STORYMIRROR

मिली साहा

Abstract

4  

मिली साहा

Abstract

यह गणतंत्र हमारा

यह गणतंत्र हमारा

2 mins
263

क्या याद नहीं, कैसे हमने यह आज़ादी पाई है,

तिरंगे की शान की खातिर वीरों ने जान गवाई है,

क्या केवल कहने मात्र को ही रह गया भाईचारा,

कैसे भूल गए आज़ादी की क्या कीमत चुकाई है,

यह गणतंत्र हमारा है, ये मान, अभिमान हमारा है,

फिर जात-पात, धर्म का क्यों लगता यहाँ नारा है,

क्या इंसानियत से बढ़कर भी हो सकता कोई धर्म,

क्यों ये ज़हर आज देशहित से भी हो गया प्यारा है,

बेकार की बहस दंगों में, क्यों अपना खून खौलाते,

इतना ही हौसला है तो देश के काम क्यों नहीं आते,

सभी धर्म एक समान यहाँ, सभी का है पूर्ण सम्मान,

बैठा सबके दिल में हिंदुस्तान, क्यों नहीं उसे जगाते,

जात-पात, धर्म वाद विवाद में क्यों समय करते व्यर्थ,

हिंदू हो या मुस्लिम सभी इंसान समझो तो यह अर्थ,

इस दुनिया रूपी एक ही बागीचे के फूल सभी यहाँ,

जुड़ेंगे जब दिल के तार तभी तो यह देश बनेगा स्वर्ग,

मिला बड़े जतन से भारत को सदियों से खोया उत्कर्ष,

कटी गुलामी की बेड़ियाँ तब मिला है आज़ादी का हर्ष,

जाती-पाती के नाम पर देश को बांटने वालों याद करो,

देश के लिए मर मिटने वालों का वो बलिदान, वो संघर्ष,

मातृभूमि को उसके दुलार का क्या मिल रहा परिणाम,

उसी के पुत्र आपस में लड़कर उसे कर रहे हैं बदनाम,

हमें यूंँ खंडित देखकर दुश्मन भी तो ढूंढ लेते हैं मौका,

समझो, आपस में लड़ने का सदा ही बुरा होता अंजाम,

आओ इस गणतंत्र पर हम मिटा दे दिल का भेद-भाव,

प्रण करें न हो कोई लड़ाई दंगा सबके मन में हो सद्भाव,

इस नई उम्मीद नए पैगाम का दिल से करेंगे अभिवादन,

तभी तो मातृभूमि के जर्रे -जर्रे में मिलेगा प्रेम का बहाव।



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract