अराजक सपने

अराजक सपने

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"मुग्धा ! उठो।" फ्लैट के भीतर दाखिल होती हुई श्रुति की करारी आवाज ने मुग्धा को नींद से जगा दिया। आंखें खुली फिर बंद हो गई, पूरा मनो-मस्तिष्क मानो पुनः उसी स्वप्न में वापस जाना चाहता था, बाकी देह जैसे अब भी नींद से बेसुध थी।

आज का दिन- 'शुक्रवार' अर्थात आज की शाम नौकरी पेशा वालों के लिए एक तरह से 'सुख का द्वार', सप्ताह के पाँच दिन अपनी खोल रूपी नौकरी में बंद लोग अपने कार्मिक लक्ष्यों और चुनौतियों से जूझने के बाद अपने खोल से मुक्त हो गए से लगते हैं। जीवन के दो उन्मुक्त दिनों को पूरी तरह से लपकने को तैयार लोग। कारपोरेट ऑफिस में अच्छी साख बना चुकी मुग्धा तीसरे पहर ऑफिस से आने के बाद सोफे पर ही फैल गई, और थकन ने कब उसे नींद के हवाले कर दिया वो जान ही ना पाई। मुग्धा की नींद तो भंग हो चुकी थी पर बंद नेत्रों से वह उसी सपने को याद को कर रही थी जो नींद में उसका चित्रपट बना हुआ था। आज 'वह' सपने में दिखा था फिर से, पर पहले से भिन्न रूप में। सपने में उसकी छवि बिल्कुल स्पष्ट थी, पर दुख और असंतोष से भरा हुआ 'उसका चेहरा' पहली बार मानो मुग्धा से शर्मिंदा सा लग रहा था।

तभी मां और बहन दिखाई देती हैं। मोलिमा दीदी चिंतित स्वरों में मुग्धा से कहती हैं- "अरे देखो ! ये तो घर के सामने रहने आ गया। अब तुम पढ़ोगी कैसे? इस पर मुग्धा दृढ़ भाव से कहती है, "आप लोग चिंता मत करें, 'वह' सामने हो या पीठ पीछे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता, मैंने पढ़ने का निश्चय किया है और कोई भी शक्ति मेरे निश्चय से मुझे अडिग नहीं कर सकती, मुझे पढ़ना है बस।" इतने में ही श्रुति की निर्मम वाणी ने उसे स्वप्न के अगले दृश्य में जाने से रोक दिया।हमें सपने भी जाने क्यों आते हैं? ईश्वर ने यह कैसा मायावी स्वप्नलोक बनाया है जिस पर हमारा कोई नियंत्रण ही नहीं। बेलगाम सपने हमें नींद में भी बोर नहीं होने देते और हमें इस बात का भान कराते रहते हैं कि निद्रा मृत्यु तो नही है पर अचेतना की अवस्था में भी 'चेतना रहित' नहीं है। निद्रा पार का का यह सिनेमा चाहा-अनचाहा जाने क्या-क्या दिखाता है। मुग्धा 'उसे' पहले भी स्वप्न में कई बार देख चुकी थी पर हर बार परिस्थितियां एक जैसी रहती, जैसे कि 'वह' मुग्धा से बिल्कुल अनजान-अपरिचित हो, मुग्धा से 'उसे' कोई राग-द्वेष ही ना हो पर मुग्धा अपने सभी आत्मानुरागों को उसके समक्ष प्रस्तुत करते न थकती, परन्तु मुग्धा के प्रेम निवेदन को अनसुना करवा 'वह' अपने सपाट चेहरे के साथ निस्पंद-रहित भावों से आगे बढ़ जाता।

ऐसे अराजक सपने मुग्धा के सूखे घाव की पपड़ी उधेड़ देते थे। हालांकि थक-हार करते टेसुए बहाना मुग्धा की शान के खिलाफ था तथापि थी तो वह एक इंसान ही अपने भावों को कब तक निर्द्वंद रख पाती। मन अपने खुफिया सुराख से अतीत में झांकने ही लगता था।

