यह मेरा लगाया एक पेड़ था
यह मेरा लगाया एक पेड़ था
मिट्टी में डाला था
एक बीज
चाहता था मैं कि
फूटे उसमें से अंकुर और
वह एक पौधा बन जाये
कुछ समय पश्चात
जैसा मैं चाहता था
ठीक वैसा ही हुआ
वह एक कोमल टहनी और
चार पत्तियों का नन्हा और प्यारा सा
पौधा बनकर मेरे साथ खड़ा था
उसका जन्म इस संसार में हो
चुका था
वह मेरी बगिया का
मेरे द्वारा रोपा ही एक पौधा
बन चुका था
उसका इस धरती पर जीवन
आरंभ हो चुका था
उसकी जड़ें जमीन को पकड़ने
लगी थी
उसकी सुगंध मिट्टी के लब
चूमने लगी थी
उसकी हसरतें पंख फैलाकर
चारों दिशाओं में
फैल रही थी
उसकी आकांक्षायें आसमान का
कद नाप रही थी
उसके सपने रात को चांद से
बातें करते
दिन भर तो वह धूप से
खेलते
हंसते खिलखिलाते और
पानी की बौछारों में खूब भीगते
वह पौधा उम्र में अभी
कितना छोटा था
तन से छोटा था पर
मन था उसका कितना समझदार
कितना विस्तृत और
कितना विशाल
भगवान का ही कोई रूप लगता
था
मेरा स्पर्श और प्रकृति का
सानिध्य पाकर तो
यह दिन प्रतिदिन एक
चांद सूरज के सौंदर्य
और तेज सा निखरता
था
यह गुणों की एक टोकरी
था
यह सुंदर था
यह कोमल था
यह सौम्य था
यह स्थाई था
यह पनपता था
यह पल पल आगे बढ़ता था
इसमें जीवन कहीं चलता था
यह कभी न थकता था
कहीं न रुकता था बस
किसी के लिए कुछ करने की
दृढ़ इच्छा शक्ति लिए
हरदम आगे बढ़ता था
न पलक झपकता था
न रोता था
न सोने के लिए कभी
लेटता था
न आराम करता था
बस जब एक वयस्क पेड़
बना तो
दूसरों को छांव देता था
दूसरों को आराम देता था
दूसरों को अपना तन देता था
मन देता था
आत्मा देता था
सब कुछ था दूसरों के लिए
समर्पित
खुद के फल, फूल और
पत्ते
यहां तक की अपने तन की
सुगंध भी देता था
यह मेरा लगाया एक
पेड़ था
यह मेरी ही तरह स्वार्थी नहीं था
यह अपना सब कुछ दूसरों पर
न्योछावर कर देता था
यह सबको अपना प्रेम,
स्नेह, आदर, तन मन और
कण कण देता था।
