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Ramashankar Roy 'शंकर केहरी'

Fantasy


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Ramashankar Roy 'शंकर केहरी'

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अकाय-पार्ट 12

अकाय-पार्ट 12

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सत्यम अपने रूम पर पहुँचा ।वहाँ ताला लटकता मिला । यदि वह अकाय सत्यम नहीं होता तो सीधा कलिया मौसी के पास जाता ।वहाँ पर माँ या चाभी दोनों में से एक मिल जाता । कलिया मौसी सत्यम की कोई सगी मौसी नहीं थी । वह मुहल्ले के बच्चे बूढ़े सबकी मौसी थी, सब लोग उसको इसी नाम से बुलाते थे। माँ से उम्र में थोड़ी बड़ी थी लेकिन उससे अच्छी बनती थी। पड़ोसन होने के चलते वह माँ के सुख-दुख में साथ खड़ी रहती थी। तभी उसको ध्यान आया कि अब तो ना माँ रही ना वह सत्यम रहा । अब उसको अंदर जाने के लिए ताला खोलने की कोई जरूरत ही नहीं है।

बिना ताला खोले वह अंदर घुसा और घुसते ही घर की हद समाप्त। शहरी व्यवस्था में इसे घर कहकर संतोष किया जाता है वैसे इसको मुर्गी का दड़बा कहना उचित होगा। 12x10 की खोली और उसी में किनारे पर एक मोरी बना है। ईंट और पटिया रखकर एक घरौंदा को किचन का शक्ल दिया हुआ है। रूम के बीचोबीच लोखंड का एक कपाट रखा है जो एक रूमनुमा घर में प्राइवेसी पार्टीशन का काम करता है। उसी से सटा बेड कम सोफा लगा हुआ है जो घर में फर्नीचर का प्रतिनिधित्व करता है। गेस्ट के आने पर उनके बैठने के लिए प्लास्टिक के चार छोटे स्टूल एक के ऊपर एक लगाकर कोने में रखे हुए हैं जिनको हमेशा किसी गेस्ट के आने का इंतजार रहता था।

घर के अंदर सब कुछ वैसा ही था जैसा वो छोड़कर गया था ।अगर कुछ नहीं था तो वो माँ थी। खोली में घुसते ही माँ की अनुपस्थिति बेचैन करने लगी और मन की आँखें गीली हो गयी।उसका मन कर रहा था माँ कहीं से प्रगट हो जाती और वह उसके गोद में सर रखकर रोते-रोते सो जाता और वो पल वहीं ठहर जाता । लेकिन न माँ थी न उसकी गोद। सत्यम माँ की साड़ी लेकर उसपर सर रखकर बहुत देर तक उसको महसूस करता रहा।


सत्यम की माँ से मिलने की इच्छा इतनी तीव्र हो गयी कि उसने यमदूत का आह्वान किया और वह प्रगट हो गए। सत्यम ने उनसे कहा मुझे माँ से मिलने का मन कर रहा है । क्या यह सम्भव है ?

यमदूत - देखो, जिस आत्मा को मैंने ट्रांसमिट किया है उसका कर्रेंट लोकेशन मैं ट्रेस कर सकता हूँ । लेकिन वह आत्मा तुम्हारे से अपने पिछले जन्म के रिश्ते को नही पहचान पाएगी। फिर भी तुम अपनी माँ की आत्मा का वर्तमान अवस्था जानना चाहते हो तो मैं बता सकता हूँ।

सत्यम - हाँ मुझे देखना है प्लीज !

यमदूत - सोंच लो , हो सकता है उस आत्मा की वर्तमान दशा अच्छी नहीं हो और तुम्हारा मन दुखी हो जाए।

सत्यम - नहीं कोई बात नहीं, मैं सब झेल लूँगा। आखिर अकाय जीवन का यह अलौकिक पहलू भी देख लूँ। आज ही स्वहंता को मिलकर आया हूँ । जहाँ भी होगी ,जैसी भी होगी वह मेरी माँ की ही आत्मा होगी। आप कृपा करके मुझे उसका दर्शन करा दें ।

यमदूत ने अपने बाह पर लगी टच स्क्रीन पर कुछ बटन दबाया । उसके बाद गाय के पेट मे एक बच्चा दिखने लगा । फिर यमदूत ने कहा तुम्हारी माँ अभी एक गाय के गर्भ में बछिया के रूप में है । उसका कुछ ही दिनों में जन्म होनेवाला है।

सत्यम - कृपा करके मुझे यह बताइए कि वो कौन गाय है जिसके पेट से मेरी माँ जन्म लेने वाली है।

