आशीर्वाद या अभिशाप
आशीर्वाद या अभिशाप
बालकनी में चाय की चुस्कियां लेते हुए मेरी स्मृतियां कुछ साल पीछे लौट गईं। वह नवमी का दिन था। आस-पड़ोस की बच्चियों के साथ मेरी आठ साल की बेटी 'देवी' भी कन्या पूजन के लिए गई थी। लौटकर उसने जो सवाल किया, उसने मुझे निरुत्तर कर दिया।
"माँ! आरती दीदी आज हमारे साथ पूजन में क्यों नहीं आईं?"
मैंने सहज भाव से पूछा, "तुम उन्हें बुलाने गई थीं?"
"हाँ, पर आंटी ने कहा कि दीदी अब बड़ी हो गई हैं, इसलिए पूजन में नहीं आएंगी। उन्होंने कहा कि आप मुझे इसका कारण समझा देंगी।" देवी की आँखों में जिज्ञासा और उलझन थी।
कुछ सोचते हुए मैंने कहा, "ठीक है तुम पहले हाथ मुँह धो के आओ फिर मैं बताऊँगी।"
थोड़ी देर बाद वो फिर मेरे सामने थी। मैंने उसे अपने पास बैठाया और गहरी सांस लेकर कहा, "देवी, बच्चियां देवी का रूप होती हैं। हम उनकी पूजा इसलिए करते हैं ताकि माँ दुर्गा उन्हें अपनी शक्तियाँ प्रदान करें। और जब उन्हें वे शक्तियाँ मिल जाती हैं, तब वे स्वयं शक्ति स्वरूप हो जाती हैं और पूजन के लिए नहीं जातीं।"
" इसका मतलब मुझे भी एक दिन शक्तियाँ मिलेंगी।" उसने उत्सुकता से पूछा। "हाँ, बिल्कुल।" मैंने कहा।
"पर माँ, मुझे कैसे पता चलेगा कि मेरे अंदर शक्तियाँ आ गई हैं?" उसने तपाक से पूछा।
एक आठ साल की बच्ची को 'मासिक चक्र' की जैविक प्रक्रिया समझाना उस समय कठिन था। " पता चल जाएगा जब शक्तियाँ आ जाएंगी। मैं तुम्हे बता दूंगी।"
"मगर कैसे माँ? आपको कैसे पता चलेगा?" उसने फिर पूछा। "रात में बताऊंगी।"मैंने उसे टालने के लिए कहा।
रात को सोने से पहले वो फिर मेरे पास आई अपने सवाल के साथ। मेरे पास और कोई चारा नहीं था तो मैंने उसे हनुमान जी की कहानी सुनाई। मैंने बताया कि हनुमान जी के पास बचपन से ही बहुत सारी शक्तियाँ थीं। वो हवा से भी तेज़ दौड़ सकते थे, धरती से आसमान तक छलांग लगा सकते थे, अपना आकार कई गुना बड़ा और छोटा कर सकते थे और भी ऐसी कई शक्तियाँ थीं। पर थे तो वो बच्चे ही ना, वो इन शक्तियों का इस्तेमाल कब या कहाँ करना चाहिए ये समझने के लिए बहुत छोटे थे। एक बार उन्होंने सूरज को फल समझ कर उसे खाने के लिए उन्होंने एक लंबी छलांग लगाई और सीधे सूरज के पास पहुँच गए। भूख के मारे उन्होंने सूरज को पकड़कर अपने मुँह में रख लिया! पूरी दुनिया में अंधेरा छा गया। बाद में जब बड़े देवताओं ने उन्हें समझाया और थोड़ी डाँट पड़ी, तब जाकर उन्होंने सूरज को बाहर निकाला।अपनी शक्तियों और अपने ज्ञान का इस्तेमाल कर के ऋषि-मुनियों को परेशान करते थे, उनके काम में, उनकी पूजा में विघ्न डालते थे।
इसी सब से परेशान होकर एक दिन एक ऋषि ने उन्हें सज़ा के तौर पे श्राप दिया कि वो अपनी सारी शक्तियाँ भूल जाएँगे। बहुत मिन्नतों के बाद ऋषि ने उन्हें माफ़ किया और कहा "जब तुम बड़े हो जाओगे और यह सीख जाओगे कि अपनी ताकत और ज्ञान का सही इस्तेमाल कैसे करना है तब तुम्हें अपनी सारी शक्तियाँ वापस याद आ जाएँगी।" फिर जब समय आया तो जामवंत जी ने उन्हें उनकी शक्ति का बोध कराया था। मैंने उसे पुचकारते हुए कहा, "तुम्हें भी सही समय पर पता चल जाएगा।"
वर्तमान...
आज मेरी 'देवी' के कमरे से सिसकियों की आवाज़ आ रही थी। उसे पहली बार मासिक धर्म (Periods) शुरू हुए थे। वह डरी हुई थी। मैंने उसे गले लगाया और वही पुरानी बात याद दिलाई—कि यह वही 'आशीर्वाद' है जिसकी चर्चा हमने सालों पहले की थी। यह एक नए जीवन का सृजन करने की शक्ति है।
उसने दर्द से कराहते हुए कहा, "माँ, यह कैसा आशीर्वाद है? यह तो अभिशाप जैसा लग रहा है।"
उसकी बात सुनकर मेरा मन भी भारी हो गया। यह विडंबना ही है कि जो शक्ति संसार को आगे बढ़ाती है, वही अपने साथ असहनीय दर्द और कई सामाजिक बंदिशें भी लाती है। मैंने उसे पैड दिया इसे कैसे इस्तेमाल करना है ये बता कर उसे बाथरूम भेजा और ख़ुद जल्दी से उसके लिए हॉट वॉटर बैग तैयार करने बाहर आ गई।
कुछ महीनों बाद...
फिर से नवरात्रि आई। घर में कन्या पूजन संपन्न हुआ। जब सब बच्चियां चली गईं, तो मेरा पांच साल का बेटा 'रुद्र' मेरे पास आया।
उसके मासूम चेहरे पर सवाल था, जैसे कभी देवी चेहरे पर था— "माँ! नवरात्रि पर सिर्फ लड़कियों की ही पूजा क्यों होती है?"
मैं मुस्कुरा दी। एक और 'जामवंत' तैयार था, अपनी नई पीढ़ी को शक्ति और सम्मान का पाठ पढ़ाने के लिए।
