STORYMIRROR

Sangeeta Gupta

Inspirational

3  

Sangeeta Gupta

Inspirational

"आज से मेरी बहुएं आजाद है "

"आज से मेरी बहुएं आजाद है "

5 mins
216

ट्रेन में भीड़ होने की वजह से बैठने की जगह नहीं मिल रही थी और ऊपर से ये लंबा सा घूंघट.....। जी तो कर रहा था इस घूंघट को हटा कर साइड कर दूं पर नही कर सकती थी वरना मांजी की घूरती आंखें वही जमीन में गाड़ देगी यही सोच कर उस घूंघट तले हिलती डोलते अपने सफर पर जा रही थी। 


जाने के फेर में रात को ठीक से नींद भी पूरी नहीं हो पाई थी और नतीजन मेरी आंखें थोड़ी लग गई और मैं ट्रेन की हिल डोल की रफ्तार में किसी से टक्करा गई। पता तो नहीं चला की मुझसे टकराने वाला बंदा कौन था और वो गिरा या बच गया पर एक घूरती आंखें मेरी घूंघट की ओट से थोड़ी सी दिख ही गई। 


वो थे मेरे ससुर जी जो गुस्से से मुझे घूरे जा रहे थे और मांजी को इशारों इशारों में कह रहे थे " बहुरिया को बोलिए जरा संभल कर यूं राह में खड़े लोगों से टकराया न करें। लोग क्या कहेंगे ? श्रीधर की बहुरिया राह खरे लोगों से टकराती है ! पैर में जान है या वो भी घर छोड़ आई......!! 


मांजी आहिस्ता आहिस्ता मुझसे इशारों में घूंघट के नीचे से कहने लगी " बाबूजी गुस्सा कर रहे हैं बहुरिया "......क्या शर्म हया पीहर छोड़ आई जो ऐसे परपुरुष के तन से सटे जा रही है ?? सीधी तरह यहां खड़ी रह वरना बाबूजी की सुन लेना.....!! 


अब इन लोगों को कौन समझाए कि एक तो साड़ी ऊपर से इतनी बड़ी घूंघट और इन घूंघट के पीछे से कौन खड़ा हैं उसकी भी जानकारी रखो ?? ये मुझसे कैसे हो पायेगा पता नहीं.....। एक तो यूं लटक लटक के जाना पड़ रहा है ऊपर से इनकी भी सुनो। इतना ही शौक था जाने का तो एक गाड़ी बुक करा लेते इतनी भी दूरी नही थी लखनऊ से बनारस जाना , पर नही इनको तो पैसे भी बचाने हैं और रौब भी दिखाने हैं लोगों को कि देखो मेरी बहु अब भी घूंघट तले चलती है। मन ही मन सुनैना बुदबुदा रही थी। 


थक्कम दुक्की करते करते आखिरकार बनारस आ ही गया जहां पहले से ही सुनैना का पति रुद्र इंतजार कर रहा था। रूद्र ने जैसे ही सुनैना को नीचे उतारने के लिए अपना हाथ बढ़ाया की इतने में भीड़ इतनी बढ़ गई उतरने के लिए की सुनैना गलती से किसी और पुरुष का हाथ रूद्र समझकर थामकर नीचे उतरी और उसके साथ चलने लगी। दो कदम ही बढ़ाया होगा कि इतने में रूद्र के बाबूजी की नजर सुनैना पर जाती है और वो जोर से चीखती हुए कहते है " बहुरिया जे क्या कर रही है परपुरुष का हाथ थाम लिया अभी के अभी तू ये घूंघट हटा और देख ".......। 


जोर की आवाज सुनते ही सुनैना उस पुरुष का हाथ झटक देती है और सिर झुका कर वही की वही खड़ी हो जाती है। 


 मैंने कहा न घूंघट हटा मूरत बनकर क्या खड़ी हैं अब......?


पर बाबूजी आपके सामने..... रूद्र और उसकी मां एक ही सुर में कहते है। 


हां तो मेरे सामने ......


सुनैना बाबूजी का गुस्सा देखकर झट से अपना घूंघट नीचे गिरा देती है और उस व्यक्ति को देखती है जिसका हाथ थाम कर वो आगे बढ़ रही थी। छह फुट का लंबा चौड़ा आदमी देखकर सुनैना के मुंह से एकाएक निकलता " हे भगवान अच्छा हुआ इस मानव से बचा लिया ".....


देख लिया क्या करने जा रही थी तू बहु.....। आज तो हमारी इज्जत को पानी में मिला देती। वो तो अच्छा हुआ किसी जानकार ने नही देखा.....फिर बाबूजी कहते है " अब से बहुरिया को ऐसे घूंघट ओढ़ने की कोनो जरूरत नहीं है " अब से ये बिना घूंघट के ही चलेगी....!! 


पर हमारे पूर्वजों के इतने सालों के बनाए हुए इस घूंघट प्रथा का क्या होगा जी ......?? आप भी आज तक इसके पक्ष में ही थे......मांजी धीमे स्वर में कहती है। 


अब वही होगा जो आजतक नहीं हुआ.....। इस घूंघट के चक्कर में बहुरिया अपनी इज्जत उछाल कर कही और चली गई तब तो रही सही इज्जत भी चली जायेगी रूद्र की मां और ये सब हुआ है सिर्फ और सिर्फ इस घूंघट की वजह से......!! 


आज सही मायने में बाबूजी को घूंघट रखने के नुकसान का पता चल सका। अगर आज ये घटना नहीं घटती तो शायद इस घूंघट प्रथा का कभी अंत नहीं होता जो सदियों से चली आ रही थी। जिसे रूद्र की मां और भाभियों ने अब तक झेला है। बनारस से वापस लौटने के बाद बाबूजी ने सभी बहुओं को घूंघट से हमेशा हमेशा के लिए आजादी दे दी.....!! 


सभी बहुओं ने आकर सुनैना को शुक्रिया किया और कहा " काश हमने भी किसी परपुरुष का हाथ थाम लिया होता तो आज हम आजाद होते इस घूंघट से पर कोई नहीं जब जागे तभी सवेरा......।। ये अच्छा किया सुनैना गलती ही सही पर अच्छा तो हुआ हमारे लिए........!! 


फिर सभी बहुएं अपने अपने घूंघट को ऐसे हटाती है जैसे कई वर्षो से पड़ा शीशे पर धूल जो उसकी शख्सियत को धुंधला कर रही हो......!!


प्रिय पाठकों घूंघट प्रथा नही कुप्रथा थी जिसे औरतें सदियों से झेलती आ रही है। आज भी कही कही ऐसा देखा गया है। 


इस कहानी के माध्यम से आप लोगों के समक्ष सिर्फ अपने विचारों को रख रही हूं। मेरा मकसद किसी की भावनाओं को आहत करना नही है। ये रचना पूरी तरह से मेरी लिखी हुई है।

आपको मेरी कहानी कैसी लगी जरूर बताइएगा और पसंद आएं तो लाइक कमेंट और शेयर करें। आप मुझे फॉलो भी कर सकते है। आपके कमेंट आपके सुझाव मेरे लिए बहुत मायने रखती है इसलिए दिल खोल कर सुझाव दे........



Rate this content
Log in

Similar hindi story from Inspirational