भाग्य - जोगिनी
भाग्य - जोगिनी
नमस्कार!!!...पेश है एक रूहानी...सुहानी यादों के सफर में ले चलती...और भावनाओं को छूती...अनोखी कहानी... "भाग्य - जोगिनी"
..........!
अगर स्कूल की बात करें....मेरा पसंदीदा पीरियड....पुस्तकालय!...!
लगभग सभी किताबें....जो हिंदी में थी... मैंने पढ़ी।।
हर रोज....एक नई कहानी....रात भर....सुबह...समाप्त।।।
मुंशी जी!....मेरे फेवरेट हैं....उनका लेखन...और...शेक्सपियर की कहानियों में काफी समानता है।।। दोनों महान हैं...मानवीय भावनाओं को दर्शाने की कला...में...!
......12th class.... यानी कहें तो अंतिम पड़ाव....!हमारा।
दो महीने...बाकी बचे हैं... इंटरमिडिएट...मुख्य परीक्षा को।।
अमावस्या की वह रात...काली अंधेरी...गहरी...वीरान!....
स्कूल के छत में कुछ छात्र...कुछ तो कर रहे थे...लेकिन क्या?...
दो दिन पहले... लाइब्रेरी मैम...परेशान थी... एक किताब गायब थी...प्राचीन तंत्रः मंत्रों वाली।।।
सीसीटीवी कैमरा...उस समय...अवेलेबल नहीं थी।।।
पता लगाना मुश्किल...पर मैम ने कोशिश की....हम कुछ छात्र रेगुलर...आते थे।।।
मेरे कक्षा से...तुलसी, संदीप और मैं!....हमसे पूछताछ हुई।
मुझे शक था...तुलसी और संदीप अक्सर कहानियों की किताबें छुपाकर लाया करते थे।...चंपक,कॉमिक्स,नंदन इत्यादि।।।
पर तंत्र मंत्र की पुस्तकों का वे क्या करेंगे।... मैंने पड़ताल किया...शक दूर हुआ।...अगर किताब होता...रूम में ही होता।।।
दो दिन बाद...अमावस्या की रात गुजरने के साथ...विपदाओं...का दौर शुरू हो गया।।।
भाग्य का खेल...पलटने लगा...जो पढ़ते थे...नहीं पढ़ने लगे....जो ना पढ़ते...वे पढ़ने लगे। शिक्षक भी व्यस्त हो गए....कक्षाएं समय से ना होती...होती अगर...तो अध्याय
अधूरा रह जाता।।।
पढ़ाई...नीरस लगने लगी...कारण?...कोई ना जानता।।।
शिक्षकों ने कोशिश की...छात्र छात्राओं ने भी ध्यान लगाया
पर ...पढ़ाई से मन विरक्त हो चुका था।।।
एक सप्ताह बाद...आज...!
पुस्तकालय में कहानियों की नई किताबें...आई।
चंपक, बालहंस.... इत्यादि के अलावा कुछ उपन्यास भी।
लाइब्रेरी की कक्षा हुई...हम गए... कुछ कहानियां पढ़ीं...किताबों का जायजा लिया...पर पढ़ने का रस...अब ना रहा...मन विचलित सा हो गया...!
बेमने सा... हम लौटे...कुछ वाक्य पढ़े...पर शब्दों के ढेर में...समा ना पाए।... अचरज होता है...बिना अंत जाने...
कोई रचना बच पाई हो...पर आज अधूरी रह गई...!
रचनाओं के समंदर में गोता लगाता... रात भर... यात्री।।।
यात्रा आज...अधूरा रह गया!...।
शाम हुई....पर आदत जस की तस रही.... लाइब्रेरी आई नई किताबें.... एक किताब हमारे रूम भी आई....
