अम्मा मेरे भैया को भेजो री
अम्मा मेरे भैया को भेजो री
"कैसी हो छोटी?"
शरद ने अनुभा से पूछा तो अनुभा डबडबाई आँखों से शरद को देखकर चुप रह गई।उसे पता था कि अगर उसने अपना मुंह खोला तो अपने आंखों के आंसूओं को बहने से नहीं रोक पाएगी और उसके रोने से उसकी साथ एकदम चिढ़ जाएगी।इसलिए किसी तरह आंखों के आंसू को आंखों के अंदर ही जब्त करके इतना ही बोल पाई...
"मैं ठीक हूँ भैया!" बोलकर अनुभा ने चाय की ट्रे शरद की तरफ बढ़ा दिया।शरद एकटक अपनी बहन के चेहरे की तरफ देख रहा था। उसे पता था कि इसकी छोटी ठीक नहीं है।
क्योंकि अनुभा इन महिनों में एकदम हड्डियों का ढांचा रह गई थी।शरद को यूँ देखता हुआ देखकर अनुभा की सास बोल पड़ी...
" शरद जी! आप इस तरह से अपनी बहन को क्यों देख रहें हैं? हम सब उसका अच्छे से ध्यान रख रहें हैं। यह तो आपकी बहन की गलती है कि वह ठीक से खाती पीती नहीं है इसलिए उसका वज़न घटता जा रहा है!"
शरद चुपचाप अनुभा को देख रहा था जो एकदम हड्डियों का ढांचा लग रही थी। उसे इस तरह से अपनी बहन को देखते हुए देखकर अनुभा की सास सुशीला जी विहंसकर बोली।
"आप ज़्यादा मत सोचिये... आपकी बहन को जानबूझकर उदास रहने की आदत है!" और...इससे पहले कि शरद कुछ कहता...अनुभा की ननद मिली भी तपाक से बोल पड़ी।
"और नहीं तो क्या...? मां सही तो कह रही हैं। भाभी को बाहर का चटपटा खाने की आदत कुछ ज्यादा ही है। घर के खाना तो उन्हें रुचता ही नहीं है। बिना तो घर का खाना अच्छा लगता है और ना ही बनाना अच्छा लगता है सारा काम में और मां मिलकर करते हैं वह तो हमेशा पलंग तोड़ती रहती है!"
अब शरद क्या कहता...? एक पल को शरद के मन में आया कि अभी तुरंत अपनी बहन को लेकर चल दे।अपनी छोटी को इन चण्डालिनों के चुंगल से निकालकर ले चले और फिर कभी वापिस ना भेजे।सीधा उसे कहे कि...
"चल छोटी ! घर चल। अब तुझे यहाँ रहने की कोई जरूरत नहीं है!"पर... अगले ही पल उसे अपनी पत्नी सुमित्रा का चेहरा याद आ गया।
वह एक तो अनुभा को पसंद नहीं करती है।ऊपर से अगर वह बिना उससे पूछे अपनी बहन को लेकर जाएगा तो सुमित्रा तो देखते ही कह देगी कि...
"इसे क्यूँ उठाकर क्यों लाए हो?"
सो..अपनी पत्नी की नाराजगी का सोच कर उसने अपना फैसला बदल दिया।और अपने चेहरे पर नकली मुस्कुराहट लाकर बोला,
"आप लोगों का बहुत बहुत धन्यवाद! आप लोगों ने मेरी बहन का बहुत अच्छे से ध्यान रखा है और अगर अनुभा से कोई गलती हो गई हो तो माफ कर दे दीजिएगा!"
अपने भैया की बात सुनकर अनुभा ने चौंककर शरद को देखा।
" यह क्या कह रहे हैं छोटे भैया?क्या इन्हें दिखाई नहीं देता कि ये लोग मुझ पर कितना अत्याचार कर रहे हैं, और भैया इनकी तारीफ कर रहे हैं। यह ऐसा क्यों कर रहे हैं? क्या भैया को समझ नहीं आता कि उन्होंने मेरी क्या हालत कर दी है? "
यह सोचकर अनुभा ने अपने भैया के चेहरे की तरफ देखा तो शरद अपना चेहरा छुपाते हुए उससे नहीं मिला पा रहा था।और... अनुभा निरीह भाव से अपने भैया को जाते हुए देख रही थी।उसे लगा था कि उसकी यह हालत देखकर भैया इन सबको खूब खरी-खोटी सुनाएंगे और उसे अपने साथ ले जाएंगे।पर... भैया तो इन अत्याचारियों की तारीफ करके उसे दोबारा इसी नर्क में छोड़कर जा रहे थे।छलछलाती हुई आँखों से अनुभा अपने भाई को जाते हुआ देख रही थी। आंसुओं की वजह से भैया की छवि उसे धुंधली सी दिख रही थी।
वह अभी और देर तक खड़ी रहती कि पीछे से सास की कर्कश आवाज आई....
" कब तक निहारती रहोगी अपने भैया को? अब गया तेरा भैया अब चलो...घर के काफ़ी काम पड़े हैं। खाना बनाना है कि नहीं? "
अनुभा ने अपने आंसू पोछे और चाय का बर्तन समेटने लगी।
क्रमश :
