Shalinee Pankaj

Inspirational


3.0  

Shalinee Pankaj

Inspirational


अलविदा दोस्त

अलविदा दोस्त

8 mins 158 8 mins 158

आज स्कूल में नाम पुकारा गया प्रशस्ति पत्र के लिए जो सामान्य ज्ञान में अच्छे नम्बर के लिए था "रूपल मेहता"। रूपल नहीं थी सबकी नज़रें मुझपर आ टिकी इससे पहले की मेरा नाम पुकारा जाता मैं स्टेज की तरफ बढ़ गई। और मैंने बुझे मन से वो प्रशस्ति पत्र लिया रूपल मेहता यही नाम लिखा था उस नाम को पढ़ते हुए मानो रूपल मेरे सामने हो मैं धीरे धीरे कदमों से अपने स्थान की ओर बढ़ी। घर आकर स्कूल बैग ख़ाली की तभी नजर उस पत्र पर पढ़ी तो अचानक मुझे रूपल की याद आ गई। और मैं 3 साल पीछे अपने अतीत में चली गई।

जब मैं नवमी में थी तब रूपल आई मेरी पड़ोस में रहने वो अपने चाचा चाची के साथ रहती थी गाँव से थी इसलिए उसका रहन सहन से काफी अलग लगती साथ ही बहूत भूरे बाल कंधे तक और भूरी आँखे पैरो में स्पंज और हमेशा फ्राक पहनती, स्कूल में उसकी दोस्ती किसी से नहीं हो पाई मैं ही उसकी एकमात्र दोस्त थी, मुझे उसकी सादगी बहुत पसंद थी और साथ ही उसका मेरा पड़ोसी होना बहुत कम बात करती थी। जब पहली बार उसके घर गई तो सामने बैठक जहां दीवान और सुंदर सोफे सजे थे पर दीवान में गद्दा नहीं था, फिर मुझे अपने घर की याद आई दीवान में मम्मी कितना सुंदर चादर कसीदे वाली और गोल चाकोन तकिया करीने से सजे रहते थे फिर वो अपने कमरे में गई जहाँ बढ़ी बेतरतीबी से तार में कपड़े डाले थे उसके, फिर उसकी चाची जो टीवी देख रही उनको नमस्ते कही उन्होंने थोडा सर हिलाया और वापस टीवी देखने लगी, तभी मुझे मम्मी की याद आ गई वो तो मेरी सहेलियों से भी बात करती और कोई नई सहेली आई तो उसका पूरा इंटरव्यू ले लेती थी। फिर सारी सहेलियों के घर का पता नम्बर सब उनके पास रहता खैर ये तो इसके चाची है ना एक दिन मुझे रूपल जब अपने घर ले गई तब उसके चाचाजी भी थे।उनको नमस्ते की तो उन्होंने मेरे सर पे हाथ रख गॉड ब्लेस यु कहे उनके बातचीत से वो काफी तेज तर्रार और सीधे मुंह बोलने वाले लगे जैसे कोई आर्मी ऑफिसर वे डी.एफओ. थे पर उनकी बातचीत से अंदाजा हुआ की वो रूपल को कितना प्यार करते है। फिर उसके चाचाजी ने बताया की रूपल की सात बहने है और ये तीसरे नम्बर की इसकी तीन बहनों की शादी हो गई और एक घर में रहती है किसी ने पांचवी पास नहीं किये और ये भी ना पढ़ पाती पर चूँकि ये होनहार है इसकी पढ़ाई को देखते हुए मैं इसे यहां अपने साथ ले आया अगर ये अच्छे से पढ़ाई नहीं की तो इसे वापस गाँव जाना पढ़ जायेगा है की नहीं उन्होंने रूपल की तरफ देखा। रूपल बिलकुल सावधान की मुद्रा में उनके पीछे खड़ी थी और जवाब में बस मुंडी हिला दी । मुझे सब बातें सुनते थोड़ा अजीब लगा की एक हम है की घर की बातें कभी किसी से नहीं कहते हालाँकि हम भी किसी सिटी से तो ना थे और मेरे दादा दादी तो आज भी गाँव में रहते है लेकिन यहां पर तो रूपल के चाचाजी ने तो उसके संघर्ष की कहानी बता दी और साथ में ये भी उसके पापा भी नहीं चाहते थे की ये भी पढ़े किसी तरह पढ़ाई छोड़ दे, पर रूपल रोती थी ये देख उसके चाचा चाची उसे यहां ले आये ये सब सुन मुझे अपने दोस्त पर नाज हुआ और मैंने फैसला लिया की हमेशा इसकी मदद करुँगी।