तुलसी और संदीप....कलाकार थे!... ऐसा नहीं कि वे वापस नहीं करते...किसी दिन चुपके से उसे रख आते...जब अंत आता।।।
यह सप्ताह मनहूस बीता...छात्रों का भविष्य...लड़खड़ाने लगा!... अभाग्यता का अंधेरा गहराने लगा...कुछ बीमार पड़े ...कुछ की मानसिकता...गड़बड़ाने लगी...!
परीक्षाएं...दस्तक देने लगी!...अध्याय अब भी अधूरा।।।
जहां...बच्चे चहचहाते...पंछियों की भांति...करलव करते।
...आज खामोश!... उदास!...तनावपूर्ण।।।
जहां कभी अनुशासन...की तारीफ में...शब्द पिरोए जाते
...आज वहां अनुशासनहीनता का नजारा दिखने लगा था।।
तुलसी और संदीप...दिन रात...एक कर...कहानियों का अंत ढूंढ लेते...थे।।।
मगर उस एक...उपन्यास...का अंत...में चार दिन लगा दिए।
....पांचवां दिन...वो उपन्यास... आज मेरे हाथ लगी!....
... मैंने पढ़ना शुरू किया:..."एक भारतीय राजा की कहानी.
..." भीमानायन"....पराक्रमी और न्याय प्रिय!...
राजा की दो जुड़वां बेटियां थी!... "शीतप्रभा और सुरंजना!"
जिनकी सुंदरता और बुद्धिमता के चर्चे चहुंओर हुआ करते थे
... दोनों की शादियां हुई... कुंकलगढ़ के राजकुमारों से...
"वैभवराज और कृष्णराज"....दोनों ही वीर योद्धा।।।
समय... हंसी खुशी...बीतने लगा।।।
कुछ समय बाद... कुंकलगढ़ के बूढ़े राजा..."संयोगराज"!
चल बसे...राज्य अस्थिर हो गया...दोनों भाई सिंहासन पाना चाहते थे।।।...आपस में मतभेद शुरू हो गया!...
दोनों बहनें...राजकुमारियों में...दूरियां बढ़ गई।
पहले तो बोलचाल बंद हुई...फिर द्वेष!...घृणा...कुंठा।।।
सभा ने...उपाय निकाला...दोनों राजकुमारों को परखने का
...तीरंदाजी हुई!, तलवार बाजी हुई!, मल्लयुद्ध हुआ!...
नतीजा...बेनतीजा रहा...अंत में सभा ने...दिन तय किया!..
... ज्ञान को जांचना था अभी!...बाकी!
एक अच्छी पत्नी... वही होती है...जो पति के सुख-दुख में सदैव...उसके साथ खड़ी रहे...दोनों राजकुमारियां भी...
पतिव्रत धर्म अडिग हो निभा रहीं थी...हर दिन इष्ट देव की अर्चना करती।।।
एक दिन...राजकुमारी...शीतप्रभा...एक बाबा से मिली...
अपना दुखड़ा उन्हें सुनाया... बाबा ने ...भाग्य के देवता भाग्यवान की उपासना...करने को कहा...!
राजकुमारी प्रतियोगिता आरंभ से पहले...तप में बैठी...अन्न जल त्यागी...और भाग्यवान की भक्ति में लीन हो गई।।।
... दूसरी राजकुमारी सुरंजना...बाबा उससे भी मिले...
उसे भी वही सलाह दिए!...
इस...धरती में मानव की मनोवृति...अलग अलग विचारों वाली होती है... जहां शीतप्रभा...अपने पति को सिंहासन में विराजमान देखना चाहती थी...वहीं सुरंजना भी...लेकिन...
...हारते हुए...अपने बहन और बहनोई को...
बस सोच का फर्क है...हम जैसा सोचते हैं... वही बोते हैं..
..हम कष्ट के बारे में सोचते हैं...कष्ट मिलता है...वहीं सुख के बारे में सोचेंगे सुख मिलेगा।।।
प्रतियोगिता निर्धारित समय पर हुई...!
