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कुमार अविनाश केसर

Tragedy

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कुमार अविनाश केसर

Tragedy

ज़िन्दगी

ज़िन्दगी

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ज़िन्दगी

मैंने तुम से चाहा था

गगन भर प्यार!

यह कैसी किस्मत की मार!!

तूने मुझसे ही ठान दी रार!!


कहां तो चाहा था-

आसमान के कैनवास पर,

बिखरे रंगों के बगुले,

मुट्ठियों में भींच कर,

धरती को धानी कर दूँ!

तूने मनमानी की-

मुझे बेमानी कर दिया!!


जी करता है-

पंछियों की उड़ानें,

समेटकर!

सुनहरे,सतरंगे सपनों तले,

किसी साँझ!!

घर लौटती रूह को,

प्राणपण से,

अपनी रूह में,

डुबोकर सो जाऊँ !

तूने झकझोर दिया!!

आह, जिंदगी!

तूने इशारा किया,

और

उम्र तमाम हो गई!


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