Sneh Goswami

Abstract


3.9  

Sneh Goswami

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बाढ़ आई बाढ़ गयी

बाढ़ आई बाढ़ गयी

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“ अजी सुनते हो उठो “ – सुलोचना ने किरसन के बिल्कुल कान के पास जाकर पुकारा।

किरसन उर्फ कृष्ण ने आँखें खोलने की असफल सी कोशिश की पर नींद से बोझिल पलकें मानो चिपक गयी थी। वह चादर को सिर से पाँव तक खींच करवट बदल सो गया। सुलोचना ने अधीरता से झकझोरा – “ उठो भी, बाहर देखो “।

कृष्ण ने घड़ी देखी। अभी सुबह के सवा चार हुए थे। आसमान अँधेरे की चादर ओढे सो रहा था। 

“ ऐसी भी क्या आफत है जो इतनी सुबह शोर मचा रही हो “।

सुलोचना को साँस सामान्य करने में पूरा जोर लगाना पड़ा – “ वो पाँवधोई आयी हुई है “।

“ भागवान ये पाँओधोई तो सदियों से यहीं है, शहर में पीढियों से बह रही है। आज कहाँ से आयी “।

“ मेरा मतलब चढ गयी है ”।

तब तक बाहर लोगों के चलने – दौड़ने, बोलने की आवाजें सड़क पर साफ सुनायी देने लगी थी। सब सरपट एक दूसरे से होड़ लगाए चले जा रहे थे खालापार पुल की ओर। कुरते के बाजू में हाथ डाल पैरों में चप्पल फँसाते वह भी बाहर की ओर लपके और भीड़ में शामिल हो गये। पंद्रह मिनट का रास्ता दस मिनट में ही पार कर जब वह पुल पर पहुँचे तो वहाँ अच्छी- खासी भीड़ जमा हो चुकी थी।

 हमेशा मुश्किल से घुटनों तक पानी वाली पाँवधोई इस समय खतरे का निशान से ऊपर जा चुकी थी। पाँवधोई जिसके बारे में कई लोककथाएँ और जनश्रुतियाँ प्रसिद्ध हैं .।

 जैसे पाँवधोई साक्षात गंगा जी का अवतार है।

कि पाँवधोई का आदि - अंत आज तक कोई ढूँढ नही पाया। 

यह बाबा लालजी दास के कमंडल से निकली है इसीलिए उनके आश्रम के आसपास ही चुपचाप बिना शोर किए बहती है।

आदि आदि 

 बाबा लालजी दास सिद्ध पुरुष थे। संन्यासी। रमते जोगी। एक दिन घूमते घामते सहारनपुर आ गये तब यह सकलापुर हुआ करता था। यहाँ शमशान के पास वाले बाग में उन्होने धूनी रमायी तो यहीं के हो गये। यहाँ के बड़े शमशान के पास आज भी उनका बाड़ा स्थित है। बाबा का नियम था, हर रोज चार बजे अँधेरे में ही आठ कोस दूर गंगाजी में पैदल स्नान करने जाते। लौटते लौटते दस और कभी – कभी तो ग्यारह बज जाते। वापिस आ साथ लाये गंगाजल से शिव का जलाभिषेक करते। फिर प्रसादी तैयार होती।तब आहार ग्रहण करते। तब तक जल भी नहीं। आँधी हो या तूफान यह नियम कभी नहीं टूटा। 

पर एक दिन बाबा से उठा ही नहीं गया। दो दिन से बुखार था लेकिन नित्यक्म जारी था। बाबा ने उठने की कोशिश की पर उस दिन शरीर धोखा दे गया। सुबह गयी, दोपहर गयी, शाम भी जाने को हो गयी। बाबा ने अपनी सारी शक्ति बटोरी। अपनी छड़ी और कमंडल को आदेश दिया – जाओ गंगा से मेरे शिव के लिए पानी ले आओ। गंगा को कहना, हर रोज बच्चा माँ के पास आता था, क्या आज माँ नहीं आ सकती थी। छड़ी और कमंडल चल दिए। आधे घंटे बाद आगे आगे छड़ी आ रही थी, उसके पीछे कमंडल और उसके पीछे स्वयं गंगा मैया। बाबा ने जी भर गंगा में स्नान किया। जिस रास्ते से बाबा की छड़ी गयी थी, उस दरार से ढमोला नाम का बरसाती नाला शहर के दक्षिण में बहता है। उत्तर में जिस दिशा से लौटी उधर बहती है यह पाँवधोई। बाबा के कमंडल जितना जल है इसमें इसलिए पाँव ही बुड़ते हैं।

