और अम्मा की ठंड बाऊजी?
और अम्मा की ठंड बाऊजी?
"बहुत ठंड है लाली की अम्मा एक कप चाय पिला दो जरा आप भी बना लेना उसी में अपने लिऐ आपकी ठंड थोड़ी कम हो जायेगी "
लाली के बाऊजी देवीदास ने अपने विस्तार पर बैठे - बैठे ही अपने चारों ओर लपेटी रजाई को थोड़ा और अपने से लपेटते हुऐ कहा तो अभी-अभी अपनी रसोई के काम खत्मकर रजाई में दुबकने की आस लिऐ लाली की अम्मा शीला एक बुझी सी नजर से रजाई की ओर देखकर लंबी आह और बर्फ से ठंडे अपने हाथों को अपने सॉल के अंदर छुपाते हुऐ वापिस रसोई में चाय बनाने को चली गईं।
देवीदास जी एक छोटे से गांव में स्कूल टीचर हैं और उनकी पत्नी शीला जी घर संभालती है उनके दो बच्चे जो शादी के बीस साल बाद हुए थे अब बड़े हो गये हैं। लाली और निहाल शहर के कॉलेज में पढ़ाई करते हैं।देवीदास जी का नाम तो देवीदास है पर वो खुदको देवी का दास नहीं राजा समझते हैं।घर के किसी भी काम को हाथ लगाना बचपन से उनकी आदत में नहीं है।सेवा करवाने की आदत इस कदर कि उन्हे नहाने से पहले उनके बाथरूम में तौलिया भी शीला या कोई बच्चा टांगता ।नहाने के बाद तेल कंघा कपड़े सब हाथों में चाहिये।
गुस्सा इतना कि बिना चिल्लाए शीला जी को बातें सुनाये बिना शायद ही कोई दिन गुजरता हो। उन्हें मुस्कराते हुऐ आज तक किसी ने नहीं देखा यहां तक कि वो अपने बेटे से भी कभी मुस्करा कर बात नहीं करते।अगर उनसे कोई कुछ बोल पाता है तो वो है उनकी बेटी लाली क्योंकि एक तो लाली घर में सबसे छोटी है दूसरा उनका लगाव लाली से कुछ ज्यादा ही है।
उनके चाय पीने का शौक जो न तो मई जून की चुभती जलती गर्मी देखता है न ही दिसंबर जनवरी की कड़कड़ाती ठंड।
जब मन होता है देवीदास जी ऑर्डर फरमा देते हैं बेचारी शीला जी बीस साल तक बच्चे न होने और उस बीच देवीदास के दूसरी शादी न करने के बोझ से दबी उनके गुस्से के डर से बिना किसी शिकायत के उनके काम करतीं रहतीं। अभी शीला जी चाय बनाने गईं ही थी कि दरवाजे पर दस्तक हुई तो देवी दास जी ने दरवाजा पास में होने के बावजूद रजाई से निकलने के आलस की वजह से शीला जी को आवाज दी.....
"लाली की अम्मा देखो जरा दरवाजे पर कौन हैं?"
शीला जी ने दरवाजा खोला तो सामने लाली को देखकर खुश होते हुऐ बोलीं....
"अरे बिटिया तुम इतनी रात को अकेली अंदर आओ जल्दी अंदर आओ बहुत ठंड है न बाहर।आने से पहले बता देती तो तेरे बाबा बस अड्डे आ जाते तुझे लेने।,,
एक साथ इतने सवाल और सुझाव सुनकर लाली अपनी हथेलियों को रगड़ते हुऐ अंदर आते हुऐ बोली.....
"अरे अम्मा हम तो अचानक आकर आपके चेहरे पर ये खुशी देखना चाहती थी।और अभी ज्यादा समय थोड़े ही हुआ है सिर्फ आठ बजे है पर ये दिसंबर की ठंड और घने कोहरे की वजह से यहां गांव में जल्दी सन्नाटा हो गया इसलिए ज्यादा समय लग रहा है।,,
तभी लाली को देखकर देवीदास जी खुश होते हुऐ बोले....
"अरे बिटिया आओ - आओ बहुत ठंड है बाहर ये देखो यहां तुम्हारी अम्मा की रजाई पड़ी है आकर छुप जाओ इसमें।ये लाली की अम्मा उसी चाय में चाय जरा और बढ़ा लो लाली के लिऐ ठंडा गई होगी हमाई बिटिया।,,
"अम्मा इस समय इतनी ठंड में चाय बना रहीं थीं बाऊजी"?
