STORYMIRROR

Husan Ara

Abstract

3  

Husan Ara

Abstract

यूँ ही बैठे कभी अकेले

यूँ ही बैठे कभी अकेले

1 min
334

खुद को बहुत करीब पाया है

यूँ ही बैठे कभी अकेले

वक़्त ने आईना दिखाया है

यूँ ही बैठे कभी अकेले।


ऐसा भी नही कि तन्हाई पसंद हूँ

लेकिन बहुत सुकून पाया है,

यूँ ही बैठे कभी अकेले।


जाना है दूर तलक,

तो सबका साथ ज़रूरी है

लेकिन मंज़िल की भी तो सोचो

यूँ ही बैठे कभी अकेले।


सबसे सोच अलग है मेरी,

मैं सच की जड़ तक जाऊंगा

ये भी जाना सब है मुमकिन

यूँ ही बैठे कभी अकेले।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract