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अनजान डर

अनजान डर

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अर्चना तेज़ क़दमों से अपने होस्टल की ओर बढ़ रही थी। रात के पौने आठ बज रहे थे। हालांकि सड़कों पर चहल-पहल थी। पर जब सुबह के उजाले में डर सताता रहता है, तो फिर अंधेरे में और भी मन में एक अजीब-सा डर समाया हुआ था।

होस्टल की गली में पहुँच कर दिल और दहल उठा। धड़कन और भी तेज़ हो गई, गली में घुप अंधेरा था, किसी-किसी घर से आती रोशनी ही बस दिख रही थी। कुत्तों की भोंकने की आवाज़ और होस्टल के आसपास मंडराते वहशी लड़के, कुत्तों को तो दुत्कारने पर वे भाग जाएंगे, पर.... आगे की बात सोचने भर से ही अर्चना का शरीर कांप उठा।

जैसे-जैसे वह आगे बढ़ी, लड़कों के शोरगुल और बातों को सुनकर, उसका कलेजा फिर कांप उठा। अपने शरीर को सिकोड़ते हुए, वह आगे बढ़ रही थी। इतने में एक लड़के ने अर्चना के हाथों को पकड़ने की कोशिश करने लगा, उन लड़कों की आँखों से हैवानियत साफ झलक रही थी। अर्चना ने अपनी हाथों को खींचने की पूरी कोशिश की, जिससे अर्चना के हाथ छिल गए और पैरों पर ज़ोर की चोट भी लगी, पर अर्चना ने बैग से ज़ोर का प्रहार किया और वहां से भाग गई।

होस्टल पहुँचने पर उसकी नज़र टीवी पर आने वाली खबर पर पड़ी। ‘महिला के साथ रेप फिर हत्या’ , ‘चार साल की बच्ची के साथ दरिंदगी’ और टीवी पर डिबेट करते लोग, अपने छिले हाथों पर वहशी पंजों के निशान देखकर अर्चना का दिल सिहर गया और आँखों से आँसू फुट पड़े। मन में बस एक ही ख्याल आया दरिंदगी चाहे, चार साल की बच्ची से हो या..चौबीस साल की लड़की से या फिर 40 साल की औरत से, दुष्कर्म तो दुष्कर्म है, फिर ऐसा विभाजित कानून क्यों? लड़कियाँ कब महफूज़ होंगी, ये कोई क्यों नहीं बताता?


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