राज्य सिविल सेवा की लिखित परीक्षा पास कर चुकी थी मुग्धा। पूरी उर्जा के साथ मेघावी मुग्धा साक्षात्कार के लिए तैयार थी। बहन-बहनोई दोनों प्रतिष्ठित संस्थान में इंजीनियर थे, अब सिविल सेवा की परीक्षा उत्तीर्ण कर मुग्धा को पिता का सपना साकार करना था। एक ओर उम्दा तालीम और दूसरी ओर मुग्धा की 'रूहानी प्रेम कहानी'। हाँ मुग्धा के व्यक्तित्व का दूसरा पहलू यह भी था।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में वाणिज्य संकाय का यानी कॉमर्स का वह छात्र जिसके साथ आने वाले भविष्य के मानचित्र का पूरा रंग संयोजन मुग्धा कर चुकी थी। विद्यार्थी जीवन की समाप्ति के बाद कैरियर और परिवार जैसे दोनों बिंदुओं का अग्रिम ड्रीम प्रोजेक्ट वे दोनों बना चुके थे। कुछ माह पूर्व ही बैंक अधिकारी के रूप में चयनित होकर 'वह' परिवार के साथ कानपुर रहने लगा था।

विधि के अंधड़ों से अनजान, बेफिक्री से जिए जा रही थी मुग्धा। उसके सिविल सेवा के इंटरव्यू के हफ्ते भर पहले एक ऐसा जलजला आया जिसकी कोई भी आशंका मुग्धा को ना थी। 'उसकी' सगाई की खबर ने मुग्धा के पूरे के अस्तित्व को हिला कर रख दिया; वह भरोसा ही ना कर पाई कि 'वह' ऐसा करेगा। फिर दृढ़ निश्चयी मुग्धा ने 'उसके' घर कानपुर जाने का फैसला किया ताकि अपने सपने को बचा पाए। उसके घर जाकर परिवार से क्या कहा?क्या सुना? अब तो कुछ याद नहीं रह गया पर 'उसने' क्या किया? सामान्य सी दोस्ती बताकर घर वालों के मुंह पर साफ इनकार कर गया, झूठी बना दिया मुग्धा को। मुग्धा का पोर-पोर पत्थर हो गया। बस आंखें और कान अपनी ड्यूटी कर रहे थे। 'उसने' मुग्धा से बात करते हुए कौन सा फार्मूला अपनाया, "मैंने सारी कोशिशें कर ली, घरवाले नहीं माने, सब-लोग प्रेम विवाह के सख्त विरुद्ध हैं, मेरी दशा तुमसे बेहतर नहीं है, पर क्या करूं परिवार के सामने मजबूर हूं। नहीं हो पाएगा मुग्धा!" और अपने घर से बाहर चला गया उसे वहीं अकेली छोड़कर।

सिविल सेवा परीक्षा के इंटरव्यू बोर्ड के सामने बैठी थी मुग्धा। "मिस मुग्धा! लिखित परीक्षा में आप का रिकॉर्ड तो नायाब है, पर व्यक्तित्व परीक्षण में आप हमें निराश कर रही हैं।" बोर्ड मेंबर की ध्वनि उसके कानों से टकराई। क्या जवाब देती मुग्धा? पूरा वजूद गुबार से भरा था, सारा भूगोल इलाहाबाद से कानपुर तक सिमट गया और सारा इतिहास उसकी प्रेम -कहानी की आदि-इति में घूम रहा था।

'उसके' घर में मुग्धा बवंडर छोड़कर बाहर निकल रही थी, और पीठ पीछे अनेकों संवाद कानों में नाद कर रहे थे। "निर्लज्जबेहया यह है 21वीं सदी की स्मार्ट जनरेशनशादी का हक जताने जताने इलाहाबाद से कानपुर चली आई। और जाने कैसे संवाद।शुक्रिया स्मृति विलोपन का। मुग्धा इंटरव्यू बोर्ड का सामना कर ही नहीं पाई। उसका क्षोभ, उसकी पीड़ा और ठुकराए जाने का दंश उसकी सभी इंद्रियों पर समान रूप से आच्छादित हो रहे थे रहे थे। रुदन जिह्वा पर कुर्सी डाल कर बैठा था, तो आंसू निचली पलकों के गड्ढे से बाहर छलकने को हर वक्त तैयार थे। क्या करती मुग्धा ? खूंटे के बल पर ही तो बछड़ा कूदता है, यहां खूँटा खुद उखड़ गया; जीवन के पहले झटके को भी ना सह पाया, उम्र भर कैसे साथ निभाता? क्या करती मुग्धा? इतनी बुरी तरह से हारी थी कि उसे समझ में ही नहीं आ रहा था कि उसके दाव-पेंचों में कहां कमी रह गई थी। उसे पटकनी क्यों मिली?उसकी नीयत में मिलावट नहीं थी तो नियति में मिलावट कैसे हो गई? प्रेम किया था 'उससे' तो बद्दुआ भी नहीं दे सकती थी। दिल उसे बेवफा मानने को तैयार न था; कभी ईश्वर को कोसती तो कभी स्वयं को।

