार्टी
किटी पार्टी
उमा, बाज़ार से लौट कर सामान की लिस्ट देख रही थी, साथ ही ठंडी शिकंजी सीप कर रही थी जो जुलाई की उमस भरी शाम में उसे राहत पहुँचा रही थी।चलो, सब चीज़ें आ गई हैं, एक टेंशन तो ख़त्म हुई। मुख्य चिंता तो कल की है, बस !अच्छे से निबट जाए,’ मेरी किटी पार्टी ‘ कहने को मस्ती मज़ाक़ होता है, किंतु जिसे पार्टी देनी होती है उसका तो कुछ दिनों का सरदर्द हो जाता है। गेम ,गिफ़्ट, क्या बनेगा कैसे बनेगा, साफ़ -सफ़ाई, कहीं ‘मुई काम वाली न छुट्टी कर दे ‘,हे भगवान सब अच्छे से निबटा देना। उमा ने वहीं बेडरूम में बैठे बैठे हाथ जोड़ लिया।
सुबह से लगे -लगे हर चीज स्टाटर से लेकर कटलेट, छोले भटूरे , चटनी, गाजर का हलवा और न जाने कई डिश बना डाले उमा और सावित्री ने, सावित्री ने आज सब घरों से छुट्टी ले लिया था। उमा ने पति रोहन को भी काम पर लगा दिया था -क्रॉकरी को निकाल कपड़े से पोंछ टेबल पर लगाने का। रोहन हर चीज़ चखता जा रहे थे और बोलता जा रहे थे काश !रोज़ पार्टी होती, घर पर तरह -तरह के पकवान मिलते खाने को, क्रॉकरी सजा रोहन मज़ाक़ के मूड में थे ,बोले और “क्या हुकूम है ?मैडम.!..बंदा हाजीर है।”
चार बजे तक उमा की सारी दोस्त आ गई थीं सजी धजी सब एक-दूसरे से अच्छे दिखने की कोशिश में नए अप टू डेट पोशाकों में इतराते उम्र छुपाने की नाकाम कोशिश करते हुए जो थोड़ी थुलथुली सी थी वो अपने मोटापे से परेशान लेकिन चीज पकौड़े दबा के खाते हुए..कल दो किलोमीटर ज़्यादा टहल लूँगी क्या फर्क पड़ता है इतने मेहनत से बनाया है उमा तुमने बोल कर पार्टी इन्जॉय कर रही थी। गेम खेले गए, हँसी मज़ाक़, एक-दूसरे के कपड़ों की तारीफ़ ,दबे ज़बान शिकायत पतियों, बच्चों और कामवालीयों का टॉपीक ज़्यादा गर्म था। जिससे हर सदस्याएँ पीड़ित लग रही थी और खुल कर चाय पर चर्चा कर रही थी।
लेकिन हमारी किटी में एक बात अनकॉमन थी।
हम सब इसको अनिवार्य रूप से अपने मस्ती भरी शाम में शामिल करते और खुश होते |आखिर कुछ सालों में हम भी इस दौर से गुजरने वाले हैं और वो है जिस किसी के घर में कोई बुजुर्ग रहता हो उनके पास कुछ समय बैठ कर उनसे बातें करना ;आख़िर हम सब भी एक दिन इस पड़ाव पर आयेंगे हमें भी अकेलापन खाएगा |आज सभी अपने में मस्त हैं चाह कर भी दो घड़ी बुजुर्गों के पास बैठ ,’चंद बातें कर सकें ‘| हम ारी सारी सहेलियाँ अम्मा जी के कमरे में आकर, उनके पलंग पर बैठ गई। बातों का दौर चला तो आकर अटका सास बहु पर। अम्मा जी शुरू में कुछ नहीं बोल रही थी लेकिन जब बोली तो अनुभव की पोटली में से कई संदेश, यादें ,नुस्ख़े निकले लेकिन जो बात आज अम्मा जी ने कही वो परिपक्वता को दर्शा गया।बात निकली ,कि बहु कभी बेटी नहीं बन सकती कितना भी प्यार दो रानी बना कर रखो बहुओं के मन में ससुराल वालों के प्रति अपनापन नहीं जागता वो तो हमेशा मायके वाले का पक्ष लेती है |तभी मृदुभाषी अम्मा जी ने कहा हाँ !’वो तो आपलोग सही कह रहे हैं, लेकिन सास भी कभी माँ नहीं बन पाती है, बहु कितना भी करें ज़रा सी चूक उसे कठघरे में ला खड़ा करता है, ससुराल में। जबकी बेटी की सौ ग़लतियाँ एक माँ नज़रअंदाज़ करती है, क्यों ?है ना। सोने सी खरी बात। हम सब अम्मा के समर्थन में सिर हिला रहे थे। वाकई बुजुर्गों के अनुभव की बगीया में कई रंग के फूल खिलते हैं जिनके सानिध्य में हम पुष्पित पल्लवित हो कर खिलते हैं।आज अम्मा जी प्रतिदिन की बजाय ज़्यादा खुश दिख रही थीं |