साल में नगरपालिका दो बार इसकी सफाई कराती है। पहली बार बैसाखी से एक हफ्ता पहले क्योंकि बैसाखी पर लालदास के बाड़े का नहान होता है। शहर के, आसपास के गाँवों के लोग गंगा स्नान का पुण्य लेने आते है। छोटे मोटे खेलखिलौने वाले अपनी दुकानें सजाने आते हैं। कुम्हार मिट्टी से कबूतर, मोर, राजा,रानी,चक्की और भी न जाने क्या क्या बना कर लाते है इस मेले के लिए। पूरा दिन खूब धूमधाम रहती है। सो निगम वाले भी सफाई कर के थोड़ा सा पुण्य लाभ ले लेते हैं।

दूसरी बार यह सफाई होती है असौज की रामलीला के पहले। केवटलीला यहीं जो संपन्न होती है। बनवास लीला के बाद रामलीला भवन में रामलला की आरती होती है फिर राम, सीता और लक्ष्मण रथ पर सवार होते हैं। बैंडबाजों के साथ शहर के मुख्य बाजारों से होता हुआ रथ पाँवधोई के घाट भूतेश्वर मंदिर पर पहुँचता है। वहाँ साफ सुथरी पाँवधोई में सजी सँवरी नाव खड़ी होती है। रथ से उतर कर राम, लक्ष्मण और सीता नाव की ओर बढते हैं। सड़क के दोनों ओर खड़ी भीड़ जयकार कर उठती है, सियापति रामचंद्र की जय। राम के हाथ में माईक थमा दिया गया है। राम करुण स्वर में गुहार लगाते हैं – सुनो हो केवट भइया जल्दी लगा दो गंगा पार।

केवट जल्दी जल्दी से अपने डायलाग बोलता है। भीड़ साँस रोके खड़ी सुन रही है। अब केवट परात में पानी ले आया है। पैर धोये जा रहे हैं। केवट के बाद मैनेजमैंट के सदस्य बारी बारी से चरण पखार रहै हैं। आरती होती है। केवट कंधे पर उठा कर राम और सीता को नौका में रखी मैरेज पैलेस वाली कुरंसियों पर पधरा देता है। लक्ष्मण खुद चल कर आता है और राम सीता की कुर्सियाँ पकड़ उन के पीछे खड़ा हो गया है। कीर्तनिए अभी गा रहे हैं – सुनो मेरे रघुराई लिए बिना उतराई कैसे ..। तब तक नाव में लगी रस्सी पकड़ शहर के धनी मानी घुटनों घुटनों पानी में उतर गये हैं। रस्सी के सहारे नौका धीरे धीरे आगे बढती है। कुछ कदम दूर आगे रथ फिर खड़ा है। राम लक्ष्मण और सीता जयजयकार के बीच दोबारा रथ पर बैठ गये हैं। रथ कुछ देर बाद आँखों से ओझल हो जाता है तो भीड़ आगे बढती है, जल से अपने ऊपर छीटा देती है,आचमन कर मुक्ति के सपने देखती है। और प्रसन्नचित्त घर लौट जाती है। इन दोनों अवसरों के छोड़ कर यह पाँवधोई शहर की पापधोई बन कर सारा साल पूरे शहर का मैला ढोती है। सारे शहर का गटर, नाले, नालियाँ इसी में समाते हैं।

 अगर यह पाँवधोई न होती तो पूरा शहर कचरे का बड़ा सा डिब्बा नजर आता - क़ृष्ण ने मन ही मन सोचा। वह अपनी दुकान संभालने बेहटरोड चल पड़ा है। हल्की हल्की बूँदे अभी भी पड़ रही हैं पर लोग जमे हुए हैं वहीं पाँवधोई के तट पर। एकटक देखे जा रहे हैं पानी की रफ्तार। बीच धारा में अचानक किसी के घर का सामान डूबता उतराता गुजरता है। लोग सहम कर डर के मारे हाथ जोड़ लेते हैं। बीच बीच में खबरों का आदान प्रदान भी चल रहा है। 

“ मोरगंज तो सारा डूब गिया। सारी आढत में इ पानी भर गिया।

“ इब्ब सारा गेहूं, चावल बरबाद हो जावेगा “।

“ दालमंडी वाले पुल में भी पानी पानी हो गया “।

“ लाला गिरधारी ने दुकान पै जाकर देखा। शटर के नीचे से गुड़ और शक्कर शरबत बन के बह रहे थे। लाला तो चक्कर खाके गिर गिआ। सुना हारट अटैक था “। 

