ज़िन्दगी का चलना
ज़िन्दगी का चलना
ज़िन्दगी का चलना
बार बार कैसा।।
ज़िन्दगी का मिलना
बार बार कैसा।।
टूटती हुईं फिज़ाओं का
बार बार जुड़ना कैसा।।
आसमां से काले बादलों का
बार बार बरसना कैसा।।
गिरना उठना गिर कर सम्भलना
बार बार कैसा।।
हर सुबह हर शाम रंजिशों को
गिड़गिड़ाना बार बार कैसा।।
घने उजालों में अँधेरों से निकलना
बार बार कैसा।।
पंछी की तरह पर लगाकर उड़ना
बार बार कैसा।।
लम्हों को ज़िन्दगी में "फ़ैज़" कर
दिखाना बार बार कैसा।।
हर ख़यालों को ज़िन्दगी में अपना
बनाना बार बार कैसा।।
कभी यहां कभी वहां पर जाना
बार बार कैसा।।
कभी धूप कभी छांव में गुमनाम हो
जाना बार बार कैसा।।
निकलकर मंज़िलों को और पास
आने देना बार बार कैसा।।
बन्द पिंजरों की कैद से ख़ुद को बाहर
निकालना बार बार कैसा।।