‌साक्षात्कार परीक्षा का जो परिणाम होना था वही हुआ। माता-पिता निराश होने के बाद भी संबल देते, धीरज बंधाते; पर मुग्धा को खुद का कुछ अनुमान नहीं था कि किन लहरों में उठ-गिर रही थी। छः माह बाद कुछ संयत होने के बाद पिता को अपना निर्णय सुनाया था मुग्धा ने, "सिविल सेवा मेरे बस का नहीं, एमबीए करूंगी।" पिता उसकी मानसिक स्थिति से अनभिज्ञ थे, पर स्वयं की इच्छापूर्ति को संतान द्वारा नकारे जाने का स्वेद उनके ललाट पर उभर आया बहन का हवाला दिया, "मोलिमा से सीखो, इंजीनियर बनने का लक्ष्य पूर्ण करके मनचाहा जीवन व्यतीत कर रही है।" मुग्धा उन्हें कैसे बताती और क्या बताती कि अकेले उसने किन झंझावातों का सामना किया है, "पापा! प्लीज मुझे एमबीए करने दीजिए, मैं आपको निराश नहीं करूंगी" गला भरभरा गया और आंखों से आंसू बह निकले। इसके आगे कुछ बोल ही नहीं पाई मुग्धा। उसका अश्रुपूर्ण अनुनय पिता के हृदय को द्रवित कर गया, अपनी बेटी को इतने कमजोर आत्मबल के साथ पहली बार देख रहे थे वो। जैसी तुम्हारी मर्जी कह कर कर अनुमति दे दी थी पिता ने। उन्होंने इन सब बातों को पहली बार मिली असफलता का अपेक्षित प्रभाव समझ लिया था पर सभी रहस्यों की साझेदार मां बेटी के इस निर्णय से प्रसन्न थीं, शायद अब अपने दुख से बाहर निकल कर खुद को संभाल ले मुग्धा।

एमबीए की डिग्री के साथ शानदार सालाना वेतन वाली जॉब मुग्धा के हाथों में थी। इस्नोफीलिया का स्तर सामान्य हो चला था पर खराशें अब भी बाकी थीं, शायद स्थाई रूप से, वरना इस्नोफीलिया के मर्ज का रोगी होने का अर्थ क्या रह जाता। खैर मुग्धा उन आवेगों का क्या करती जो समय-कुसमय में अकारण उसे सालने लगते। रिश्तों की टूटन हमेशा दुखदाई होती है। मुग्धा का मन तो हुआ कि लाओ उन सखी-सहेलियों को बताऊं जो उपहास करने लगी थीं की एमबीए करके क्या कर लेगी मुग्धा और कहतीं- "मुग्धा! सिविल सर्विस तुम्हारे वश का रहा नहीं और बॉयफ़्रेंड ने चकमा दे दिया सो अलग।" उन सभी का क कलोल जैसे मुग्धा के कानों में आज भी जोर-जोर से बज रहा था। मुग्धा ने जॉब क् बारे में उन सभी को सगर्व सूचित किया था और सलाना पैकेज वाली बात थोड़ी ज्यादा तौल साथ बताई थी।

श्रुति की तीक्ष्ण वाणी फिर से गूँजी, ओहो मुग्धा ! गेट अप बेबी, पूरा वीकेंड सोती ही रहोगी क्या ?"

"हर्ज क्या है सोने में? मुझे कौन सा दोस्तों की सेवा में जाना है? मुग्धा की इस बात पर श्रुति ने उसे 'डफर' बोला और मुक्का दिखाते हुए उसके पास आई फिर उसकी पीठ पर हल्का सा जमाते हुए उसके ऊपर झूलने लगी। इस खुशनुमा बातचीत से मुग्धा सपने की उदासीनता से बाहर आई। श्रुति सज-संवर चुकी थी, और मुग्धा से कहने लगी, "अब मैं दिल्ली जा रही हूं डियर!"

