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Geeta Upadhyay

Inspirational

4.2  

Geeta Upadhyay

Inspirational

जब जागो तभी सवेरा

जब जागो तभी सवेरा

5 mins
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  कुर्सी पर बैठी प्रतिभा सामने बुक-सेल्फ पर रखी किताबों को निहार रही थी। रंग-बिरंगे कवर वाली पुस्तकें उसे बहुत लुभा रही थी। मानो कह रही हों कि मुझे उठाओ और पढ़ लो। वह उठी और उसने दूसरी पंक्ति में रखी पहली पुस्तक को उठाया। बड़े ध्यान से उलट-पुलट कर देखा और करीने से उसी स्थान पर रख दिया। फिर अपनी जगह पर बैठ गई। यूंही एकटक देखती हुई खयालों में खो गई। 

जैसा नाम वैसी ही प्रतिभावान,सुंदर, सुशील, घर के हर काम में दक्ष, किस्मत की इतनी धनी कि घर के साथ अच्छा वर, उत्तम संतान सब कुछ तो था उसके पास। विवाह को भी तीस वर्ष हो चुके थे। बचपन में एक दुर्घटना से माता पिता चल बसे। रिश्तेदारों ने पाला पोसा घर के काम से फुर्सत ही नहीं मिलती थी। वह पढ़ाई नहीं कर पाई। वक्त ही नहीं था। सत्रह वर्ष की थी रेशमा दीदी को लड़के वालों ने देखने आना था। यह उसे पता भी न था ताऊ जी ने कुछ सामान लेने उसे बाजार भेज दिया जो घर से बहुत दूर था। अभी फिर पहुंची भी नहीं थी कि,पीछे से सुनाई दिया -"बेटा जरा इस घर का पता बता दो।" कहते हुए एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति ने एक कागज उसके हाथ में थमा दिया -"अंकल जी प्रणाम। मुझे पढ़ना लिखना तो नहीं आता। अगर आप मुंहजुबानी बताएंगे शायद मुझे कुछ पता हो।" 

-"पीयूष जरा पता बताना तो मैं अपना चश्मा लाना भूल गया"

 उन्होंने अपने बेटे से कहा जो उनके पीछे ही खड़ा था। बहुत ही सुंदर नैन नक्श, बांका नौजवान देखकर प्रतिभा थोड़ा सा सुकुचाई।मैं कौन सा कम हूं सोच कर संभलते हुए बोली -"अरे जल्दी बताओ मुझे बाजार जाना है। वरना ताऊ जी की डांट की टॉनिक पीनी पड़ेगी।"

 उसने जैसे ही पता बताया वह खिलखिला कर हंसने लगी और पीयूष उसे एकटक देखते ही रह गए 

प्रतिभा बोली -"अरे यह तो हमारे घर का ही पता है । चलो पहले आपको वहां पहुंचा कर आती हूं। फिर बाजार जाऊंगी रास्ते में आते समय बहुत सारी बातें करते हुए घर पहुंचे। बातों- बातों में वे दोनों प्रतिभा के बारे में सब कुछ जान चुके थे। वह उन्हें बिल्कुल अजनबी नहीं लगी।

 मेन गेट पर खड़े सभी इंतजार कर रहे थे। पीयूष और उसके पिताजी के साथ प्रतिभा को देखकर सभी अचंभित हुए। घर के भीतर आते ही पियूष के पिताजी बोले-" हमें तो पीयूष के लिए प्रतिभा बेटी पसंद है।क्यों पीयूष?" पिताजी को देखकर पीयूष मुस्कुरा दिए ताऊ जी की समझ कुछ भी नहीं आ रहा था क्योंकि प्रतिभा थी ही ऐसी कोई भी उसके व्यवहार से प्रभावित हो जाता था। बच्चों में सबसे अधिक सुंदर समझदार इसलिए ही तो ताऊ जी ने उसे बाजार भेजा था। कहीं कोई इसे ही ना पसंद कर ले और उन्हें जिसका डर था वही हुआ । -"अरे!आप क्या कह रहे हैं कुछ जानते हैं क्या प्रतिभा के बारे में?" ताऊ जी बोले