“ नक्खासा बजार में भी पानी पानी है “।

“ सुनी है, जे बलि लिए बिना नी जाती। पक्का बलि होती है, मेरे दादा बतावै थे “।

“ इसै नारियल भी तो चढाया करैं ”।

“ सही कहवै तू, चढै तो सही “।

बीस मिनट में ही कहीं से दो रेहड़ी पर नारियल आ गये । साथ ही रामरती मनिहारन भी अपनी टोकरी में बिंदी, टिकुली, सेनुर और चूड़ी सजाए पहुँच गयी है। सुहागनें पति और बच्चों की दुआ माँगती सूप भर चार चूड़ी,सिंदुर, बिंदी, काजल खरीद रही हैं। जिसके पास पैसे नहीं हैं, घाट की दुकान वाले खन्ना अंकल अपनी कापी में लिख लिख के सामान दिलवा रहे हैं। धरम का मामला है। शाम को पैसे पहुँच जाएँगे। न पहुँचे तो हर दिन के पाँच रुपये ब्याज। 

 औरतें बच्चों के सिर पर से पाँच बार घुमा के नदी में नारियल सिरा रही हैं। जिनके साथ बच्चे नहीं हैं,उन्होने अपने ही सिर के ऊपर से नारियल फेर के नदी में बहा दिया है।

 “ हे गंगा मइया सावन में आई हो। बोहत हो ली। खुशी खुशी जाओ अब “। 

थोड़ी सी देर में धारा में कई नारियल, फूल, चूड़ियाँ तैरते नजर आने लगे हैं।

सुबह के चार बजे से अब दिन के बारह बजने वाले हैं पर भीड़ ज्यों की त्यों है। भूख प्यास भुला इस समय सब पाँवधोई की लीला देखने में व्यस्त हैं।

इसी भीड़ में शंकर खड़ा है। सामने स्कूल की वरदी में सजी दो चोटियाँ झुलाती तीन लड़कियाँ खड़ी हैं। पीठ पर भारी भरकम स्कूल बैग टँगा है पर उन्हें जैसे कोई परवाह ही नहीं .। बात बेबात ताली बजा कर हँसती खिलखिलाती जाती हैं। शंकर को पानी दिखाई नहीं देता। नदी का उफान भी नहीं। न ही लोगों के चेहरे पर चिपकी चिंता। दिख रहा है बस हँसी का कलकल करता झरना जो लगातार बह रहा है। रुकने का नाम ही नहीं ले रहा। गोरी लड़की हँसते हँसते टमाटर जैसी लाल हो जाती है। उसे लगता है पाँवधोई की बाढ से शायद वह बच जाए पर इस बहाव से बचना नामुमकिन है। बह गौर से देखता है। यह जो ज्यादा ही चुलबुली है, यह अपनी गली के समीर की बहन जैसी लग रही है। शायद वही या कोई और। वह अनिश्चय की स्थिति में है। सोच ही रहा है कि उसके कान अपनी ही आवाज से चौंक गये हैं।  

“ ए छुटकी तू आज स्कूल नहीं गयी “।

आवाज सुन वे तीनों घूम गयी है चुलबुली के साथ साथ गोरी भी – “ गये थे भैया जी पर सारे मटियामहल में तो पानी भरा है। बड़ी दीदी ने छुट्टी कर दी। रेनीडे हो गया आज “।

अब आगे क्या बोले, उसे समझ नहीं आता। एक बार तो डर भी गया अगर इन्होने मुझ से यही सवाल पूछ लिया तो। पर उसका डर अकारण निकला। वे फिर से अपनी बातों में मस्त हो गयी हैं। वह अकबका कर इधर उधर देखता है। किसी ने कुछ देखा सुना तो नहीं। पर किसी को उसे देखने की फुर्सत नहीं। एक ठंडी साँस ले के वह निश्चित हो गया है। अचानक उसके हाथ पैंट की जेब में चले गये। जेब में पाकेटमनी के रुपयों में से पचास रुपये अभी पड़े हैं। उधर पानी है कि पुल को छूने लगा है। कोई कोई लहर पुल के ऊपर भी आ जाती है। दो चार शरारती लड़के पुल के ऊपर वाले पानी पर छपक छपक करते दौड़ पड़े । लोगों के झुंड ने चिल्ला कर उन्हें रोकना चाहा, तब तक वे पुल पार कर गये। लड़के अपनी जीत पर प्रसन्न हैं। उनका हौसला बढ गया है। वे फिर से इधर के लिए दौड़ पड़े हैं। ये उनके लिए खेल हैं। लोगों का विरोध फीका पड़ गया है पर उनके माथे की लकीरे गहरा गयी हैं। औरतें आतुर हो उठी है। लड़कियों की हँसी पर भी विराम लग गया है। वह लपक कर तीन पुड़िया दाल - मोठ ले आया । एक अपने पास रख दो पुड़िया उन लड़कियों की ओर बढा दी। उसके आश्चर्य को बढाते हुए उन्होने पुड़ियाँ पकड़ ली और खाना शुरु कर दिया। वह भी खाने लगा है। अबोला ज्यों का त्यों है।