सभा ने परिणाम घोषित किया..."वैभवराज की जीत हुई...
सिंहासन का हकदार बना!....कृष्णराज जैसा कि ...तय हुआ था...राज्य छोड़ जाना पड़ा...बहुत दूर।।।
कभी-कभी किसी और कहानी से...किसी और कहानी के चरित्र का पता चलता है...
शीतप्रभा...भाग्य के देवता भाग्यवान समर्पित...एक किताब लिखी..."भाग्य-जोगिनी"... कोई कहानियां नहीं... भाग्य चक्र को पलटने की प्रक्रिया थी...वर्षों पुस्तकालय...में धूल से ढकी ...अचानक गायब हुई...!...बातें समझ आने लगी।।।... लाइब्रेरी की हमारी कक्षा से पहले....जूनियर बच्चों की कक्षा थी...हम ढूंढने लगे।।।
हर हाउस...हर कमरे ... पर कामयाबी ना मिली...कुछ पर डाउट जरूर हुआ।।।
एक सातवीं कक्षा का जूनियर बच्चा...उसने किसी के पास देखा था...उसे याद नहीं आ रहा था...हमने उसे लालच दिया..."हम अबकी बार रांची जाएंगे तो चॉकलेट उसके लिए लाएंगे।"...उसने आश्वासन दिया।...याद आएगा खबर करेगा।।।
दो दिनों बाद...हम रात्रि भोजन कर... चापाकल में...प्लेट धो रहे थे।।।
अचानक वही बच्चा भागता-भागता आया... बताया... उसने गाना सुनी... वही गाना... वही सुर...गाने वाला वही शख्स..
...जिसके हाथों में वो किताब थी।।।
हम गए... उसने इशारा किया...एक आठवीं कक्षा का छात्र..
...पतला दुबला...मोटा चश्मा लगाए!...साधारण सा दिखता।...
वो छात्र...अपने हाउस की ओर जा रहा था... वही गाना...जो उस बच्चे ने सुनाया था।।।
हमने प्लान बनाया...रात के गहराने का...प्रतीक्षा किया।।
...और आधी रात की गहराई में उसे दबोचा...वह डरा... भागा!!
तुलसी का आकर प्रकार...लंबा चौड़ा शरीर किसी...
आबनुस की भांति!...थोड़ा संघर्ष हुआ...आखिर में फिर दबोचा...अंत में वह सब बका।।।
...वह परेशान...हताश...दुखी ...अकेला...था।।
उसका भाग्य रूठा था।।
इसलिए...उसने किताब चुराई ... शायद!...उसकी मदद से भाग्य उसका चमक जाए... कुछ अच्छा भी हुआ...उस किताब को पढ़ने से...!
उसकी बातें...जो दर्द भरी थीं...संदीप को सुन...गुस्सा आया...उसे डांटने लगा..."ये क्या बात हुई। तुम अपने मजे के लिए पूरे स्कूल को सजा में डाल दोगे।।।"
आठवीं का छात्र रोने लगा...उसे लगा होगा!...हम उसकी पिटाई करेंगे, हमने बस किताब लिया...उसे जाने दिया।।।
सुबह हुई!... हमने सोचा... अब सब ठीक होगा।।
हम गलत थे... स्थिति जस की तस रही...या यूं कहें... स्थिति बदतर होने लगी दिन...ब...दिन।।।
हमसे कुछ तो छूट रहा था...लेकिन क्या?...अब भी प्रश्न चिन्ह लगा हुआ था...हमारी तलाश में।।।
"भाग्य-जोगिनी"... कर्म आधारित...भाग्य निर्धारण की विद्याओं को संग्रहण करता बहुमूल्य ग्रंथ...राजकुमारी "शीतप्रभा" द्वारा रचित... आप भाग्य पर विजय पा सकते हैं
....बशर्ते खुद पर विजय पाना होगा...पाप कर्मों और विचारों को त्यागना होगा...मनुष्य तो मोह के आगोश में है।।।
शीतप्रभा रचित...किताब में उसकी बहन...जो जुड़वा थी।।
उसकी भी एक कहानी है...मार्मिक...दुखदाई।।।
"अपने भाई से... अपराजित हो..."कृष्णराज...सुरंजना"
उस राज्य...का त्याग कर निकल पड़े...किसी दूसरे राज्य में अपना गृहस्थ जीवन का आरंभ किया... सुरंजना भी अच्छे संस्कारों में पली बढ़ी थी...पति का का जीवन भर साथ दिया...पर उसके हृदय में टीस थी....राजशाही जीवन... छोड़... दरिद्रता में उतर आने की...