यमदूत ने फिर कुछ बटन दबाया और उस गाय का कर्रेंट लोकेशन गूगल मैप की तरह दिखने लगा। यह तो एकदम नजदीक में ही बता रहा है। जब ज़ूम करके देखा तो ज्ञात हुआ कि यह गाय अभी राधा के घर मे है । इसको राधा के पिता ने हाल ही में मेले से खरीदा है।

अब सत्यम बहुत खुश हो गया कि उसको अपनी माँ की आत्मा को नए शरीर में सेवा करने का मौका मिलेगा।

सत्यम - क्या आप बता सकते हैं मेरी माँ को गाय योनि क्यों प्राप्त हुई ?

यमदूत - देखो, यह बड़ी जटिल गणना है और वह मेरे अधिकार क्षेत्र के बाहर की बात है। इतना बता सकता हूँ कि मनुष्य जीवन के बाद सबसे भाग्यशाली जन्म कुत्ता और गाय का ही माना जाता है। क्योंकि उसको मनुष्य का सानिध्य और संरक्षण प्राप्त होता है। मैंने एक ठाकुरवाड़ी में एक कुत्ता देखा था जो मांसाहार नहीं करता था और प्रत्येक एकादशी को उपवास रखता था। उस ठाकुरवाड़ी के सभी संत महात्मा को इस पर आश्चर्य होता था कि उसको कैसे ज्ञात होता है कि आज एकादशी है। जब भी आरती होती थी वह दंडवत मुद्रा में दरवाजे के बाहर बैठ जाता था। वहाँ के लोगों का मानना था कि यह पिछले जन्म की कोई दिव्यात्मा होगी।

सत्यम - आपके कार्यक्षेत्र का बँटवारा किस आधार पर होता है ? वह आधार भौगोलिक है, भाषा है, धर्म है, जाती है या कुछ और है?


यमदूत - हमारे यहाँ "कार्य सुविध सिद्धान्त" का पालन होता है। हमारे कार्य परिधि में केवल मनुष्य नहीं आता है। निर्धारित क्षेत्र के सभी सजीव हमारे हिस्से में आते हैं। उसमें पेड़ पौधे ,पशु - पक्षी , कीट-पतंग सब आते हैं। किसी के भी आने जाने पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं है। उसमें हम कोई परिवर्तन नहीं कर सकते हैं । लेकिन यहाँ के प्रत्येक एग्जिट का रिकॉर्ड हमारे पास होता है।

हमलोग भी राष्ट्र को ही इकाई मानते हैं। एक राष्ट्र एक यमदूत का सिद्धांत लागू है। लेकिन जनसंख्या वृद्धि के कारण हमको सहयोगी भी मिला हुआ है । इसके अतिरिक्त क्लोनिंग द्वारा विस्तारण और संकुचन की सुविधा भी उपलब्ध है।


सत्यम - फिर तो आपका काम बहुत बड़ा और जिम्मेदारी वाला है। मैं तो बेरोजगार ही मर गया था । इसलिए मुझे नहीं मालूम नौकरी कैसे मिलती है और नियोक्ता की क्या अपेक्षा होती है? आपका कार्यकाल कितने साल का होता है? आपके रिटायरमेंट की कोई उम्र है या नहीं ? आप यमदूत कैसे बने और उसके पहले आप क्या थे ?

 यमदूत - देखो प्रत्येक क्यों का उत्तर सम्भव नहीं होता है। किसी अन्य के बारे में उतनी ही जिज्ञासा रखो जितना तुम्हारे लिए जरूरी है और सामने वाले को निजता का हनन न लगे। किसी का कुछ भी बन जाना कभी भी उसके वश में नहीं होता है । तुम इस अवस्था में इसलिए नहीं हो क्योंकि तुम ऐसा होना चाहते थे । बल्कि तुम ऐसे हो क्योंकि तुम इस अवस्था में हो। हमारे कुछ भी होने या ना होने में कई कारक तत्व का प्रभाव और योगदान होता है।

तुम किसी भी सफल या असफल व्यक्ति से पूछना क्या तुम जो हो वही बनना चाहते थे। सम्भवतः हर एक का उत्तर ना होगा। डॉक्टर एक्टर बनना चाहता था , किसान सैनिक बनना चाहता था , सैनिक गायक बनना चाहता था - तुमको अनगिनत जीवंत और इतिहास में दफन दास्तान मिलेंगे। यह कर्मविधान का प्रतिफल होता है । तुमको जिस किसी का एकाउंट जिस रूप में बराबर करना है, करना ही पड़ेगा । चाहे जी कर करो या मर कर करो, हँस कर करो या रो कर करो। इसलिए जो भी कर्म करो पूरे मनोयोग से करो और संवेदना के साथ करो।

सत्यम - संवेदना से करो से आपका क्या मतलब है ?