लाली ने देवीदास की तरफ देखते हुऐ पूंछा
"हां बिटिया वो ठंड ज्यादा थी ना तो हमने सोचा चाय पियेंगे तो शरीर में थोड़ी गर्मी आ जायेगी। इसलिये बनवाई थी चाय अब तुम भी आ गई हो तो तुम भी पियो देखना चाय पीते ही तुम्हारी ठंड भी गायब हो जायेगी।,,
"और अम्मा की ठंड बाऊजी?"
"मतलब?"
बाऊजी आप कितनी देर से इस रजाई में बैठे हैं?पहले सवाल का मतलब समझने की जगह लाली ने बाऊजी से दूसरा सवाल पूंछ लिया तो वो कुछ क्षण सोचते हुऐ बोले...
"हूं,,,,,,यही कोई साढ़े छः बजे से मैंने तो खाना भी यहीं रजाई मैं बैठकर खाया है।,,
"यानि आप शाम से ही ठंड की वजह से इस रजाई में दुबके बैठें हैं और अम्मा इतनी ठंड में खाना बना और सारा काम खत्म करके जैसे ही आईं आपने उन्हे चाय बनाने वापिस रसोई में भेज दिया।क्या उनके लिऐ ठंड नहीं है?क्या उनके लिऐ दिसंबर की ठंड और ये कोहरा जून की गर्मी में ठंडी हवा बन जाता है?"
लाली अपने बाऊजी से थोड़ा गुस्से में बोली तो देवीदास जी खिसयाते हुऐ बोले.....
"अरे ठंड ज्यादा है तभी तो तुम्हारी अम्मा को हमारे साथ अपने लिऐ भी चाय बनाने को बोला था ताकि गरम गरम चाय पीकर उनकी ठंड थोड़ी कम हो जाये।"
"अच्छा और फिर उसके बाद बर्फ से ठंडे पानी से चाय के बर्तन धोने से अम्मा को कौन सी गर्माहट मिलने वाली थी बाऊजी?कितना अच्छा होता कि आप अम्मा को ठंड से बचाने के लिऐ अपने लिऐ चाय न बनवाते उल्टा उनके साथ काम में थोड़ा हाथ बटाकर उन्हे भी जल्दी रजाई में बैठने का मौका देते।,,
ये कहते-कहते लाली की आंखों में आसूं आ गए जिन्हे पोंछते हुऐ लाली फिर बोली......
"बाऊजी आपको नहीं लगता कि सिर्फ आप ही नहीं अम्मा भी बुड्ढी हो गईं हैं?जितनी ज्यादा ठंड अब आपको लगती है उन्हे भी लगती होगी ? जैसे अब आप थक जाते है वो भी थक जाती हाेगीं ? बाऊजी आपने पूरी जिंदगी अम्मा की केयर नहीं की कम से कम अब कर लीजिए वरना आप खुद ही सोचो कि भगवान न करे अगर अम्मा को कुछ हो गया तो आपका क्या होगा क्योंकि आप तो अम्मा के बिना आधा घंटा भी नहीं गुजार पाते बताईए उनके बिना आप जिंदगी कैसे गुजारेंगे?,,
लाली की बातें सुनकर देवीदास जी कुछ बोल ही नहीं पा रहे थे क्योंकि उन्होंने शीला को कभी अपने बराबरी का माना ही नहीं था जो वो उनके साथ काम करते या उनके बारे में सोचते।उन्हे तो शीला उनके इशारों पर नाचने वाली कठपुतली भर लगतीं थी।उन्हे किसी बात का बुरा लगता होगा उन्हे गर्मी सर्दी भी लगती होगी इस बात का तो उन्हे एहसास तक नहीं था।उन्होंने तो बस नदी के दो किनारों की तरह जिन्दगी गुजार दी थी।जो साथ तो चलते हैं पर कभी मिलते नहीं हैं।
देवीदास को सोचता देख लाली फिर एक बार बोली....
"मेरी बात पर गौर करना बाऊजी शायद अम्मा के साथ-साथ आपकी आगे की जिंदगी में थोड़ी खुशी और थोड़ी मुस्कान आ जाये,,?
और देवीदास को सोचता छोड़ वो अपनी अम्मा के पास चली गई उनकी मदद करने।
