बागडोर
बागडोर
बस अब बहुत हो चुका। बहुत सहन
कर लिया मैंने। मैं ही नासमझ थी।
तुम्हारे प्रेम में डूबी में कुछ समझ
ही नहीं पाई। मेरे प्यार समर्पण को तुमने मेरी कमजोरी समझ लिया।
हमेशा मुझे अपने हिसाब से चलाते रहे। मेरी इच्छा-अनिच्छा को कभी जानने का प्रयत्न ही नहीं किया। अपनी बात को हर मामले में ऊपर रखा चाहे वह घर की हो या बाहर की।
मैं भी तो पहले कुछ नहीं समझी। लग रहा था सब ठीक ही है। धीरे धीरे समझ में आया कि अरे मेरे हिस्से में तो कुछ आया ही
नहीं। मेरा नाम तो अनाम ही रहा।
मैं केवल परछाई बन कर ही रह गई जिसका अपना कोई अस्तित्व नहीं
रहता है। नहीं अब और नहीं, मुझे
खुद को साबित करना होगा। सुरक्षा
के घेरे से बाहर निकलना होगा। अपनी पहचान बनानी होगी।
अपनी बागडोर खुद संभालनी होगी। अब मैं कठपुतली नहीं बनूंगी।