यमदूत - मतलब यह है कि कार्य निष्पादन करते समय यह ध्यान रहे कि कोई भी ऐसा कृत्य ना हो जिसे अपराध की श्रेणी में रखा जाए। कर्मविधानानुसार अपराध छतीस प्रकार के होते हैं और वो तीन प्रकार से किया जाता है - मनसा, वाचा व कर्मणा !!

यदि किसी खूबसूरत लड़की को देखकर आपके अंदर यदि गलत भावना उत्पन्न होती है और अपने कोई हरकत नहीं किया । फिर भी यह एक अपराध है जो आपने मन से किया। लोक दंडविधान में यह कोई अपराध नहीं है। लेकिन कर्मविधान में यह अपराध है। यदि यह अपराध आपकी प्रवृति बन जाती है तो आप अगले जन्म में अंधापन को प्राप्त हो सकते हैं। यदि वचन से आप घोर पाप करते हैं तो अगले जन्म में आप गूंगा पैदा हो सकते हैं। जन्मजात विकलांगता पिछले जन्म के कर्मों का प्रारब्ध होता है।

एक औरत एक बड़े महात्मा के प्रवचन में रोज आती थी और सबसे अंत में जाती थी। उसकी उदासी महात्मा के संज्ञान में आ गई। एक रोज महात्मा ने उसको अपने करीब बुलाया और उसके उदासी का कारण पूछा। वह औरत रोने लगी और बोली मेरा पति मुझको बहुत मरता है। अब मैं इस जिंदगी से तंग आ चुकी हूँ। महात्मा जी ने मुस्कुराते हुए पूछा "वह तुमको खाना और कपड़ा तो देता है ना ?"

औरत ने कहा हाँ और किसी बात की कमी नहीं है लेकिन मेरी जिंदगी नरक बन गयी है ।

महात्मा ने कहा "तुम्हारे साथ वह बहुत भद्रता से पेश आ रहा है। पिछले के पिछले जन्म में तुम उसकी सौतेली माँ थी और तुम उसको बहुत मारती भी थी और भर पेट खाना भी नहीं देती थी। ऊपर से उसको खुलकर रोने भी नहीं देती थी। उस हिसाब से तो वह बहुत शालीन व्यवहार कर रहा है।"

अब सोचो कर्मविधान का दंड देने के लिए सौतेली माँ बेटा को तीन जन्म बाद पति पत्नी के रूप में मिलाना कितना जटिल काम है। उसमें कितने संयोगों का समन्वय करना पड़ा होगा। इसका एक ही उपाय है कि सोच को ही संवेदनशील बनाओ और किसी भी इंद्रिय से कोई भी ऐसा काम न करो जो इंद्रियाधीश को पसंद नहीं है।

सांसारिक दंडविधान में तो केवल उसी अपराध का दंड मिलता है जिसका प्रमाण मिलता है। लेकिन कर्मविधान में तो उस पाप का भी दंड भुगतना पड़ता है जिसको आपके अतिरिक्त किसी ने महसूस भी नहीं किया । यह संवेदना ही स्व को स्वामी से मिलाती है।

तभी यमदूत का एंटीना ब्लिंक करने लगा। उन्होंने सत्यम से कहा, अच्छा अब मैं चलता हूँ। यह ड्यूटी कॉल है। और यमदूत जी अन्तर्ध्यान हो गए।

यमदूत के प्रस्थान के बाद अपनी माँ की यादों के साथ पीछे की तरफ बढ़ते हुए बचपन तक पहुँच गया जब उसने होश संभाला था। माँ का पल्लू पकड़े , कभी उंगली पकड़े चलता था। उसको याद आया बचपन में रात को जब कभी भी उसकी नींद खुलती थी उसको खाने के लिए चाहिए और वो भी गुड़ भरी मोटी रोटी। अभी तक वह उसका पसंदीदा खाना था। वह अब याद करने लगा माँ को खाने में क्या पसंद था । कभी उसको गाय के गर्भ में पल रही बछिया का चेहरा ध्यान आता कभी माँ का । उसने यह तय किया कि जबतक मेरी बछिया माँ का जन्म नहीं होगा तबतक गाय नानी का पूरा ख्याल रखेगा।

क्रमशः -------



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