तभी वातावरण को चीरती एक चित्कार हवा में गूँज उठी है। पुल पर दौड़ते लड़को में से एक शायद अपना वेग नहीं सँभाल पाया या किसी साथी का धक्का लग गया और वह नदी की उफनती लहरों में समा गया । जब तक कोई कुछ समझ पाता, वह आँखों से ओझल हो गया। हवा आहों और सिसकियों से बोझिल हो गयी है। पीछे वालों को कुछ दिखा नहीं तो आगे वालों से बार बार पूछ रहे हैं। “ भई का हुआ। का हुआ। हमऊ तौ बताओ। पर कोई कुछ बताने की स्थिति में कहाँ है।

घाट के दोनों किनारों पर बोलते बतियाते लोग स्तब्ध हो गये हैं। हर तरफ सन्नाटा छा गया है। कोई किसी से बात नहीं कर रहा। लोग उचक उचक कर देख रहे हैं, शायद उस बच्चे का कोई निशान मिल जाए।

अचानक एक ठंडी साँस भर किसी ने कहा  

“ बड़े सही कहते थे न। ये पाँवधोई जब आती है तब एक बलि अवश्य लेती है। ले ली न बलि “। 

 लोगों ने इधर उधर देखा। किसने कहा .? किसने ? कारण जो भी रहा हो पर अब का यही सच था। बेचारा लड़का डूब गया। लोग गमजदा हो गये। बेचारे बच्चे ने शहर को पाँवधोई के प्रकोप से बचाने के लिए अपनी बलि दे दी थी। लोगों ने मान लिया कि बलि हो चुकी। इस बलि को लेने के बाद गंगा मैया शांत हो लौट जाएँगी। पानी अब कुछ घंटे और है। उसके बाद सब ठीक हो जाएगा।

 लटके हुए उदास चेहरे लिए सब लोग घरों को लौट पड़े हैं। पत्नियों ने अपनी काँच की चूड़ियाँ और मोँओ ने अपने बच्चे अपने आँचल में छिपा लिए। अनदेखे ईश्वर से सबकी रक्षा करने की प्रार्थना भी कर ली।

दुकानोंवाले ऊपर से शांत दिख रहे थे पर मन ही मन हुए नुकसान का हिसाब लगा रहे हैं। इंशयोरैंस वाले को क्या हिसाब दिखाना है, उसके क्यास लगाये जा रहे हैं। 

 कृष्ण की दुकान ऊँची जगह बनी थी इसलिए नुकसान नहीं हुआ पर उसने भी लंबी सी लिस्ट बना ली है। मुआवजे का एसटीमेट लेने वकील के पास जा रहा है ताकि समय रहते एप्लाई कर सके। जो पीछे रह गया, उसे कुछ नहीं मिलने वाला। कृष्ण जैसे सैंकड़ों लोग इस जुगाड़ में लग गये हैं। एक दो लाख मिल जाए तो दुकान में सामान बढा लिया जा सकता है।

  शंकर अभी तक पाँवधोई की धारा देखने में ही खोया हुआ था। पानी उस लड़के को अपने भीतर छिपा शरारत से मुस्कुरा रहा था। उछलती लहरें पहले से शांत दिख रही थी। उसने डबडबायी आँखों से पीछे मुड़ कर देखा। उसका दिल धक से रह गया। लड़कियाँ वहाँ से जा चुकी थी। उफ उसने तो उनका नाम तक नहीं पूछा। एक प्रेम कहानी का ऐसा अंत होता है क्या। 

मन में बहुत कुछ घुमड़ रहा है। हाहाकार जैसा। बिल्कुल वैसा जैसा इस समय पाँवधोई में हो रहा है। आँखों में आँसू टपकने को तैयार हैं। 

बाढ में बहुत कुछ बह जाता है। फिर से नये जीवट के साथ पुनरनिर्माण होता है। लोग घरों की ओर लौट रहे थे। घर जहाँ जीवन है। उसी जीवन की ओर।

धीरे धीरे पैर घिसटकर चलता हुआ वह भी लौटने वालों की भीड़ का हिस्सा हो गया है।


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