मुझे मेरी दोस्त हमेशा ईमानदार और सच्ची लगती थी अगले ही साल पूरी क्लास उसके पीछे क्योंकि उसने टॉप किया पहला स्थान स्वाभाविक है उसने अपनी पहचान स्वयं बनाई। मुझे बहुत ख़ुशी हुई की उसने टॉप किया अब उसके भी बहुत सारी सहेलियाँ बन गई थी अब रूपल भी बदल गई वो चहकने लगी मुझे उसका सबसे घुलना मिलना अच्छा लगा साथ ही देखते देखते उसकी बोली भी बदली अब छत्तीसगढ़ी की जगह हिंदी बोलने लगी इंग्लिश तो अच्छी थी ही हर विषय में उसकी पकड़ थी। मेरी सब सहेलियाँ अब उसकी भी थी। मैं शुरू में अच्छी थी पढ़ाई में बाद में थोड़ी कमजोर बोर्ड परीक्षा थी हम युध्दस्तर में भीड़ गए थे तभी मेरी तबियत ख़राब हुई में 4 दिन स्कूल ना जा पाई। बहुत महत्व पूर्ण पाठ छूट गए पर मैं निश्चिंत थी पर यही मैं गलत थी।अक्सर जब वो गाँव जाती तो आने पर सीधे मुझसे कॉपी लेती पर मेरे स्कूल नहीं जाने पर उसने कोई मदद नहीं की कॉपी तो फिर ऋतू से ली फिर भी दोस्ती अपनी जगह थी धीरे धीरे रूपल दूर हो गई पर सच्चे मित्र तो कुछ एक ही होते है। पर रूपल ये समझ ना पाई तभी नवम्बर में उसके दादा जी नहीं रहे और उसे अपने गाँव जाना पढ़ गया मुझे रूपल ने कुछ ना बताया जब की मैं पड़ोस में थी बाद में पता चला रीना से थोड़ा दुःख हुआ की फिर भी मैंने कुछ ना कहा की इसमें उसकी कोई ग़लती नहीं इतनी सी बात में कोई दोस्ती थोड़े ना तोड़ दूँ। दिसम्बर में आई तब अर्धवार्षिक परीक्षा शुरू होने वाला था तब इतने दिन में वो काफी पिछड़ गयी थी जब वो स्कूल में मिली तो वो मस्त थी मुझे देख के भी अनदेखा कर दी फिर भी मैं उसके पास गयी उसके दादाजी के लिए पूछी उसका हालचाल पूछी। बढ़ी बेरुखी से जवाब दी फिर मैंने पूछा तुम्हें कोई नोट्स वगैरह तो नहीं चाहिए इस बात पर उसने मुझे कह दिया की लेना ही होगा तो किसी से भी ले लू तुम तो वैसे भी गधी हो पढ़ाई में उस दिन बहुत बुरा लगा और मैं उससे सचमुच का खी हो अब तक सिर्फ हर बार झुकते गई की वो मेरी दोस्त है और दोस्ती में थोड़े बहुत नोकझोक होते ही है, साथ ही जो उसके चाचा ने कहा की अगर पढ़ाई नहीं की तो गाँव जाना पढ़ेगा ये बात मेरे मन में बैठ गया था खैर इसकी फ़िक्र उसे होनी चाहिए थी लेकिन इस बार तो उसने मेरी बेज्जती ही कर दी इसलिए अब मैंने बिना कुछ कहे उससे दूर हो गई। वार्षिक परीक्षा का समय आया मैं अपनी पढ़ाई में व्यस्त हो गई तभी एग्जाम के कुछ दिन पहले वो मेरे घर आई मैं छत में थी वो आई दोनों हाथ पीछे किये किसी दार्शनिक की तरह बिना कुछ बोले वो टहलने लगी उसके कदम तेज हो गए ।पर अभी तक कुछ ना बोली फिर मैंने कहा क्या हुआ वो रुक गयी फिर बोली मैं इस बार अच्छे नम्बर नहीं ला पाऊँ अब मुझे डर लगने लगा है, मैंने कहा अभी समय है देर नहीं हुई तो वो बोली नहीं मेरा आत्मविश्वाश खो गया मैंने कहा मैं क्या मदद करूँ, तो उसने कहा अपने नोट्स मैंने कोई जवाब नहीं दिया 10 वि में द्वितीय श्रेणी आई और मैं प्रथम अब मुझसे काफी दूर आ गई थी उसका रिजल्ट ख़राब आने के कारण स्वार्थी मित्र भी उससे दूर हो गए इधर मैंने पढ़ाई में रफ़्तार पकड़ ली तब उसका सबके सामने कहना मेरी संगति का असर है जो तुम अच्छे नम्बर लाने लगी फिर भी मैं बुरा नहीं मानी क्योंकि ये उसकी कमजोरी थी या ताकत किसी को कुछ भी सामने ही बोल देती पर आखिर थी तो मेरी दोस्त सब भूल हम फिर से अच्छे दोस्त बन गए। पर अचानक एक दिन वो चली गई बिना कुछ बताये उसके चाचाजी का ट्रान्सफर हो गया था पर उसका क्या हुआ उसने आगे पढ़ाई की या गाँव लौट गई ???

