आत्मसम्मान
आत्मसम्मान
कहीं बात नहीं बनी, देखने में गोरी-चिट्टी,नैन-नख्श भी अच्छे है। पढ़ी-लिखी बैंक में जॉब भी करती है। पहले-पहल तो कैसा लड़का चाहिए। नकचढ़ी है बड़ी,अब तो लोगों ने ये कहना भी शुरू कर दिया है। तीस पार हो चुकी है। माँ-बाप ने कभी इस बात का अहसास नहीं होने दिया वो तो कहा करते है हम तो बस तेरी ख़ुशी चाहते हैं।
इसी सोच में नेहा ऑफिस जा रही थी। न जाने क्यों आज उसका अंतर्मन किसी अनिष्ट की अशंका जता रहा था। जैसे ही पहुंची तो भीड़ देखकर उसे कुछ समझ नहीं आया। उसकी दोस्त श्रेया ने बताया की ऑफिस के क्लर्क मोहित वर्मा व उनकी पत्नी कार दुर्घटना में मारे गए। उनकी मासूम बच्ची घायल अस्पताल में है। मोहित वर्मा को नेहा अपना भाई मानती थी। क्योकि उनका कोई अपना कहने वाला था ही नहीं। अब इस बच्ची का क्या होगा ? घबराई वो अस्पताल आई। बेसहारा बच्ची का कोई सहारा नहीं था। उसने एक साहसिक निर्णय लिया उस बच्ची को गोद लेने का।
आज ऑफिस जाते समय न तो कोई सवालात उसे डगमगा रहे थे। और न ही प्रश्नसूचक निगाहें घेर रही थी। उसके चहरे पर "आत्मसम्मान" की एक अनोखी चमक चमचमा रही थी।
