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आवेश

आवेश

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"एक बात पुंछू मेमसाब?" साडीका पल्लू सवाँरते सवाँरते कमली मालकीन से बोली.

"हूँ " चेहरे के निशान पल्लू से छुपाते, घूँघट ओढते हुये मालकीन बोली.

"ये रात दिन की झिकझिक, मारपीट से आप तंग नही आती।" कमली

"हूँ , तंग आकर भी फायदा क्या?" मालकीन सर नीचे झुकाये, कमरे मे बिखरे सामान को सवाँरते हुये बोली.

"क्यो नही। क्यो फायदा नही। हम औरते यही सब कह के चुपचाप बर्दास्त करती रहती है।"कमली

"छोड़ जाने दे ना।"

"हाँ,मै कौन सा पकड के रखती हू, अगर मै यही पकड के रखती, तो सब खतम ना करती।" कमली

"सब खतम, मतलब?"

"यही, रोज की झिकझिक , मारपिट, गाली गलोच। ना खुदको चैन, ना बच्चो को सुकून।" कमली मालकीन की नजरो मे देखते हुये,

"क्यो सहे, और कब तक।आखिर हर चीज़ की एक हद होती है। हम औरत हैं, हाथ में चुडी पहनती हैं , इसका मतलब हम कमजोर है क्या? क्या हम इज्जत से दो पैसे कमाकर अपने लिये दो जून रोटी का बंदोबस्त नही कर सकते।" कमली आवेश मे कहती गयी और घूँघटओढे मालकीन उसकी ओर देखती रही.



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