Shyam Raj

Inspirational


4.6  

Shyam Raj

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बड़े घर की बहू

बड़े घर की बहू

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सपनों को पूरा करने के लिये घर से निकलती थी कभी किसी ने मुझे रोका नहीं था मैंने जो सपने देखे थे वो मम्मी पापा ने ही दिखाए थे बेटी तू ये कर सकती हैं वो भी कर सकती हैं भाई से लड़ाई होती थी रोज़ मेरी पर दिल बहुत बडा था उसका भी ! एक दिन घर आने में देर क्या हो गई वो बेचैन सा हो गया बहुत सुनाया मुझको और ज़ब मेरी आँखो से आँशु आ गये तो गले भी लगाया बोला देख बहन हमारी जिंदगी तू ही हैं इतनी लेट ना आया कर अगर ऐसा कोई काम था तो मुझे ही बोल देती मैं भी तेरे साथ चल लेता...

कब मैं बड़ी हो गई पता भी नहीं चला कुछ दिनों बाद ही मुझे देखने वाले आये मैं उनको पसंद आ गई और लड़का तो पहले ही मम्मी पापा का देखा हुए था पापा के दोस्त का बेटा था अच्छा परिवार था किसी चीज की कमी नहीं थी उनके यहाँ ! मम्मी पापा खुश थे तो मैंने भी कोई ऑब्जेक्शन नहीं किया शादी से पहले जो रस्में होती हैं वो सब पूरी हुई और फिर हसीं ख़ुशी दिन कटने लगे शादी से पहले कभी उनसे मुलाक़ात नहीं हो सकी क्यों कि वो दूसरे शहर से नौकरी करते थे पर हा कभी कभी फ़ोन पर बात हो जाया करती थी !

उन्होंने शादी के लिये जो समय तय किया था वो ऐसे दौड़ता आ रहा था कि मानो उसे किसी को हराना हो ! तय दिन आ ही गया सब तैयारी हो चुकी थी बस सब बारात का इंतजार कर रहे थे इंतजार खत्म हुआ और बारात दरवाजे पर... धीरे धीरे शादी कि सभी रस्में पूरी हुई और मैं मम्मी पापा और भाई से विदा होकर अपने नये घर सुसराल चली...

 रास्ते में सिर्फ ये ही सोच रही थी कि घर नया होगा , लोग नये होंगे , रिश्ते नये होंगे नया नया माहौल होगा कैसे एडजस्ट कर पाऊँगी मैं ! ऐसे ही कई विचार मन में उथल-पुथल हो रहे थे कि मेरा नया घर आ गया !

बहुत से रिश्तेदार जो हमारा इंतजार कर रहे थे गाड़ी जैसे ही घर के आगे जा कर रुकी बहुत सी औरतो ने गाड़ी को चारो तरफ से घेर लिया चाची ताई बुआ मामी नानी जेठानी और पता नहीं कौन कौन...?? थोड़ी सी देर बाद ही हमें गाड़ी से उतरा गया और बहुत सारी रस्में पूरी करवाई गई।

पूरी रात न सोने की वजह से मुझे नींद तो बहुत आ रही थी पर सो न सकी... शाम होते होते बहुत से मेहमान जा चुके थे और पास पड़ोस वाले भी... ! बस कुछ काश लोग ही बचे थे जैसे मेरी नन्द उसके बच्चे , नन्दोई और दो बुआ। राधे छोटी वाली बुआ का लड़का और शायद 2-3 और लोग !

मेरी नन्द मज़ाक कर रही थी मुझसे बार बार कोई बात न करके चेहरे पर अजीब सी स्माईल करती सिर्फ ये ही बोल कर चली जाती भाभीजी भाभीजी...

अगले दिन मैं जैसे ही कमरे से बाहर आई तो नन्द मिल गई और पूछा भाभीजी पहली रात कैसी रही...?? मैं भी कुछ नहीं बोल पाई और बस हल्की सी मुस्कान कर आगे चली गई। 

दिन से दोपहर से शाम होती गई मेरे मन में जो सवाल उठ रहे थे उन सब का जवाब मिलता गया मुझे ! नन्द के बच्चे बडे नटखट और प्यारे थे उनका साथ अच्छा लगा मुझे ! शादी के बाद दो दिन तक ही रहे वो सब उनकी एग्जाम थी इसलिए नन्द भी बच्चो के साथ ही चली गई.. 

मैं भी अपने मम्मी पापा और भाई से मिल कर वापस सुसराल आ गई उनकी नौकरी दूसरे शहर मे होने व छुटियाँ पूरी होने के कारण उनको भी जाना पड़ा , जैसा मैं पहले कभी सोचती थी वैसे ही मिले हैं मुझको ये ! अब घर पर मम्मी पापा और मैं ही रह गये थे , सोचती थी पता नहीं मेरे दिन कैसे कटेंगे यहाँ पर जैसे जैसे दिन बितते गये मम्मी जी से मेरी दोस्ती गहरी होती गई.. पापाजी भी अच्छे इंसान हैं कभी मुझ पर किसी प्रकार की पाबंदी नहीं लगाई।

वो तो घर कभी कभी ही आते हैं पर मम्मी जी से अच्छी दोस्ती होने के कारण मुझे कोई परेशानी नहीं हुई... सच कहुँ तो मैं सुसराल में नहीं जैसे अपने ही घर में रहती हूँ ! कभी अपने मम्मी पापा और भाई की याद ना आये मुझे इसका भी पूरा ख्याल रखती हैं मम्मी जी।

बहुत खुश हूँ मैं यहाँ पर।

जरूरी नहीं कि लड़की को सुसराल में बडा-सा महल , बड़ी-सी गाड़ी मिले तो ही बड़े घर की बहू कहलाये बस सुसराल वाले बडे दिल वाले मिल जाये तो भी बेटी बड़े घराने की बहू बन जाती हैं ...

अब कभी भी घर जाती हूँ तो मेरे घर वाले ही कह देते हैं देखो वो बडे घर की बहू आ रही।


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