श्रुति- मुग्धा की सहचरी अर्थात रूममेट, निजी बैंक में कार्यरत है। सोमवार से शुक्रवार तक यह किसी स्वचालित यंत्र सी लगती है; पर शुक्रवार की शाम ऑफिस से आने के बाद जैसे इसमें जान आ जाती है। बन-ठन कर नोएडा से दिल्ली अपने पुरुष मित्र के पास चली जाती है दो दिन की आजादी कैश करने। सोमवार को अपने समय-सारणी के अनुसार पुनः श्रुति यंत्रवत हो जाती है। यह श्रुति ही क्योंआज हजारों श्रुतियाँ इसी नक्शे-कदम पर चल रही हैं। स्वतंत्रता में स्वच्छंदता की कौन सी नई परिभाषा गढ़ रही हैं यह लड़कियां? यही है मेरी पीढ़ी- उच्च शिक्षित, आत्मनिर्भर, अत्यंत आधुनिक और फैशनपरस्त। देश की आजादी को सबसे बेहतर तरीके से आत्मसात किया है मेरी इस पीढ़ी ने। मुग्धा ने श्रुति से एक परंपरागत सवाल किया, "श्रुति! एक बात बता, तुझे अपने संबंध के टूटने का डर नहीं लगता मसलन तेरे दोस्त के साथ तेरी यह अंतरंगता यदि शादी के अंजाम तक नहीं पहुंची तो?"

" तो क्या तेरी तरफ गुलदान लेकर नही घुमूंगी।" श्रुति ने मुग्धा की बात को काटते हुए प्रतिवाद किया। एक किस्से के साथ इंसान खत्म नहीं होता, फिर नए किस्से गढ़े जा सकते हैं। मेरा फंडा तो बिल्कुल सीधा है; और रही मेरे दोस्त की बात तो मेरे लिए वह जमाने से लड़ने की ताकत रखता है, काठ का उल्लू नहीं चुना मैंने और सुन! मुझे छोड़ने की उसने सोचा भी ना तो उसका बैंड बजाने में मुझे बिल्कुल समय नहीं लगेगा। सोशल मीडिया पर अपनी कहानी जो सबूतों के साथ वायरल करूंगी कि छठी का दूध याद आ जाएगा महाशय को।" मुग्धा फैली आंखों से उसकी बातें सुनती ही रह गई फिर श्रुति के सामने हथियार डालते हुए बोली हुए,"देवी क्षमा करें, मुग्धा आप से हारी देवी!" मुग्धा की चुहल पर श्रुति अभिमान से मुस्कुरा कर बोली, "चल मेरा मूड मत खराब कर, जा रही हूं अब।" फिर नए जमाने के अंग्रेजी जुमलों के साथ श्रुति ने विदा लिया।

"उफ़ ! अमेरिका के आयातित वस्तुओं के साथ यह संस्कृति भी हमारे देश में बड़ी लुभावनी और लोकप्रिय हो रही है- 'लिव-इन रिलेशनशिप'। यदि मैं भी अपने संबंध में इतनी ही समर्पित होती इस बात की क्या गारंटी थी कि 'वह' मुझे धोखा ना देता। अपना सब कुछ लुटा देने के बाद, धोखा खाकर मेरे जितने टुकड़े होते उन टुकड़ों को क्या मैं संभाल पाती? मेरी और श्रुति की सोच के साथ परिस्थितियां भी अलग हैं, शायद ये अपनी-अपनी किस्मत है, मैं श्रुति की तरह अपने प्यार पर इतना बेलौस दावा नहीं कर सकी।" मुग्धा फिर सोच में मगन होने लगी। इसी बीच सोशल मीडिया के एक पोस्ट पर वो हैरान हो गई। इस पोस्ट का विषय था- संबंध विच्छेद के पश्चात पुरुष और महिला के मानसिक स्तर का चित्रण। पहले हफ्ते में पुरुष खुश और महिला रोती-बिलखती दूसरे हफ्ते में पुरुष दुखी और महिला सामान्य होती हुईऔर तीसरे हफ्ते में पुरुष शराब के नशे में डूबा हुआ और महिला बाहे फैलाएं खुशी से जीवन का फिर से स्वागत करने को तैयार हो चली थी।

 हल्की हो गई थी मुग्धा उसके सपने भी तो उसे इसी क्रम में दिखते रहे हैं। आज बहुत सारे सवाल मुग्धा के सामने हल होते से जान पड़े। अब मुग्धा सहज हो चली थी। मुग्धा को अपना सप्ताहांत बिताने के लिए किसी पुरुष कंधे की फिलहाल आवश्यकता नहीं थी।

 कला दीर्घाओं, पुस्तकालयों और मोलिमा दीदी के बच्चों के साथ ये दो दिन मुग्धा को कम से लगते और मुग्धा के नींद वाले सपने वो तो हैं ही अराजक, इन पर मुग्धा का कोई नियंत्रण नहीं।


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