पति परिश्रमी निकला...कुछ ही वर्षों में उनका छोटा व्यापार... आगे बढ़ गया!...!
राजकुमारी... शीतप्रभा ने अपनी रचना ...में एक और ग्रन्थ का जिक्र किया है...श्रापित ग्रन्थ:- "भाग्य -कलंकिनी"!!!
"जादू - टोनों का समायोजन... मति भ्रम और तामसिक विद्याओं का संग्रह!!!...उस ग्रन्थ को पढ़ने मात्र से...भाग्य में समस्याओं का समावेश हो जाता है...गुणी...से...गुणी मनुष्यों का मति भ्रम हो जाता है...वो किताब भी लाइब्रेरी में थी...दोनों साथ में थी...एक मिला...दूजा गायब हो गया।।।
...पर गायब नहीं हुआ... लाइब्रेरी मैडम ने एक किताब की चोरी का जिक्र किया था...जो हमें मिल गई है...यानी कि...
दूसरी का अध्ययन कोई कर रहा है...वो कौन हो सकता है?
...तुलसी ने दिमाग लगाया...बताया...जो भी किताबें लाइब्रेरी से बाहर जाती हैं... मैडम रजिस्ट्री में एंट्री करती हैं।।
...आनन फानन में हम लाइब्रेरी की ओर दौड़े... मैडम से रिक्वेस्ट की... आखिर बहुत मन्नतें बाद मैडम मानी...
...हमने रजिस्टर देखा...हर पन्ने को बारीक से...आखिर हमें वो नाम मिला...वो कोई छात्र नहीं...बल्कि छात्रा थी...
संगीत कलाओं में माहिर...वो छात्रा...हमारी कक्षा की होनहार तबला वादक..."नीलमणि"।।।
उसे... हमें रोकना था...अभी अध्याय अधूरा था...अगर पूरा होता... ना जाने क्या होता?...
दो दिनों...तक उसपे हमने कड़ी नजर रखी...!
तीसरे दिन...भाग्य ने साथ दिया...क्योंकि कभी कभी जब आप अच्छा करना चाहते हो तो... ईश्वर भी आपका साथ देता है।।।
आज ग्रन्थ उसके हाथ में थी... उससे छीनना...यही हमारी योजना भी।।।...समय गुजर रहा था...दो बजे बाद असंभव होता...कक्षाएं बंद हो जाती।।। सभी अपने हॉस्टल चले जाते।।। गर्ल्स हॉस्टल में बॉयज का जाना...मनाही थी।।।
बस एक पल...ही काफी थी...संदीप और तुलसी को अपना कला दिखाने में।।।
आखिर वो समय आया...तुलसी!...लड़ बैठा...अपने सहपाठी से...समीर!...वो हमारा बकरा बना...सबकी नजर
दोनों पर टिकी...संदीप तैयार...बाज की तरह झपटने को।।
अचानक...नीलमणि अपना ध्यान हटाई!...किताब उसके डेस्क पर था...दो पलों में ही संदीप ने कमाल कर दिया।।।
वो ग्रंथ...वो किताब...???...अब हमारे हाउस में थी...!!
नीलमणि बेचारी...ढूंढती रह गई...उसने कंप्लेन भी किया...