-" हमें सब पता है जी बच्ची ने अपना परिचय हमें दे दिया। अनजाने में ही , उसे कहां पता था कि हम उसके घर आ रहे हैं। हमें रास्ते में मिली हमने उसे रोककर घर का पता पूछा था।"

 चाचा जी बोले-" भाई साहब यह तो बिल्कुल पढ़ी-लिखी भी नहीं है। काला अक्षर भैंस बराबर है। इसके लिए कल को अगर.......। हमारी बेटी रेशमा तो बहुत पढ़ी लिखी और सरकारी नौकरी करती है उसी के रिश्ता होना चाहिए। प्रतिभा तो शहर के तौर-तरीके भी नहीं जानती। हम बरात की अच्छी खातिरदारी करेंगे जी।"

पिताजी बोले-" हमें कुछ नहीं चाहिए। प्रतिभा बेटी के सिवा एक जोड़े में ही ले जाएंगे ससुराल। कोई खातिरदारी नहीं। हमारे पास सब कुछ है, पीयूष होनहार है, नौकरी भी ठीक-ठाक है ।

कैसे समय बीता कुछ पता ही नहीं चला घर में तीन जन ही थे । पिताजी, पीयूष, और प्रतिभा।

पीयूष की माताजी उसके जन्म के समय ही भगवान को प्यारी हो गई थी। पिताजी ने ही उसे पाला -पोसा। साल बाद बेटा और फिर बेटी हुई। कुछ सालों बाद पिताजी भी चल बसे। बच्चे पढ़ लिखकर सेटल हो गए।कुछ पता ही नहीं चला पलक झपकते ही कैसे तीस साल निकल गए

"- प्रतिभा कहां हो भाई" कहते हुए पियूष कमरे में दाखिल हुए।

"-अरे आप !आप तो कह रहे थे मैं शाम तक आऊंगा फिर?" उठते हुए वह बोली 

"-कहां जा रही हो मैंने कई बार देखा है तुम्हें। कुर्सी पर बैठे पुस्तकों को निहारते,उठाकर देखते हुए। सच कहूं मैं तुम्हें शादी के बाद से ही पढ़ाना चाहता था। पर घर की जिम्मेदारी, बच्चों की देखभाल तुम्हारे पास वक्त ही नहीं था। मुझे भी डर था कि कहीं तुम इसका कुछ गलत मतलब ना समझ समझो। जैसे की मैं अनपढ़ हूं। शायद आप इसलिए.........मुझे।ऐसा कुछ भी नहीं है मुझे तुम्हारे भीतर एक पीड़ा और टीस का एहसास होता था, होता है। जैसे तुम यहां बैठी पुस्तकों को देखकर कह रही हो- की काश मैं तुम्हें पढ़ पाती .....। प्रतिभा सब अवाक सी खड़ी सब सुन रही थी। उसे तो यह कहने में भी शर्म आती थी कि मैं पढ़ना चाहती हूं पर पीयूष तो उसकी अंदर के भावों को भलीभांति समझते थे और वह बेकार ही संकोच शर्म करती रही। प्रतिभा अब ज्यादा मत सोचो मैं तुम्हें रोज थोड़ा -थोड़ा पढ़ा दिया करूंगा ।अब तो तुम इतनी व्यस्त भी नहीं रहती हो।तुम्हारे पास काफी टाइम होता है ।

-"अरे ! सुनो अब मैं क्या करूंगी पढ़कर सब हसेंगे मुझ पर। आप क्यों परेशान हो रहे हो जी? पचास की होने को आई हूं अब बुढ़ापे में कहां जाना है पढ़कर? वह तो मैं वैसे ही......... प्रतिभा बोली

-" देखो कोई हंसता है तो हंसे।कल से नहीं आज से, आज से नहीं अभी से, मैं तुम्हें पढ़ाने की शुरुआत करता हूं। एक प्यारी सी कॉपी और पेंसिल थमाते हुए पीयूष ने कहा - "जब जागो तभी सवेरा।"



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