बेनाम रिश्ता
बेनाम रिश्ता
प्रतिभा अपने अपार्टमेंट के सामने, सड़क पार, सब्जी वालों को सब्जी लगाए देखती। अंधेरा होते-होते, वे चिल्ला चिल्ला कर सब्जी बेचते।उन्ही में रहती एक बच्चे की मासूम आवाज़,20 का तीन किलो आलू, 20 का तीन किलो। उत्सुकता से वह बालकॉनी में आ खड़ी होती। फिर एक दिन उसका मन नही माना, और वह झोला उठाकर चल पड़ी।
आलू लेकर लौटी तो वो 7-8 वर्ष का मासूम से बालक दिमाग मे था। गार्ड को भेजकर उसके पिता को बुलवा भेजा।
बड़ी मान मनुहार के बाद, बच्चे के उज्ज्वल भविष्य के सपने दिखा, वह उसे राजी कर पाईसंदीप को उसे सौंपने को ।अगला कदम पति को तैयार करने का था, उसे हॉस्टल भेजने को-----
फिर समय कैसे पंख लगा कर उड़ गया पता नही।
हर छुट्टी में वो अपने घर चला जाता, कभी कभी प्रतिभा से मिलने भी आता----, सिर्फ चरण स्पर्श, पर उसकी बोलती आंखें बहुत कुछ कहती---
आज उसका इंटर व इंजीनियरिंग दोनो का रिजल्ट निकला था,संदीप घर आया था। पति के चरण छूने के बाद सीधा उसके कमरे में आया। चरण छूते हुए उसके मुँह से निकला ,"माँ---"और अनायास प्रतिभा की आंखों से आंसू बह निकले।और उस बेनाम रिश्ते को नाम देने वाले संदीप को उसने खींच कर अपने सीने से लगा लिया।