...आखिर में उसे फाइन भरनी पड़ी...वो भी दोहरी।।।
अब उस किताब की बारी थी..."दो जुड़वां बहनों की कहानी!..."सुकन्या और कुत्सिकन्या"...दोनों का व्याह...एक राजा के साथ हुआ।।।
धीरे धीरे दोनों में अनबन होने लगी...थीं तो दोनों बहनें...पर दोनों सौतन भी थी... कुत्सिकन्या...बचपन से... चलाक, धूर्त और स्वार्थी... उसके उलट...सुकन्या... सौम्य, दयावान और परोपकारी।।।
सुकन्या का निश्छल स्वभाव...राजा को अतिप्रिय लगता...!
कुत्सिकन्या का कुटिल स्वभाव...राजा को खलता।।।
समय गुजरा... दोनों रानियों को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई।।।
कुछ वर्षों बाद...सुकन्या...बीमार पड़ी...और चल बसी...
...दोनों राजकुमारों का पालन पोषण हुआ।।।
वीरता और सामर्थ्य में दोनों एक समान...जब उतराधिकार चुनने का समय आया... कुत्सिकन्या... राजा से निवेदन की
...उसके पुत्र को ही सिंहासन मिले।।।
राजा...पिता थे...दोनों समर्थवान संतानों के...उन्होंने फैसला ना लिया...समय पर सब छोड़ दिया।।।
राजा...की चुप्पी अब उसे खलने लगी।।।
कुछ समय बाद...राजा भी... बीमार पड़े...बिस्तर से उठ भी ना सके...! कुत्सिकन्या!... उसकी साजिश थी...वह विष...
जिसने सुकन्या के प्राण हरे... आज राजा के प्राण हरने को आतुर थे।।।
आखिर राजा ने... प्राण त्यागे... वर्चस्व की लड़ाई शुरू हुई।।
कुत्सिकन्या ने...तंत्र-मंत्र और तांत्रिकों का सहारा लिया।।।
जिस दिन... शास्त्र की प्रतियोगिता हुई... उसका....
....पुत्र विजयी हुआ। ...सुकन्या का पुत्र कृष्णराज पराजित।
...उसे मति भ्रम हुआ था...प्रश्नों के उत्तर उसे कंठस्थ होने के बावजूद वो हारा...!
...वैभवराज...राजा बना...!
पर राज कभी राज नहीं रहता!... बूढ़े राजा की मृत्यु के पश्चात... उनका संदेश उसे मिला!...उसने पड़ताल किया।।
माता उसकी... राजद्रोही निकली।।।
उसे बंदी बनाया...! लज्जा वस...उसने अपने प्राण त्यागे।
वही विष पीकर।।।
!...! पर वो किताब...सिरहाने रखी थी...जहां वो मृत्यु के आगोश में समाई थी।।।
दोनों..."वैभवराज और शीतप्रभा"... दौड़े...अपने भाई और उनकी भार्या से मिले...चरणों में गिरे।... क्षमा याचना किया।
...पर दोनों ने मना किया...अब वापसी संभव नहीं!... पर उन्हें क्षमा किया।।।
समय के साथ...शीतप्रभा...को समझ आया...उस किताब की विद्याओं का...जो श्रापित हो चुकी थी... भाग्य के पन्नों को उलट देती थी।।। कुत्सिकन्या...अब भी...भाग्य-कलंकिनी के शब्दों में बसी थी।...प्रेत योनि में भटकती थी...उसके कर्मों की सजा...शायद यही थी।।।
शीतप्रभा...अपनी रचना...और पवित्र मंत्रों से सुसज्जित किताब को उस... किताब की पूरक...उसके ऊपर रख...
हमेशा के लिए... छुपा दिया।।।...हमने भी वही किया।।।
बाहरवी की परीक्षाएं हुई।। हमारा आखिरी पड़ाव।।...
THE END....!