तभी मम्मी ने आवाज़ दिया खाना खाने के लिए और मैं वर्तमान में खाना खाने के बाद इतने दिन बाद मैंने उसके घर की तरफ रूख किया

मैं उसके प्रशस्ति पत्र ले उनके मकान मालिक के यहां गई साथ ही एक चिट्ठी भी जिसमे मैंने उसके उज्जवल भविष्य की शुभकामनाये लिखी थी वो दी,  कुछ दिन बाद अंकलजी यानि उनके मकान मालिक दिखे मैंने पूछा अंकलजी आपने दे दिया ना वो बोले हाँ फिर मैंने पूछा मेरी चिट्ठी वो बोले वो भी दे दिया बेटा वो मेरा पूछने का आशय समझ गए उन्होंने बताया की तुम्हारी चिट्ठी का कोई जवाब नहीं ना लिखित ना मैखिक बस यही कहा की तुम उसकी अच्छी दोस्त और हमेशा रहोगी।

बहुत दिनों बाद एक गुमनाम चिट्ठी मिली जिसमे लिखा था "अलविदा दोस्त" मुझे समझ ना आया की ये क्यों लिखा गया है क्या मतलब इसका इसी उधेड़बुन में मैंने अंदाजा लगाया की ये रूपल का हो सकता है और जल्द ही मैं अंकलजी के घर गई उनसे रूपल के घर का पता पूछी अंकलजी ने मेरी ओर देखा और कहा अब वहां नहीं रहते, मैंने पूछा तो कहा क्या चाचाजी का ट्रांसफर हो गया उन्होंने कहा नहीं अब उसके चाचाजी नहीं रहे उनके घर के सामने ही एक बुलेरो, बोल उनके आँख से आँसू बह निकलें। मैं वापस घर की तरफ निकल गयी यकीनन अब रूपल गाँव चली गयी होगी कितनी अच्छी थी पढ़ाई में " काश "की मैं कुछ मदद कर पाती ।

मैने एमएससी की पढ़ाई की शादी हुई और दो बच्चे जिंदगी की गाड़ी इतनी रफ़्तार में बढ़ी रूपल की यादें धुँधली हो गई मैं गृहणी हूँ साथ ही जब कभी जिंदगी में कोई रूपल मिली उसकी पढ़ाई में मदद कर देती। आज बेटी के स्कूल में वर्सिकोत्सव है मैं अपने परिवार के साथ गयी। कार्यक्रम शुरू हुआ सरस्वती माँ के वंदना से फिर मुख्य अतिथि डी एस पी साहिबा को दो शब्द बोलने को कहा गया नाम नहीं सुन पाई बेटे को देख रही थी तभी बच्चों को प्रोत्साहित करते हुए कह रही थी उसकी आवाज़ पहचानी हुई लगी, गौर से देखी तो रूपल लग रही थी, पर रूपल कैसे तभी डिनर के दौरान रूपल मिली उसने बताया उसके चाचाजी के जाने के बाद उसे गाँव वापस जाना पड़ गया, बहुत निराश हो गयी थी तब उसने चिट्ठी लिखी अलविदा दोस्त कुछ समय निकलने के बाद चाची जी ने मुझे आगे पढ़ाने और चाचाजी के सपने को पूरा करने का निर्णय लिया और आज मैं डी एस पी बन गयी। तभी मैंने कहा अब मिली हो अब कभी ना कहना अलविदा दोस्त...उसने भी यही कहा अब नहीं कभी नहीं।



Rate this content
Log in

More hindi story from Shalinee Pankaj

Similar hindi story from Inspirational